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T-19/21 हो सका उसका तसन्नो न गवारा मुझ से-शाज़ जहानी

हो सका उसका तसन्नो न गवारा मुझ से
आख़िरश कर ही लिया उसने किनारा मुझ से

बात जो उसकी ज़ुबाँ पर न कभी आ पाती
कह गया आँख का हल्का सा इशारा मुझ से

दे नहीं पायेगा आईना मुझे अब धोखा
हो चुका है मेरा किरदार बरहना मुझ से

उम्र काफ़ी न हुई जिसकी तलाफ़ी के लिए
एक लम्हे में हुआ था वो ख़सारा मुझ से

इस से बढ़ कर भी कोई तर्ज़े-शिकायत होगी
आँख नम थी वो मगर कुछ भी न बोला मुझ से

तुम से सुनने को बहुत कुछ है, सुनाने को बहुत
इस का माहौल बने जब मिलो तन्हा मुझ से

छिन गया आज के बच्चों से लड़कपन उनका
मेरा दस साल का पोता है सयाना मुझ से

मुंतज़िर हूँ मैं कि इक रोज़ बुला लेगा वो
अब जहाँ में रहा जाता नहीं तन्हा मुझ से

लाज़िमी है कि करूँ शुक्र मदद का उसकी
अपनी कोशिश से न निभ पाता ये वादा मुझ से

शक नहीं इसमें कि रौशन है ग़ज़ल ! मुस्तक़बिल
रोज़ मिल जाता है शायर कोई बढ़िया मुझ से

‘शाज़’ के बारे में जो कुछ भी सुना तल्ख़ सुना
कोई तो उसके तईं कहता कुछ अच्छा मुझ से

शाज़ जहानी 09350027775

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14 comments on “T-19/21 हो सका उसका तसन्नो न गवारा मुझ से-शाज़ जहानी

  1. शाज़ साहब,
    ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है। वाह वाह।

  2. waaah, wah, kya baat hai, saare sher badi khoobsoorti se sajaae gae hain, bahot khoob

    • बहुत बहुत शुक्रिया. आपके अश्आर मुझे भी बहुत अच्छे लगे. गिरह का शेर तो लाजवाब है:
      क्यूँ नज़र ख़ुद से मिलाने की नहीं ताब मुझे
      “साहिबो, उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझ से”

  3. उम्र काफ़ी न हुई जिसकी तलाफ़ी के लिए
    एक लम्हे में हुआ था वो ख़सारा मुझ से

    शाज़ साहब आपके इस शेर में ज़बांज़दे-आम हो जाने की सकत है. बहुत अच्छा कहा. वाह-वाह दाद क़ुबूल फ़रमाइये

  4. उम्र काफ़ी न हुई जिसकी तलाफ़ी के लिए
    एक लम्हे में हुआ था वो ख़सारा मुझ से ” K H O O B ”

  5. BAHUT ACHCHI GHAZAL HUYI HAI JNB ..MUBARAKBAAD

  6. Shaaz sahab… behad acchi ghazal hui hai… matla hi is qadar umda hai ke kya kahne….uske baad
    इससे बढ़कर भी कोई तर्ज़े शिकायत होगी
    आँख नम थीं वो मगर कुछ भी न बोला मुझसे

    उम्र काफ़ी न हुई जिसकी तलाफ़ी के लिए
    एक लम्हे में हुआ था वो ख़सारा मुझ से
    aise she’r… waah waahhhhhh… dher saari daad…

  7. इससे बढ़कर भी कोई तर्ज़े शिकायत होगी
    आँख नम थीं वो मगर कुछ भी न बोला मुझसे
    वाह्ह
    बढ़िया ग़ज़ल हुई है
    दिली दाद

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