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T-19/5 कल गले मिलके सिसकते हुए बोला मुझसे-आलोक मिश्रा

कल गले मिलके सिसकते हुए बोला मुझसे
अब न भूले से मिलेगा वो दुबारा मुझसे

हाल खुलता ही नही है कभी उसके दिल का
जब भी मिलता है वो मिलता है ज़रा सा मुझसे

राह में ज़ीस्त के क्या कुछ नहीं छूटा लेकिन
इक तिरा ख़ाब ही ताउम्र न छूटा मुझसे

अपने हाथों में मैं इक चाँद लिए बैठा हूँ
कितना ख़ुशरंग है हर ओर उजाला मुझसे

याद तुझको भी हो ऐ काश वो लम्हा जानां
आ के हमराह तू जिस रोज़ मिला था मुझसे

आ ही जाता है सरे-शाम अयादत को मिरी
जैसे ये चाँद हो सदियों का शनासा मुझसे

मैंने मुद्दत से कहाँ अपनी हँसी देखी है
क्या सितम है कि तिरा साथ भी छूटा मुझसे

वक़्त से हाथ मिलाते हुए डरता हूँ मैं
“साहिबो उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे”

आलोक मिश्रा 09711744221

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29 comments on “T-19/5 कल गले मिलके सिसकते हुए बोला मुझसे-आलोक मिश्रा

  1. वाह आलोक जी

  2. अलोक भाई शानदार ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद……वाह वाह….

  3. हाल खुलता ही नही है कभी उसके दिल का
    जब भी मिलता है वो मिलता है ज़रा सा मुझसे

    राह में ज़ीस्त के क्या कुछ नहीं छूटा लेकिन
    इक तिरा ख़ाब ही ताउम्र न छूटा मुझसे BAHUT KHOOB…… BADHAIYAA’N.

  4. wah wah, bahot khoob, bahot achhi ghazal kahi hai masha Allah

  5. हाल खुलता ही नही है कभी उसके दिल का
    जब भी मिलता है वो मिलता है ज़रा सा मुझसे | वाह, लाजवाब लाजवाब !!

    राह में ज़ीस्त के क्या कुछ नहीं छूटा लेकिन
    इक तिरा ख़ाब ही ताउम्र न छूटा मुझसे | वाह, बहुत सुन्दर !!

    मैंने मुद्दत से कहाँ अपनी हँसी देखी है
    क्या सितम है कि तिरा साथ भी छूटा मुझसे |

    अच्छी ग़ज़ल कही है आलोक भाई |
    दाद क़ुबूल कीजिये !!

  6. हाल खुलता ही नही है कभी उसके दिल का
    जब भी मिलता है वो मिलता है ज़रा सा मुझसे

    राह में ज़ीस्त के क्या कुछ नहीं छूटा लेकिन
    इक तिरा ख़ाब ही ताउम्र न छूटा मुझसे
    आलोक सा. खुबसूरत ग़ज़ल हुई है |ढेरों दाद कबूल फरमाएं |
    सादर

  7. आलोक बहुत अच्छी ग़ज़ल कही. आपको अपने उस्ताद इरशाद ख़ान सिकंदर साहब की सुहबत बहुत रास आ रही है. दिन ब दिन संवरते जा रहे हैं. जीते रहिये, ख़ुश रहिये

  8. Totally sold out !!!

  9. कल गले मिलके सिसकते हुए बोला मुझसे
    अब न भूले से मिलेगा वो दुबारा मुझसे
    hai ….. kya baat kahi !!!

    हाल खुलता ही नही है कभी उसके दिल का
    जब भी मिलता है वो मिलता है ज़रा सा मुझसे
    umda sher hai sahab

    वक़्त से हाथ मिलाते हुए डरता हूँ मैं
    “साहिबो उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे”
    kya umda girah
    daad kubool karen Alok ji

  10. alok nazar n lage… aalok badhta ja raha hai aapka… kya hi accha matl’a hua hai…
    राह में ज़ीस्त के क्या कुछ नहीं छूटा लेकिन
    इक तिरा ख़ाब ही ताउम्र न छूटा मुझसे

    अपने हाथों में मैं इक चाँद लिए बैठा हूँ
    कितना ख़ुशरंग है हर ओर उजाला मुझसे
    ye do she’r bhi bahut acche hue hain… dher saari mubarakbaad

  11. Wah kya kahna acchi ghazal wah wah

  12. कल गले मिलके सिसकते हुए बोला मुझसे
    अब न भूले से मिलेगा वो दुबारा मुझसे
    मतले का मंज़र न मिलने की बात कहने कहने वाले की बेबेसी बयान कर रहा है !!!
    हाल खुलता ही नही है कभी उसके दिल का
    जब भी मिलता है वो मिलता है ज़रा सा मुझसे
    ज़रा सा मुझसे !!! क्या बात है !! यह जदीद शाइरी असर छोड गई !!
    राह में ज़ीस्त के क्या कुछ नहीं छूटा लेकिन
    इक तिरा ख़ाब ही ताउम्र न छूटा मुझसे
    अच्छा शेर है !! और प्रत्येक अवरोह मे प्रेम के सातत्य की ओर इशारा कर रह है !!
    अपने हाथों में मैं इक चाँद लिए बैठा हूँ
    कितना ख़ुशरंग है हर ओर उजाला मुझसे !!!
    आ ही जाता है सरे-शाम अयादत को मिरी
    जैसे ये चाँद हो सदियों का शनासा मुझसे
    चाँद पर कहे गये दोनो शेर अच्छे हैं !!!
    वक़्त से हाथ मिलाते हुए डरता हूँ मैं
    “साहिबो उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे”
    बढिया गिरह है !! तर्ही मिसरे का अच्छा निर्वाह कर रही है
    आलोक भाई !!! गज़ल पर बधाई !! सितारो से आगे जहाँ और भी है !!!! –मयंक

    • मयंक भैया आपकी टिप्पड़ी के बिना कोई भी ग़ज़ल अधूरी रहती है ,आप जैसे बड़े भाई का मिलना नसीब की बात है
      आपके आशीर्वाद और मुहब्बत के लिए तहे दिल से शुक्रिया
      with regards

  13. Alok Bhai Shandar ghazal ke liye mubarkbaad!! aur matle ke baad wale sher par alag se daad waaaaah!!

  14. alok apki chamak dinodin badh rahi hai
    ye hamare liye bhi khushi kii baat hai .
    .is achchi ghazal ke liye aapko dheron duaayen..

    • Bahut bahut shukriya dada
      Aapka aashirwad aur aapki muhabbat hai
      आपका ही एक शेर बेसाख्ता मुंह से निकलता है

      मैं चराग़ से जला चराग़ हूँ
      रौशनी है पेशा ख़ानदान का

      Regards

  15. wahh wahhh..kya umdaa ghazal hai Alok bhai..har she’r lajawb hai..

    राह में ज़ीस्त के क्या कुछ नहीं छूटा लेकिन
    इक तिरा ख़ाब ही ताउम्र न छूटा मुझस..iske to kya kehne…daad qubule’n ..
    -Kanha

  16. Wah…Wah Alok Sahab….bade hi dil ke kareeb….laga hai aapka har she’r…aisa kabhi kabhar hi hota hai. Ki koi baat itne gahre uttar jaye..bahut bahut badhaai…itni sunder Ghazal ke liye

  17. Wah…Wah Alok Sahab….bade hi dil ke kareeb….laga hai aapka har she’r…aisa kabhi kabhar hi hota hai…bahut bahut badhaai…itni sunder Ghazal ke liye

  18. आलोक मेरे दोस्त मेरे भाई ,

    दिल खुश कर दिया आपने , क्या ही अच्छे अच्छे शेर निकाले हैं

    हाल खुलता ही नही है कभी उसके दिल का
    जब भी मिलता है वो मिलता है ज़रा सा मुझसे

    राह में ज़ीस्त के क्या कुछ नहीं छूटा लेकिन
    इक तिरा ख़ाब ही ताउम्र न छूटा मुझसे

    याद तुझको भी हो ऐ काश वो लम्हा जानां
    बनके हमराह तू जिस रोज़ मिला था मुझसे

    अच्छी शायरी , सच्ची शायरी , दिली दाद भाई , दिली दाद 🙂

  19. ये वो ज़ुबान है शायरी की जिस पे हमें नाज़ है।
    बहुत ख़ूब॥ शायर की जितनी तारीफ़ की जाये, कम होगी॥

  20. हाल खुलता ही नही है कभी उसके दिल का
    जब भी मिलता है वो मिलता है ज़रा सा मुझसे….Waah Aalok bhaai!

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