19 टिप्पणियाँ

T-19/30 कर रही थीं दमे-रुख़सत वो तक़ाज़ा मुझ से-मुमताज़ नाज़ां

कर रही थीं दमे-रुख़सत वो तक़ाज़ा मुझ से
उम्र भर बोझ उन आँखों का न उट्ठा मुझ से

वक़्त ने डाली हैं कुछ ऐसे ख़राशें रुख़ पर
आज कल डरने लगा है मिरा साया मुझ से

खोयी रहती हूँ मैं माज़ी के सनमख़ानों में
किस क़दर लिपटा हुआ है ये ख़राबा मुझ से

दर ब दर ढूँढती फिरती हूँ मैं कब से ख़ुद को
इन दिनों दूर बहुत रहता है काबा मुझ से

इक तमन्ना थी, कि पूरी किसी सूरत न हुई
एक दिल था, कि हर इक गाम पे उलझा मुझ से

क़त्ल कर डाला है ख़ुद रूह को अपनी मैं ने
रोता रहता है लिपट कर मिरा लाशा मुझ से

जोड़ रक्खा था कई रिश्तों को जिस ने अब तक
दफ़अतन टूट गया है वही धागा मुझ से

सुन लिया जाये चलो आओ फिर उस का भी सवाल
और क्या माँगेगा वो मेरे अलावा मुझ से

क्यूँ नज़र ख़ुद से मिलाने की नहीं ताब मुझे
“साहिबो, उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझ से”

कब से रस्ते में खड़ी सोच रही हूँ “मुमताज़”
जाने खोया था कहाँ मेरा असासा मुझ से

मुमताज़ नाज़ां 09867641102 /08756816181

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19 comments on “T-19/30 कर रही थीं दमे-रुख़सत वो तक़ाज़ा मुझ से-मुमताज़ नाज़ां

  1. BEHTAREEN GHAZAL KE LIYE DILI DAAD PESH KARTA HU;N QABOOL FARMAAYE;N. MUMTAAZ SAAHIBA

  2. badhiya ghazal hui hai aapaa aur is sher kee maasoomiyat ke to kahane hee kya

    सुन लिया जाये चलो आओ फिर उस का भी सवाल
    और क्या माँगेगा वो मेरे अलावा मुझ से

  3. वक़्त ने डाली हैं कुछ ऐसे ख़राशें रुख़ पर
    आज कल डरने लगा है मिरा साया मुझ से

    खोयी रहती हूँ मैं माज़ी के सनमख़ानों में
    किस क़दर लिपटा हुआ है ये ख़राबा मुझ से
    इक तमन्ना थी, कि पूरी किसी सूरत न हुई
    एक दिल था, कि हर इक गाम पे उलझा मुझ से
    आ.मुमताज आपा ,तमाम ग़ज़ल लाफ़ानी है
    ढेरों दाद कबूल फरमाएं
    आप स्वस्थ और तन्दुरुस्त रहें
    सादर

  4. मुमताज़ साहिबा क्या क़यामत के शेर निकालती हैं आप . इतनी ख़राब तबियत…अस्पताल में रहने के बावजूद हर बार आपका कलाम हसद की हद तक अच्छा होता है. मुबारकबाद, दाद क़ुबूल फ़रमाइये

    एक ग़लती के मुआफ़ भी फ़रमायें. अभी कमेंट पोस्ट करते वक़्त देखा तो पता चला कि 17 नम्बर पर दो ग़ज़लें पोस्ट हो गयी हैं. इस बीच इतना कलाम आ चूका है कि इसके सिवा कोई चारा ही नहीं था कि आपकी ग़ज़ल का नम्बर आख़िरी पोस्ट हुई ग़ज़ल के बाद का कर दिया जाये. अब आपकी ग़ज़ल खाकसार कि ग़ज़ल के बाद 30 वें नम्बर पर आ गयी है

  5. बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है…..ढेरों दाद….

    वक़्त ने डाली हैं कुछ ऐसे ख़राशें रुख़ पर
    आज कल डरने लगा है मिरा साया मुझसे

    क्या बात है…..

  6. कर रही थीं दमे-रुख़सत वो तक़ाज़ा मुझ से
    उम्र भर बोझ उन आँखों का न उट्ठा मुझ से
    वो अल्विदाह का मंज़र वो भीगती पलकें
    पसे ग़ुबार भी क्या क्या दिखाई देता है –शिकेब –
    दमे रुख़्सत कैसी भी आँखों का तकाज़ा बर्दाश्त नही होता !!!
    मुमताज़ नाज़ां सहबा!!यादे -माज़ी के धागों से बुनी हुई इस ग़ज़ल प आपको बहुत बहुत बधाई !! –मयंक

  7. कर रही थीं दमे-रुख़सत वो तक़ाज़ा मुझ से
    उम्र भर बोझ उन आँखों का न उट्ठा मुझ से

    kya hi accha matla hai mumtaz nazaan sahiba… waah waah waah

    खोयी रहती हूँ मैं माज़ी के सनमख़ानों में
    किस क़दर लिपटा हुआ है ये ख़राबा मुझ से

    ye she’r bhi khub pasand aaya…

    इक तमन्ना थी, कि पूरी किसी सूरत न हुई
    एक दिल था, कि हर इक गाम पे उलझा मुझ से
    aha… kya hi accha she’r… waah

    bahut acchi ghazal hui hai… daad qubul karen…

  8. वाह वाह। एेसे अशआर ही शायरी की जान और शान हैं ।

  9. FINE GHAZAL…EVERY SHER IS THOUGHTFUL …DAAD HAAZIR HAI…MUMTAZ JI

  10. Bahut khoobsoorat ghazal kahi hai aap ne. Mubaarakbaad.- Arun Kumar Nigam

  11. Kya zabardast ghazal kahi waah waah
    Mumtaz sahiba mubarakbaad qubool keejiye

  12. Mumtaaz Saheba, gazal bohot khoob hai, khaas taur par yeh sher mujhe bohot pasand aaya…. aur misre par girah lagayi hai woh bhi bohot khoob hai! Mubarakbaad kubool kare.

    जोड़ रक्खा था कई रिश्तों को जिस ने अब तक
    दफ़अतन टूट गया है वही धागा मुझ से

  13. वक़्त ने डाली हैं कुछ ऐसे ख़राशें रुख़ पर
    आज कल डरने लगा है मिरा साया मुझ स…
    wahhh wahhh..kya behatreen she’r hai…
    puri ghazal bahut umdaa hai..daad hazir hai
    -Kanha

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