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T-19/17 अच्छा बनने का नहीं होता दिखावा मुझसे-डॉ मुहम्मद ‘आज़म’

अच्छा बनने का नहीं होता दिखावा मुझसे
क्या करूँ सब को कहा जाये न अच्छा मुझसे

कमतरी के मुझे अहसास ने क्यों जकड़ा है
“साहिबो उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे”

इस हथेली में नहीं अच्छे दिनों की रेखा
देख कर हाथ नजूमी ने कहा था मुझसे

तू भी वैसा न रहा जैसा कभी दिखता था
वक़्त ने छीन लिया मेरा भी चेहरा मुझसे

आइना देख के हर सुब्ह यही लगता है
रोज़ मिलता है कोई ग़ैर-शनासा मुझसे

एक मुद्दत से हूँ महरूम ख़बर से उसकी
हो न हो मिल गया उसको कोई अच्छा मुझसे

है गरां तर्के-तअल्लुक़ मगर अहसान भी है
उसने अहसास का इक बोझ उतारा मुझसे

किसी कमतर किसी बेहतर की नहीं मुझ को तलाश
काश मिल जाये कोई शख्स तो मुझ सा मुझसे

नेकियाँ मैं भी समंदर में ही डाल आता हूँ
कह रहा था ये सिसकते हुए दरिया मुझसे

हूर तो खुल्द की मख्लूक़ हैं कल रात मगर
पैकरे-हूर में फिर कौन मिला था मुझसे

मन्ज़िलो ! पास मिरे दौड़ के आया न करो
रास्ते मांगते हैं नक़्शे-कफ़े-पा मुझसे

जागते रहने की आदत है बुरी मेरी मगर
सहने-शब में तो रहा करता है जलसा मुझसे

मैं भी ‘आज़म’ नहीं ख़ुश तर्ज़े-अमल से अपने
और है अपनों परायों को भी शिकवा मुझसे

डॉ मुहम्मद ‘आज़म’ 09827531331

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19 comments on “T-19/17 अच्छा बनने का नहीं होता दिखावा मुझसे-डॉ मुहम्मद ‘आज़म’

  1. badhiya ghazal hui hai azam sb. mubaraqbad qubul farmaeiN. dariya neki samandar ke alawa paikarenoor mein kyaa hee kamaal dikhaayaa hai aap ne bahut khoob.

  2. डॉ मुहम्मद ‘आज़म’साहब,

    आपकी ग़ज़ल कभी कभी भी निराश नहीं करती,इंतिज़ार कामयाब होता है। वाह वाह

  3. kya kehne, shaandaar ghazal inaayat ki hai,
    तू भी वैसा न रहा जैसा कभी दिखता था
    वक़्त ने छीन लिया मेरा भी चेहरा मुझसे

    आइना देख के हर सुब्ह यही लगता है
    रोज़ मिलता है कोई ग़ैर-शनासा मुझसे, jawaab hi nahin, aur “raasta maangte hain naqsh e kafe paa mujh se” ka bhi jawaab nahin

  4. Azam sahab..poori ghazal hi behtareen hui hai…

    इस हथेली में नहीं अच्छे दिनों की रेखा
    देख कर हाथ नजूमी ने कहा था मुझसे

    नेकियाँ मैं भी समंदर में ही डाल आता हूँ
    कह रहा था ये सिसकते हुए दरिया मुझसे

    तू भी वैसा न रहा जैसा तू कभी दिखता था
    वक्त ने छीन लिया मेरा भी चेहरा मुझसे

    मन्ज़िलो ! पास मिरे दौड़ के आया न करो
    रास्ते मांगते हैं नक़्शे-कफ़े-पा मुझसे
    par ye chaar she’r mujhe ghazal se aage le gaye… dher saari daad aur mubarakbaad…

    • aap ki daad ke liye dil se mashkoor huN JNB AATISH SAHIB…aap daad mere liye..hausla afza aur rooh afza hai…dil se shukrguzaar huN

  5. Mohtaram Dr. Azam Sb murassa ghazal ke liye dili mubarkbaad kubool kijiye!!

  6. Behad umdaa ghazal wahhh…kya behatreen ash’aar hain..

    इस हथेली में नहीं अच्छे दिनों की रेखा
    देख कर हाथ नजूमी ने कहा था मुझसे

    तू भी वैसा न रहा जैसा कभी दिखता था
    वक़्त ने छीन लिया मेरा भी चेहरा मुझसे

    एक मुद्दत से हूँ महरूम ख़बर से उसकी
    हो न हो मिल गया उसको कोई अच्छा मुझस

    in shero’n pe khaas daad qubule’n azam sahab..
    –Kanha

  7. भाई यूँ तो आपकी ग़ज़ल हर बार अच्छी आती है मगर इस बार क्या क़यामत के जोड़े निकले हैं. ये 6 शेर इस बार की किसी भी तरही ग़ज़ल में डाल दिये जायें, उसके हुस्न में इज़ाफ़ा ही नहीं करेंगे बल्कि उसे दुबाला कर देंगे. वाह वाह. दाद क़ुबूल फ़रमाइये

    इस हथेली में नहीं अच्छे दिनों की रेखा
    देख कर हाथ नजूमी ने कहा था मुझसे

    तू भी वैसा न रहा जैसा कभी दिखता था
    वक़्त ने छीन लिया मेरा भी चेहरा मुझसे

    एक मुद्दत से हूँ महरूम ख़बर से उसकी
    हो न हो मिल गया उसको कोई अच्छा मुझसे

    है गरां तर्के-तअल्लुक़ मगर अहसान भी है
    उसने अहसास का इक बोझ उतारा मुझसे

    मन्ज़िलो ! पास मिरे दौड़ के आया न करो
    रास्ते मांगते हैं नक़्शे-कफ़े-पा मुझसे

    जागते रहने की आदत है बुरी मेरी मगर
    सहने-शब में तो रहा करता है जलसा मुझसे

    • AAP KI PASANDEEDGI MERE LIYE BAHUT MAANE RAKHTI HAI JNB…AAP AIK SHER BHI MERI GHAZAL KA PASAND FARMA LEn…TO WO GHAZAL KAMYAAB MAANTA HUn…MAGAR AAJ TO AAP KI DARYADILI NE DIL KO BAGH BAAGH KAR DIYA…DIL KI GEHRAIYOn SE SHUKRGUZAAR HUn..JNB..

  8. अच्छा बनने का नहीं होता दिखावा मुझसे
    क्या करूँ सब को कहा जाये न अच्छा मुझसे
    अच्छा होने का दिखावा – खुदपरस्ती की खुदफरेबी के कारण भी होता है –और इस महीन ख्याल को बहुत सुन्दर पैकर दिया है इस शेर ने आपने डॉ आज़म साहब !!
    इस हथेली में नहीं अच्छे दिनों की रेखा
    देख कर हाथ नजूमी ने कहा था मुझसे
    तीरगी हम तेरे पुजारी हैं
    तेरे दामन मे चाँद तारे हैं
    वो जो अच्छे दिनो के हैं तालिब
    वो तो खुशतर गुमाँ के मारे है
    तू भी वैसा न रहा जैसा कभी दिखता था
    वक़्त ने छीन लिया मेरा भी चेहरा मुझसे
    अच्छा शेर कहा है !!! — जैसे दो श्ख़्स तमन्ना के सराबो मे मिले !!
    आइना देख के हर सुब्ह यही लगता है
    रोज़ मिलता है कोई ग़ैर-शनासा मुझसे
    सच है वक़्त इतने कम समय मे हमें इतना बदल देता है कि यकीन नहीं होता !!!
    है गरां तर्के-तअल्लुक़ मगर अहसान भी है
    उसने अहसास का इक बोझ उतारा मुझसे
    अगर इक बार मैँ रिश्ता किसी से तोड़ देता हूँ
    तो उसकी याद के सब ज़ाविये भी मोड़ देता हूँ
    दोबारा वापसी का रास्ता बाक़ी नहीँ रखता
    ग़ुबारे कारवाँ भी कारवाँ सँग छोड देता हूँ -सिराज फैसल खान

    किसी कमतर किसी बेहतर की नहीं मुझ को तलाश
    काश मिल जाये कोई शख्स तो मुझ सा मुझसे
    ज़िन्दगी की जुस्तजू तो दरस्ल यही है !!!!
    नेकियाँ मैं भी समंदर में ही डाल आता हूँ
    कह रहा था ये सिसकते हुए दरिया मुझसे
    खूब !! दाद !! दाद !!
    हूर तो खुल्द की मख्लूक़ हैं कल रात मगर
    पैकरे-हूर में फिर कौन मिला था मुझसे
    मन्ज़िलो ! पास मिरे दौड़ के आया न करो
    रास्ते मांगते हैं नक़्शे-कफ़े-पा मुझसे
    अना की बुलन्दी पर ये बयान खडा है !! खुदा बन्दे से उसकी जहाँ पर रिज़ा माँगता है उस जगह पर !!!
    जागते रहने की आदत है बुरी मेरी मगर
    सहने-शब में तो रहा करता है जलसा मुझसे
    नीन्दे तो नास हुई लेकिन रतजगा खूब जमा !!! खूब !!
    मैं भी ‘आज़म’ नहीं ख़ुश तर्ज़े-अमल से अपने
    और है अपनों परायों को भी शिकवा मुझसे
    मुहत्तरम डॉ मुहम्मद ‘आज़म’ साहब इस उस्तादाना बयान पर तालियाँ दाद और बधाई !!! –मयंक

    • AAP KI TAFSEELI DAAD KA BAHUT SHUKRIYA…KAI BAAR TO KISI SHER KI AAP KI TASHREEH SE NAYE MATALAB AUR MAQSAD UBHAR AATE HAIn…AAP NE JIS TARAH FARAAKHDILI SE MERE ASHAAR MUSBAT RAYE DEE HAI…DIL HO GAYA…BEHAD SHUKRGUZAAR HUn..KHUSH RAHIYE..

  9. Aazam sahab gazal bohot khub kahi aapne is sher per khas daad kubul farmaye …. नेकियाँ मैं भी समंदर में ही डाल आता हूँ
    कह रहा था ये सिसकते हुए दरिया मुझसे

    • SHUKRIYA…AASIF SB…AAP NE JO SHER ZIYADA PASAND FARMAYA HAI…US MEn MUHAAWARE KA FAYEDA UTHAYA HAI…DAAD KE LIYE SHUKRGUZAAR HUn

  10. अच्छा बनने का नहीं होता दिखावा मुझसे
    क्या करूँ सब को कहा जाये न अच्छा मुझसे

    इस हथेली में नहीं अच्छे दिनों की रेखा
    देख कर हाथ नजूमी ने कहा था मुझसे

    WAAH AAZAM SAHAB , MUBAARAKBAAD QABOOL KARE’N.

  11. तू भी वैसा न रहा जैसा तू कभी दिखता था
    वक्त ने छीन लिया मेरा भी चेहरा मुझसे
    वाह्ह वाह
    पूरी ग़ज़ल अच्छी है आज़म साहब
    दिली दाद

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