11 टिप्पणियाँ

T-19/9 कब से शादाब है, आबाद है सहरा मुझसे-दिनेश नायडू

कब से शादाब है, आबाद है सहरा मुझसे
अश्कबारी का कोई सीखे सलीक़ा मुझसे

मुझको रो लेने दो अब टूट के रो लेने दो
ज़ब्त का हो नहीं पायेगा दिखावा मुझसे

वक़्त भी मुझ पे अब इल्ज़ाम लगाने लगा है
तब न गुज़रेगा यहाँ एक भी लम्हा मुझसे

गूंज बन कर जो भटकती है दिवाने की सदा
कुछ न कुछ तो है उस आवाज़ का रिश्ता मुझसे

पहले तकता है मुझे मुद्दतों ख़ामोशी से
और फिर बोलने लगता है अँधेरा मुझसे

रौशनी होती रही, जलता रहा मैं, फिर क्यूँ ?
हो गया शब की उदासी में इज़ाफ़ा मुझसे

कौन रहता है ख़मोशी में बता भी दीजे
कब से ये पूछ रहा है जुनूँ मेरा मुझसे

तुमको चाहा तो ये अहसास हुआ है मुझको
मुझमें रहता है कोई शख्स अलग सा मुझसे

‘रंग मुझमें भी है शायद कभी खिलता मैं भी
गर किसी रोज़ वो तस्वीर बनाता मुझसे

मेरी जानिब से तेरी ओर सदा नामुमकिन
मैं नहीं था ये कोई और पुकारा मुझसे

ज़िन्दगी छीन ले हाथों से मिरे तू पतवार
डूब जाये न कहीं तेरा सफ़ीना मुझसे

वो जो ताउम्र मिरे पास नहीं आ पाया
किसने सोचा था ख़लाओं में मिलेगा मुझसे

दिनेश नायडू 09303985412

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11 comments on “T-19/9 कब से शादाब है, आबाद है सहरा मुझसे-दिनेश नायडू

  1. आहा…..वाह….ज़िन्दाबाद दादा…..हो तो ऐसी…..

  2. कब से शादाब है, आबाद है सहरा मुझसे
    अश्कबारी का कोई सीखे सलीक़ा मुझसे BEHTAREEN MATLA ……… DAAD QABOOL KARE’N.

    ”वक़्त भी मुझ पे अब इल्ज़ाम लगाने लगा है” YE MISRA TYPIST KI BETAWAJJUHI KA SHIKAAR HO GAYA HAI ISE SAHI KARWAIYE JANAAB.

  3. waaah, behad haseen ghazal hai, chand ashaar ko chhod den to ghazal ko murassa keh sakte hain

  4. पहले तकता है मुझे मुद्दतों ख़ामोशी से
    और फिर बोलने लगता है अँधेरा मुझसे

    मेरी जानिब से तेरी ओर सदा नामुमकिन
    मैं नहीं था ये कोई और पुकारा मुझसे

    ज़िन्दगी छीन ले हाथों से मिरे तू पतवार
    डूब जाये न कहीं तेरा सफ़ीना मुझसे

    वाह दिनेश भाई, बढ़िया अशआर कहे हैं |
    दाद क़ुबूल कीजिये !!

  5. दिनेश भाई क्या कहूँ ,कहने को कुछ बचा ही नही
    निशब्द कर दिया आपने
    बला की खूबसूरत गज़ल है मेरे भाई

  6. kya hi behatreen ash’aar nikale hain bhaiya..wahhh
    मुझको रो लेने दो अब टूट के रो लेने दो
    ज़ब्त का हो नहीं पायेगा दिखावा मुझसे..masoom aur khubsoorat she’r
    ‘रंग मुझमें भी है शायद कभी खिलता मैं भी
    गर किसी रोज़ वो तस्वीर बनाता मुझसे….ahhaaa

    वो जो ताउम्र मिरे पास नहीं आ पाया
    किसने सोचा था ख़लाओं में मिलेगा मुझसे…daad qubule’n
    sadar
    -kanha

  7. सिन्फ़ेशायरी अपना सिक्का साथ ले कर चलती है। मिसरा-मिसरा बता देता है कि शायर ने किस दर्ज़ा तपस्या की है। बढ़िया ग़ज़ल के लिये भरपूर दाद।

  8. zindabaad meri jaan kya bharpoor ghazal kahi…is bharpoor ghazal ke liye bharpoor daad qubool keejiye,,,,

  9. dinesh poori ki poori ghazal umda hui hai bhai …waah waah.. matla ibehad khubsurat…

    वक़्त भी मुझ पे अब इल्ज़ाम लगाने लगा है
    तब न गुज़रेगा यहाँ एक भी लम्हा मुझसे

    पहले तकता है मुझे मुद्दतों ख़ामोशी से
    और फिर बोलने लगता है अँधेरा मुझसे

    ‘रंग मुझमें भी है शायद कभी खिलता मैं भी
    गर किसी रोज़ वो तस्वीर बनाता मुझसे

    मेरी जानिब से तेरी ओर सदा नामुमकिन
    मैं नहीं था ये कोई और पुकारा मुझसे

    ye she’r sabit karte hain ke tum lambi doori kee maar karne waali missile ho.. :P.. yaar bahut acche she’r hue hain… aur rang wala she’r to behad behad pasand aaya… daad qubul karo…

  10. Dinesh Bhai ghazal par daad to Phone par de hi chuka hooN, ab kya likhooN, raha saha kaam Tufail Dada ne poora kar diya.. Behad Mubarakbaad!!

    # Asif Amaan

  11. लीजिये हो गया काम. दिनेश जो कुछ मैं कह सकता था वो आप ने कह लिया. अब मेरे ग़ज़ल कहने की ज़रूरत ही ख़त्म हो गयी. बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है. यही वो शायरी है जो मुझे प्रिय है. ज़िंदाबाद प्यारे

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