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T-19/19 देखता रहता है और कुछ नहीं कहता मुझसे-मनोज कुमार मित्‍तल ‘कैफ़’

देखता रहता है और कुछ नहीं कहता मुझसे
बेज़ुबां उसका है ख़ामोश सा रिश्‍ता मुझसे

मैं कि इंसां हूं मिरी ज़ात बदलती कैसे
वो मिला जब भी मिला बनके फ़रिश्‍ता मुझसे

फ़र्ज़ आज़ाद फ़िज़ाओं की तरफ़दारी है
छीन ले जाय शही चाहे ठिकाना मुझसे

अबतो बाक़ी है मिरे तन पे ज़रूरत का लिबास
वक़्त ने छीन लिया इश्‍क़ का गहना मुझसे

दर्द का ज़ि‍क्र तो अहबाब किया करते थे
उसकी सूरत को मगर देखके जाना मुझसे

मैं जिसे तोड़ चुका मुझमें कहीं पोशीदा
मांगता है मिरा बचपन वो खिलौना मुझसे

मुझमें बैठा है कहीं दिल कोई शाहिद बनकर
देखता रहता है और कुछ नहीं कहता मुझसे

यूं बसीरत ने बदल दी है ये सारी दुनिया
आज बेगाना हुआ अपना सरापा मुझसे

झांक पाता तो उधर एक गुलिस्‍तां भी था
हां मगर खुल न सका दिल का दरीचा मुझसे

नग़्मगीं था वो हसीं था जो मिरे साथ रहा
खो गया शे’र ग़ज़ल का वो अकेला मुझसे

बाद इक उम्र-ए-वरा बूंद मयस्‍सर न हुई
फिर भी छोड़ा न गया ‘कैफ़’ पियाला मुझसे

मनोज कुमार मित्‍तल ‘कैफ़’ 09887099295/08233099295

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18 comments on “T-19/19 देखता रहता है और कुछ नहीं कहता मुझसे-मनोज कुमार मित्‍तल ‘कैफ़’

  1. waaah, kya umda kalaam inaayat kiya hai…
    अबतो बाक़ी है मिरे तन पे ज़रूरत का लिबास
    वक़्त ने छीन लिया इश्‍क़ का गहना मुझसे

    दर्द का ज़ि‍क्र तो अहबाब किया करते थे
    उसकी सूरत को मगर देखके जाना मुझसे
    achhe ashaar hain..

    मैं जिसे तोड़ चुका मुझमें कहीं पोशीदा
    मांगता है मिरा बचपन वो खिलौना मुझसे…ye sher aankhen nam kar gaya

  2. कैफ़ साहब उम्दा ग़ज़ल निकाली. आप शेर तो अच्छे कह ही रहे हैं मगर एक ऐसा ज़रूरी फ़र्ज़, जिसे लोग अब भूलते जा रहे हैं, अदा कर रहे हैं. वो है अपने बाद की नस्लों में शायरी के पौधे रोपना. ज़ाहिर है अगर हम ही ऐसा नहीं करेंगे तो धीरे-धीरे ये सिलसिला कमज़ोर पड़ता जायेगा. आपके लिये मेरे मन में इस कारण भी बहुत इज़्ज़त है. वाह-वाह. दोनों हवालों से मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाइये

    • तुफ़ैल साहब, बहुत शुक्रिया। नई नस्‍ल ज़हीन है और हमारी जि़म्‍मेदारी है कि ज़बान और फ़न का कमोबेश जो विरसा हमारे हिस्‍से में आया है उसे इन्‍हे सौंपें और नए दौर की गुलकारियों से लुत्‍फ़अंदोज़ हों। इस राह में आप मेरे तईं एक नज़ीर हैं।

  3. Ghazal to kamaal honi hi thi apne jo kahi hai.. sabhi ash’aar kamaal haiN.. ye kuch khaas haiN..

    मैं कि इंसां हूं मिरी ज़ात बदलती कैसे
    वो मिला जब भी मिला बनके फ़रिश्‍ता मुझसे

    फ़र्ज़ आज़ाद फ़िज़ाओं की तरफ़दारी है
    छीन ले जाय शही चाहे ठिकाना मुझसे

    अबतो बाक़ी है मिरे तन पे ज़रूरत का लिबास
    वक़्त ने छीन लिया इश्‍क़ का गहना मुझसे

    मैं जिसे तोड़ चुका मुझमें कहीं पोशीदा
    मांगता है मिरा बचपन वो खिलौना मुझसे

    झांक पाता तो उधर एक गुलिस्‍तां भी था
    हां मगर खुल न सका दिल का दरीचा मुझसे

    Mubarakbaad!!

    # Asif

  4. khoobsoorat ghazal par daad hi daad…tamaam sher aik se baDh kar aik…waaahhhh KAIF SB

  5. acchi ghazal hui hai kaif sahab…

    मैं कि इंसां हूं मिरी ज़ात बदलती कैसे
    वो मिला जब भी मिला बनके फ़रिश्‍ता मुझसे

    अबतो बाक़ी है मिरे तन पे ज़रूरत का लिबास
    वक़्त ने छीन लिया इश्‍क़ का गहना मुझसे

    झांक पाता तो उधर एक गुलिस्‍तां भी था
    हां मगर खुल न सका दिल का दरीचा मुझसे
    in teen she’ron par bataure-khas daad qubulen

  6. देखता रहता है और कुछ नहीं कहता मुझसे
    बेज़ुबां उसका है ख़ामोश सा रिश्ताझ मुझसे
    मुझमें बैठा है कहीं दिल कोई शाहिद बनकर
    देखता रहता है और कुछ नहीं कहता मुझसे
    एक ही मिसरे को ऊला और सानी बनाकर कामयाबी से इस्तेमाल किया है !!
    मैं कि इंसां हूं मिरी ज़ात बदलती कैसे
    वो मिला जब भी मिला बनके फ़रिश्ताा मुझसे
    कौन है ये मुझे कम कर के आँकने वाला
    आदमी हूँ वो फरिश्ता बताने लगता है (लफ़्ज़ के पिछले अंको से …)
    फ़र्ज़ आज़ाद फ़िज़ाओं की तरफ़दारी है
    छीन ले जाय शही चाहे ठिकाना मुझसे
    मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा ??!! परिव्राजकों के चिन्ह नही होते !!!
    अबतो बाक़ी है मिरे तन पे ज़रूरत का लिबास
    वक़्त ने छीन लिया इश्क़े का गहना मुझसे
    मुहब्बत ही इंसानी रूह को वो पैकर देती है जिसमे वो इत्मिनान से रह सकता है बाकी अना , पिन्दार , ज़र्फ़ और ज़ब्र के मल्बूस ज़रूरत के सौदे हैं !!!
    मैं जिसे तोड़ चुका मुझमें कहीं पोशीदा
    मांगता है मिरा बचपन वो खिलौना मुझसे
    ये दौलत भी ले लो , ये शुहरत भी ले लो !!!….
    मेरे दिल के किसी कोने मे एक मासूम सा बच्चा
    बडॉ की देखकर दुनिया बडा होने से डरता है –राजेश रेड्डी
    यूं बसीरत ने बदल दी है ये सारी दुनिया
    आज बेगाना हुआ अपना सरापा मुझसे
    चश्मे बेदार हरिक ख़ाब की शम्शीर हुई !!! बसीरत दुनिया बदल देती है !!!
    झांक पाता तो उधर एक गुलिस्तांर भी था
    हां मगर खुल न सका दिल का दरीचा मुझसे
    हम कमनज़र थे इसलिये महरूम रह गये
    वर्ना पसे नक़ाब बदस्तूर चाँद था –कमल सिंह
    बाद इक उम्र-ए-वरा बूंद मयस्सलर न हुई
    फिर भी छोड़ा न गया ‘कैफ़’ पियाला मुझसे
    रहने दो अभी सागरो मीना मेरे आगे ……….
    मनोज कुमार मित्तयल ‘कैफ़’ साहब !!! एक नशा है इस गज़ल मे !! रिवायत भी इस गज़ल पर दस्ते दुआ रखे हुये है और शाइर की कुव्वते परवाज़ पर भी कोई शक नही !!! संगीत पिन्हा है अश आर मे –मुबारकबाद कुबूल कीजिये !!

  7. मैं कि इंसां हूं मिरी ज़ात बदलती कैसे
    वो मिला जब भी मिला बनके फ़रिश्ता मुझस…kya baat hai..wahh
    -kanha

  8. achhi gazal hai Kaif Sahab….mubaaarakbaad

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