33 टिप्पणियाँ

T-19/7 देखने में तो बज़ाहिर है वो अदना मुझसे-सौरभ शेखर

देखने में तो बज़ाहिर है वो अदना मुझसे
मोतबर दरिया में तिनका है ज़ियादा मुझसे

और अहसान किये जाती है दुनिया मुझ पर
जब कि पिछला ही अभी क़र्ज़ न उतरा मुझसे

ऐसे तकती हैं मुझे धूप, हवाएं, बारिश
जान को इनकी है जैसे कोई ख़तरा मुझसे

लोग फिरते हैं उठाये हुए दुनिया के ग़म
इक ग़मे-इश्क़ तअज्जुब है न संभला मुझसे

कुछ नहीं लगता मिरा है जो वो आईने में
हाँ ज़रा मिलता है उस शख्श का चेहरा मुझसे

एक धड़का सा लगा रहता है हर दम, पल-पल
‘साहिबो उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे’

इस पहेली को जो सुलझाओ तो मानूं तुमको
मैं नज़ारे से हूँ ‘सौरभ’ कि नज़ारा मुझसे.

सौरभ शेखर 09873866653

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33 comments on “T-19/7 देखने में तो बज़ाहिर है वो अदना मुझसे-सौरभ शेखर

  1. क्या बढ़िया ग़ज़ल हुई है दादा….
    और अहसान किये जाती है दुनिया मुझ पर
    जब कि पिछला ही अभी क़र्ज़ न उतरा मुझसे…

    क़माल….

  2. ACHCHHI GHAZAL HUI HAI JANAAB, MUBAARAKBAAD

  3. waah kya kehne, matla bahot khoob hai, aur ye sher kamaal hai
    कुछ नहीं लगता मिरा है जो वो आईने में
    हाँ ज़रा मिलता है उस शख्श का चेहरा मुझसे

  4. और अहसान किये जाती है दुनिया मुझ पर
    जब कि पिछला ही अभी क़र्ज़ न उतरा मुझसे | क्या कहने.. वाह !!

    लोग फिरते हैं उठाये हुए दुनिया के ग़म
    इक ग़मे-इश्क़ तअज्जुब है न संभला मुझसे | बहुत सुन्दर !

    कुछ नहीं लगता मिरा है जो वो आईने में
    हाँ ज़रा मिलता है उस शख्श का चेहरा मुझसे |

    बढ़िया ग़ज़ल पर दाद क़ुबूल कीजिये भाई सौरभ जी !!

  5. kya behatreen ghazal kahi hai bhaiya..wahhh…bahut umdaa
    और अहसान किये जाती है दुनिया मुझ पर
    जब कि पिछला ही अभी क़र्ज़ न उतरा मुझसे…wahhh…
    sadar
    -kanha

  6. Paheli result: Aapne apne child(baby) ke liye likha hai…

  7. ऐसे तकती हैं मुझे धूप, हवाएं, बारिश
    जान को इनकी है जैसे कोई ख़तरा मुझसे

    लोग फिरते हैं उठाये हुए दुनिया के ग़म
    इक ग़मे-इश्क़ तअज्जुब है न संभला मुझसे
    आ. सौरभ सा. उम्दा अशहार और नायाब ग़ज़ल है |ढेरों दाद कबूल फरमाएं |
    सादर

  8. सौरभ अच्छी ग़ज़ल कही है. वाह वाह. आपके स्वभाव के विपरीत है ये ज़मीन मगर आपने खूब काम किया है. मुबारकबाद

  9. देखने में तो बज़ाहिर है वो अदना मुझसे
    मोतबर दरिया में तिनका है ज़ियादा मुझसे
    खूब सौरभ भाई !! खूब !! गैर आबाद हल्को की सम्त आपने सोच को मोड दिया ..ये मतला इंस्तैंट उतरता है सोच पर और तात्री होता है !!!
    ऐसे तकती हैं मुझे धूप, हवाएं, बारिश
    जान को इनकी है जैसे कोई ख़तरा मुझसे
    फिर कमाल किया है – बेसबब हुआ है ग़ालिब दुश्मन आसमाँ अपना.. जैसी बात निकल रही है …
    लोग फिरते हैं उठाये हुए दुनिया के ग़म
    इक ग़मे-इश्क़ तअज्जुब है न संभला मुझसे
    फिर भी मैं कहूँगा कि गमे–इश्क़ अगर सच्चा है तो यह सिफत उसमे होती ही है बाकी गम उठाये जा सकते है ..
    कुछ नहीं लगता मिरा है जो वो आईने में
    हाँ ज़रा मिलता है उस शख्श का चेहरा मुझसे
    गुमाँ गुज़रता है ये शख़्स दूसरा है कोई !!! … आइने को देख कर ये कहने का अर्थ यही कि यकीन वसवसे की ज़द मे है … विभ्रम का मंज़र खूब उभारा है !!!
    एक धड़का सा लगा रहता है हर दम, पल-पल
    ‘साहिबो उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे’
    बढिया कहा !!!
    इस पहेली को जो सुलझाओ तो मानूं तुमको
    मैं नज़ारे से हूँ ‘सौरभ’ कि नज़ारा मुझसे.
    ये मुअम्मा है समझने का न समझाने का …. मैं सफर मे ही नहीं हूँ इक सफर मुझसे मे भी है .. —मयंक्

  10. Pori ghazal Achhi hai matle ke alaawa zinda baad Rauf Raza

  11. Bhai bhatija wad ki tarah ye daad waad bhi buri cheez hai Tufail Chaturvedi se milte raha karo

  12. Pori ghazal Achhi hai matle ke alaawa zinda baad

  13. saurabh bhai acchi ghzal hui hai..matle aur pahle she’r par bataure khaas daad qubul keejiye…

  14. Saurabh Bhai Achchi Ghazal ke mubarkbaad!! Matla baki Ash’aar se ziyada number le gya… dekhne maiN to bazahir hai…. waaaaah!!

    # Asif Amaan

  15. दिन बना दिया भाई। धुले-मँझे सड़्कोच-रहित मिसरों से बुने हुये अशआर से महकती ग़ज़ल के लिये दाद हाज़िर है। बहुत ख़ूब। मक़ते के मफ़हूम ने आप की फ़िक्र को शिकेब द्वारा उद्धृत गीता के उस तत्व के निकट ला खड़ा कर दिया है

    मैं ख़ुद ही जलवारेज़ हूँ, ख़ुद ही निगाहे-शौक़।
    शफ़्फ़ाफ़ पानियों पे झुकी डाल की तरह॥

    जीते रहिये।

  16. Saurabh bhaiya bahut umda gazal hai
    Puri gazal hi achhii hai
    Aakhiri k char sher to bahut umda hain
    Tarhi misre par kya hi khoobsoorat girah lagayi hai
    कुछ नहीं लगता मिरा है जो वो आईने में
    हाँ ज़रा मिलता है उस शख्श का चेहरा मुझसे
    क्या कहने वाह्ह्ह
    दिली दाद कुबूल कीजिये

  17. KYA KHOOB GHAZAL HUI SAURABH BHAI
    MATLE SE MAQTE TAK MAZA AAYAA
    MOGAMBO KHUSH HUA….HAHAHAHAHA
    MUBARAKBAAD QUBOOL KEEJIYE

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