24 टिप्पणियाँ

T-19/15 मुझसे कुछ कम भी मिले कोई तो कहना मुझसे-आसिफ़ ‘अमान’

मुझसे कुछ कम भी मिले कोई तो कहना मुझसे
आप निकले हो यहाँ ढूँढने अच्छा मुझसे

फ़ैसला उसको नहीं भूलने का आया है
मेरा कब से था इसी बात का झगड़ा मुझसे

तिश्नगी ले के मैं लौटा तो दिखा प्यासा वो
कितनी उम्मीद लगा बैठा था दरिया मुझसे

ये भी ख़ाहिश है कि दुनिया पे हुकूमत कर लूं
और छोड़ा भी न जाये है क़बीला मुझसे

वज़्न बातों से बुरे वक़्त ने ऐसा नोचा
अब किसी बात पे होता नहीं चर्चा मुझसे

हिज्र ने उसको दिया है कोई मुझसे बेहतर
वरना वो ऐसे झिझक कर न लिपटता मुझसे

ज़िक्रे-दरिया भी मिरी प्यास अगर करती है
रूठ जाता है ये तपता हुआ सहरा मुझसे

ख़ाहिशें, इश्क़, ख़ुशी, बुग्ज़ो-हसद, ग़म सब थे
बाद मरने के तो कुछ भी नहीं निकला मुझसे

आसिफ़ ‘अमान’ 08233418156

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24 comments on “T-19/15 मुझसे कुछ कम भी मिले कोई तो कहना मुझसे-आसिफ़ ‘अमान’

  1. तिश्नगी ले के मैं लौटा तो दिखा प्यासा वो
    कितनी उम्मीद लगा बैठा था दरिया मुझसे

    ये भी ख़ाहिश है कि दुनिया पे हुकूमत कर लूं
    और छोड़ा भी न जाये है क़बीला मुझसे
    aasif sahab ,sabhi sher naayab hai matala lasani hai dheron daad kabool farmayan

  2. Aasif amaan bhai.. kya hi khuub ghazal hui hai.. saare she’r bahut pasand aaye..

    फ़ैसला उसको नहीं भूलने का आया है
    मेरा कब से था इसी बात का झगड़ा मुझसे

    ये भी ख़ाहिश है कि दुनिया पे हुकूमत कर लूं
    और छोड़ा भी न जाये है क़बीला मुझसे

    ye do she’r aur akhiri to qayaamat hain..bahut bahut umda…daad qubul keejiye

  3. Bahut Khoob Aasif bhaai! Poori ghazal pasand aai. Daad aur mubarakbaad leN.

  4. आसिफ़, मैं जो तुम्‍हे दाद दूं तो तुम उसे मुहब्‍बत कह सकते हो। मगर इतने सुख़नशनासों की दाद तुम्‍हारे कलाम को मिलना मेरी सोच को पुख्‍़तगी देता है। मुबारक।

  5. आसिफ़ अमान मेरी जान ज़िंदाबाद. आपके बुज़ुर्गों का नाम आपसे रौशन होगा. क्या क़यामत के शेर निकाले हैं. बहुत अच्छी तरक़्क़ी करते जा रहे हैं. दिन ब दिन कलाम में निखार आता जा रहा है. जीते रहिये, ख़ुश रहिये

  6. Aasif bhai saare sher pasand aaye…bahut khoob ghazal kahi hai…waaahhh

  7. Kya kahne asif bhai
    Umda ashaar kahe aapne
    Mubarakbaad qubool keejiye

  8. मुझसे कुछ कम भी मिले कोई तो कहना मुझसे
    आप निकले हो यहाँ ढूँढने अच्छा मुझसे
    वाह !! क्या मतला कहा है !! ये भी एक रंग है इज़हार का !! और कोई शक नही कि submission मे वो ताकत है जो आसमान के ज़र्फ़ मे भी नही !! पसमंज़र मे तंज़ भी खूब है !! आपकी हैसियत पर उठने वाले सवाल ऐसे ऐसे जवाब के सामने चित्त हो जाते हैं
    फ़ैसला उसको नहीं भूलने का आया है
    मेरा कब से था इसी बात का झगड़ा मुझसे
    जो मुम्किन नहीं वो करने की कोशिश एक मुद्दत से की जा रही है –यानी उसको भूलने की कोशिश !! इस बात को शेर मे सलीके से कहा है !!!
    तिश्नगी ले के मैं लौटा तो दिखा प्यासा वो
    कितनी उम्मीद लगा बैठा था दरिया मुझसे
    साहिल तमाम अश्के नदामत से अट गया
    दरिया से कोई शख़्स प्यासा पलट गया –शिकेब
    ये भी ख़ाहिश है कि दुनिया पे हुकूमत कर लूं
    और छोड़ा भी न जाये है क़बीला मुझसे
    ख्वाहिशें बहुधा सिधांत और व्यवहारिकता से ऊपर चली जाती है –या इसी कारण से उनका जन्म भी होता है जैसे कि –हम लम्बी उम्र तो चाहते हैं लेकिन बूढे नही होना चाहते !! ऐसे ही ख्याल पर शेर कहा है और अच्छा कहा है !! किसी दायरे मे बँध रूह जा हस्ती को कर वुस अत नही मिल सकती !!
    वज़्न बातों से बुरे वक़्त ने ऐसा नोचा
    अब किसी बात पे होता नहीं चर्चा मुझसे
    शेर का मफ्हूम जवाब मे लिखियेगा !!! शायद जो इज़हार का वकार था वो बुरे वक़्त ने कम कर दिया इसलिये अब मेरे बयान की कीमत नहीं ऐसे ख्याल को बाँधा है क्या ??!!
    हिज्र ने उसको दिया है कोई मुझसे बेहतर
    वरना वो ऐसे झिझक कर न लिपटता मुझसे
    कितनी सच्चाई से मुझसे ज़िन्दगी ने कह दिया
    तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जायेगा –बशीर
    ज़िक्रे-दरिया भी मिरी प्यास अगर करती है
    रूठ जाता है ये तपता हुआ सहरा मुझसे
    जिसका इख़्तियार मुझ पर है वो मुझे क्यों जुदा करना चाहेगा !! हथकडी कैदी को क्यों मुक्त करना चाहेगी ?!! बीमारी अपने शिकार को क्यों छोडना चाहेगी !! फिर यहाँ तो सहरा के कद्रदां की बात है !!
    जुज़ क़ैस कोई और न आया बरू ए कार
    सहरा मगर बतंगि ए चश्मे हुसूद था !!! –ग़ालिब !!
    ख़ाहिशें, इश्क़, ख़ुशी, बुग्ज़ो-हसद, ग़म सब थे
    बाद मरने के तो कुछ भी नहीं निकला मुझसे
    क्योंकि ये बदन किसी ज़ाविदाँ शै की परछाई है और साये बातिल होते हैं–
    ये जो सब खुशनुमा सितारे हैं
    परतबे ख़ुर के इस्तियारे हैं –मयंक
    आसिफ़ ‘अमान’ भाई !!! एक बहुत अच्छी गज़ल के लिये मुबारकबाद कुबूल कीजिये –मयंक

    • Bade bhai Mayank Awasthi sb maiN kya sabhi muntazir rehte haiN aapki tashreeh ke.. yeh bahot bada kaam hai jo aap bakhoobi anjaam dete haiN.. aapke is kamaal ko salaam!!
      aur yeh sher “वज़्न बातों से बुरे वक़्त ने ऐसा नोचा
      अब किसी बात पे होता नहीं चर्चा मुझसे” aisa hi kuch kehne ki koshish ki hai jaisa aapne likha hai.. ab hamse kisi baat ke tazkire aur mashvire naheeN hota bura waqt aane ke sabab etc..
      Shayad baat sher se clearnaheeN ho rahi hai?? aisa kuch ho to khul kar bataeiN aur aapke mashvire ka hamesha khairmakdam hai!!
      # Asif ‘Amaan’

  9. आसिफ भाई बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है
    सभी अशआर पसंद आये
    इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिये आपको ढेरों दाद

  10. Asif Bhai Kya badhiya ghazal hui hai. …matle Ne loot Lia Wahhh ..muqammal ghazal

    फ़ैसला उसको नहीं भूलने का आया है
    मेरा कब से था इसी बात का झगड़ा मुझसे

    तिश्नगी ले के मैं लौटा तो दिखा प्यासा वो
    कितनी उम्मीद लगा बैठा था दरिया मुझसे

    ये भी ख़ाहिश है कि दुनिया पे हुकूमत कर लूं
    और छोड़ा भी न जाये है क़बीला मुझसे

    हिज्र ने उसको दिया है कोई मुझसे बेहतर
    वरना वो ऐसे झिझक कर न लिपटता मुझस

    Ye she’r khaas tour pe pasand aaye …daad hazir hai. ..
    -kanha

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