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T-19/4 – जब तेरे गम का कोई तार… मयंक अवस्थी

जब तेरे गम का कोई तार जुडा था मुझसे
माँग लेते थे महो-ख़ुर भी उजाला मुझसे

जिसकी आँखों मे घटा , जिसके लबों पे सहरा
तेरी फ़ुर्क़त ने वो किरदार निकाला मुझसे

मैं उसी मोड पे पत्थर सा खडा हूँ कि जहाँ
कौन है तू??!! ये मेरे ख्बाब ने पूछा मुझसे

दिल ही पत्थर को खुदा मान चुका है वर्ना
दूर काबा है , न है दूर कलीसा मुझसे

तू अबस दिल मे कोई गाँठ लिये बैठा है
काश दिल खोल के करता कभी चर्चा मुझसे

उसके चेहरों मे दिखा था कोई ऐसा चेहरा
उसका चेहरा न गया फिर कभी देखा मुझसे

मैने मलबूस दिये हैं तेरी उर्यानी को
और तू है कि किया करता है पर्दा मुझसे

मैने बगदाद की सूरत पे कोई दाद न दी
मेरी ज़ुर्रत पे है नाराज़ ख़लीफा मुझसे

जाने क्यूँ चाँद मेरे हाथ नहीं आता है
“साहिबो !! उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे”

मेरा दरिया मेरी आँखों मे मुकय्यद न रहा
अपना सरमाया गया खुद न समेटा मुझसे

अब मेरी राख उडा दे, ये मुनासिब है मगर
एक मुद्दत तो मिला तुझको , उजाला मुझसे

मयंक अवस्थी (8765213905)

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28 comments on “T-19/4 – जब तेरे गम का कोई तार… मयंक अवस्थी

  1. Mayank ji, aap ki gazal khoob hai jiske liye aap ko mubarakbaad! Aap ke is sher ko maine kai baar padha..
    तू अबस दिल मे कोई गाँठ लिये बैठा है
    काश दिल खोल के करता कभी चर्चा मुझसे

    Aur misre pe girah bhi bohot khoob hai!

  2. MAYANK SAHAB, EK BEHTAREEN TABSIRA NIGAAR KI BEHTAREEN GHAZAL PAR MAI’N KYA IZHAAR-E-KHAYAL KARU’N, KIS KIS SHER KI DAAD DU’N YAHA’N TO HAR SHER AABDAAR MOTI KI TARAH RAUSHNI BIKHER RAHA HAI. ALMUKHTASAR ””MURASSA”” GHAZAL HUI HAI, DHER SAARI MUBAARAK BAAD.

    • शफ़ीक़ रायपुरी साहब !! तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ !! बार बार पढता हूँ आपके कमेण्ट को और बार बार खुद पर भरोसा बढ जाता है !! संजीवनी मिलती है आपके दिये हौसले से – मयंक

  3. मैने मलबूस दिये हैं तेरी उर्यानी को
    और तू है कि किया करता है पर्दा मुझसे, waah, kya haseen sher hua hai, mubarak

  4. मयंक भाई साहब !

    प्रणाम।

    बहुत अच्‍छी ग़ज़ल के लिए हार्दिक आभार।
    किस शे’र को छोड़ें और किसे कोट करें…..यही बड़ी दुविधा हो जाती है जब आप जैसा शायर ग़ज़ल कहता है।
    दुख, टीस, हौसला, अना ……………………क्‍या क्‍या नहीं है यहां।

    बहुत देर और दूर तक तक साथ रहेंगे कई अश्‍आर।

    सादर
    नवनीत

    • नवनीत भाई !! कभी कभी उदासी कहती है कि –बिल्कुल तनहाई के आगोश मे चले जाओ !! गज़ल वज़ल सब खुद को भरमाने के बहाने हैं !! तब कुछ चेहरे तस्व्वुर मे उभर कर रोकते हैं कि नही यहाँ अकेले नही हो !! तुम्हारे अपने भी है –एक चेहरा जो ऐसे समय हमेशा मुकर्रर रहता है वो –नवनीत भाई आपका है !! आपकी हौसला अफ्ज़ई मेरे शाइर को साँसें देती है – मयंक

  5. जब तेरे गम का कोई तार जुडा था मुझसे
    माँग लेते थे महो-ख़ुर भी उजाला मुझसे

    जिसकी आँखों मे घटा , जिसके लबों पे सहरा
    तेरी फ़ुर्क़त ने वो किरदार निकाला मुझसे

    मेरा दरिया मेरी आँखों मे मुकय्यद न रहा
    अपना सरमाया गया खुद न समेटा मुझसे
    मरहबा मयंक जी। ये तीन अशआर ही काफ़ी हैं। तबीअत सैराब होगई।वाह साहब वाह।

  6. मयंक वाह वाह. बहुत उम्दा. पूरी ग़ज़ल ही बहुत अच्छी कही है. मुबारकबाद. आपसे उम्मीद भी रहती है मगर इस बार तो सनअत { अलंकार } इस्तेमाल की है. ये शेर सनअते-तज़ाद { विरोधाभासी अलंकार } का सुन्दर उदाहरण है.

    जिसकी आँखों मे घटा , जिसके लबों पे सहरा
    तेरी फ़ुर्क़त ने वो किरदार निकाला मुझसे

    • Dada Pranam aur abhaar !! maine ye ghazal ujalat me post ki kyonki is waqt mere bank me ek zaroori project chal raha hai lekin khushi is baat ki hai ki apako sher pasand aaye –regards –mayank

  7. mayan sahab
    namaskaar

    जब तेरे गम का कोई तार जुडा था मुझसे
    माँग लेते थे महो-ख़ुर भी उजाला मुझसे
    is sher ki adayagi kya khoob hai…. jaan leva !!!

    मैं उसी मोड पे पत्थर सा खडा हूँ कि जहाँ
    कौन है तू??!! ये मेरे ख्बाब ने पूछा मुझसे
    bolta hua sher !!!

    तू अबस दिल मे कोई गाँठ लिये बैठा है
    काश दिल खोल के करता कभी चर्चा मुझसे
    dostoN ke liya acchi peshkas hai bhai !!!

    मैने बगदाद की सूरत पे कोई दाद न दी
    मेरी ज़ुर्रत पे है नाराज़ ख़लीफा मुझसे
    kya himmmmmmmmat hai Waaah waah

    जाने क्यूँ चाँद मेरे हाथ नहीं आता है
    “साहिबो !! उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे”
    acchi girah daad kubool kareN

    अब मेरी राख उडा दे, ये मुनासिब है मगर
    एक मुद्दत तो मिला तुझको , उजाला मुझसे
    zindabaad

  8. Mayank bhaiya kya hi achhii gazal huii hai .ak ak sher ka meyar itna uncha hai ki kya kahu.sirf mehsoos kar pa raha hun
    मैंने मलबूस दिये हैं तेरी उर्यानी को ”
    यह मिसरा तो ज़हन से उतरने से रहा

    हर शेर ही उम्दा है
    पूरी की पूरी ग़ज़ल ही लाज़वाब है
    इस ज़बरदस्त गजल के लिए आपको लाखों दाद

    With regards

    • अपने हाथों में मैं इक चाँद लिए बैठा हूँ
      कितना ख़ुशरंग है हर ओर उजाला मुझसे
      alok !! aise sher khane vale shair ke humrah chalate huye umeedo aitbaar ka quantum zaroor badhata hai !! jeete rahiye !! -mayank

  9. bhaiya..der se comment ke liye muaafi ek din poore man se comment karne baitha tha par ek lambe phone call ne disturb kar diya,… kya hi accha matl’a hua hai….gham ke taar ka juda hona..aur ujala baantna..kya hi khubusart rabt hua hai dono misron men… waah waah..doosra she’r bhi behad umda hua hai… judaai kaise kaise manzar dikha deti hai…
    मैने मलबूस दिये हैं तेरी उर्यानी को
    और तू है कि किया करता है पर्दा मुझसे
    multiple dimension wala she’r hai… kya hi accha… dher saari daad..
    मेरा दरिया मेरी आँखों मे मुकय्यद न रहा
    अपना सरमाया गया खुद न समेटा मुझसे

    अब मेरी राख उडा दे, ये मुनासिब है मगर
    एक मुद्दत तो मिला तुझको , उजाला मुझसे
    ye do she’r bhi kamaal ke hue hain….. bahut bahut mubarak is acchi ghazal ke liye

  10. जिसकी आँखों मे घटा , जिसके लबों पे सहरा
    तेरी फ़ुर्क़त ने वो किरदार निकाला मुझसे …ye mukammal sher ne aur in tukdon ko तार जुडा था,मैने मलबूस दिये हैं तेरी उर्यानी को,चाँद मेरे हाथ नहीं आता है,अब मेरी राख उडा दे…je chahta hai chura loon ….is achchi ghazal ke liye bahut bahut mubarakbaad bade bhai….

  11. जब तेरे गम का कोई तार जुडा था मुझसे
    माँग लेते थे महो-ख़ुर भी उजाला मुझसे

    वाह …मतले में ही एक मुक़म्मल ग़ज़ल सिमट आयी है

    जिसकी आँखों मे घटा , जिसके लबों पे सहरा
    तेरी फ़ुर्क़त ने वो किरदार निकाला मुझसे

    अज़ल ता कयामत तिश्नगी का सिल्सिला ……………………

    मैं उसी मोड पे पत्थर सा खडा हूँ कि जहाँ
    कौन है तू??!! ये मेरे ख्बाब ने पूछा मुझसे

    दिल ही पत्थर को खुदा मान चुका है वर्ना
    दूर काबा है , न है दूर कलीसा मुझसे
    दोनों शेरों का पत्थर एक ही बिम्ब का हुस्न खूबसूरती के साथ उभार रहा है

    तू अबस दिल मे कोई गाँठ लिये बैठा है
    काश दिल खोल के करता कभी चर्चा मुझसे

    मैने मलबूस दिये हैं तेरी उर्यानी को
    और तू है कि किया करता है पर्दा मुझसे
    वा…ह बिल्कुल अनछुआ ख्याल ,अनसुनी कल्पना , अनकहा शिकवा

    आ. मयंक भाईसाहब नायाब ग़ज़ल हुई है |ढेरों ढेरों दाद
    सादर

    • Muhabbat ko slaam Khursheed bhai !!!aap tabsaraa bhi dil se karate hain aur ghazal bhi dil se kahate hain !!! Is portal ko samraddha kiya hai apane !! shukriya aur duaayein –mayank

  12. Hamesha ki tarah bharpoor ghazal…Matle se aakhiri she’r tak wahhh wahhh…
    जाने क्यूँ चाँद मेरे हाथ नहीं आता है
    “साहिबो !! उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे”..kya.khoobsoorat.girah lgai hai dada

    उसके चेहरों मे दिखा था कोई ऐसा चेहरा
    उसका चेहरा न गया फिर कभी देखा मुझस..aur ye she’r to ufff
    ..kya kehne
    sadar pranam
    -kanha

  13. मैने मलबूस दिये हैं तेरी उर्यानी को
    और तू है कि किया करता है पर्दा मुझसे…kya kahne sir!

  14. जुगनुओं में आफ़ताब तलाशने वाले किरदार की ग़ज़ल पर मेरे जैसा अदना सा बन्दा क्या कहे। आप तो तिनकों में से भी मनके निकाल लेते हैं। इस बेहद शानदार ग़ज़ल के लिये बहुत-बहुत बधाई। एक ख़ूबी हो तो बयान की जाये। फिर भी एक बात ज़रूर कहना चाहूँगा कि जहाँ मेरे जैसे लोग पेचीदगियों से डर कर मज़बूरन डगर बदलने लगते हैं, आप उन्हीं पुराने सिम्बल्स में से नये मफ़हूम खोज निकालते हैं। यह बड़ी बात है और मैं यह बात ब-हक़ कह रहा हूँ। प्रणाम।

    • bus Naveen bhai !!Aapne shukriya kahane qabil bhi nahin rakha mujhe !! Is tararef ke laayak nahin hun lekin apaki muhabbat ko salaam aur is prem ka hamesha talabgaar hun –mayank

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