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T-19/3 वो किसी तौर, कहीं भी नहीं मिलता मुझसे-दिनेश कुमार स्वामी ‘शबाब’ मेरठी

वो किसी तौर, कहीं भी नहीं मिलता मुझसे
सिर्फ़ टकराता है अब उसका अँधेरा मुझसे

बूंद पड़ते ही उभर आया है पौधे की तरह
धूल में वो जो कोई नाम गिरा था मुझसे

पहली बरसात में ख़ुश हो के बहुत फूल गया
दिल का दरवाज़ा कभी बंद न होगा मुझसे

इसलिए झील सी आँखों में तिरी डूब गया
ज़िन्दगी में न कभी तैरना आया मुझसे

साल हा साल से आँखों में छुपा बैठा है
कितना मानूस है सावन का महीना मुझसे

फिर से हो जाये न मुझ पर कहीं वहशत तारी
मिलने आया है बड़ी दूर से सहरा मुझसे

संगदिल अब मिरे नालों का भरम टूट गया
क्यों तिरे सीने का पत्थर नहीं टूटा मुझसे

ऐ जुनूं मेरे जुनूं फाड़ के रख दे मुझको
अब नहीं होता है हर वक़्त तमाशा मुझसे

आँखें ख़ाली हुईं, चेहरे से हँसी ग़ायब है
और क्या लेता वो अब इससे ज़ियादा मुझसे

बंद होतीं ही नहीं आँखें कि थोड़ा सो लूँ
साफ़ होता भी नहीं नींद का जाला मुझसे

लफ्ज़ ही थे न दलीलें थीं मुहब्बत के ख़िलाफ़
और भी इस लिये वो चीख़ के बोला मुझसे

कितने चिपकाये थे होटों पे हँसी के टुकड़े
हाल क्यों पूछ लिया बाबा रे बाबा मुझसे

मैं अँधेरा नहीं होता तो चमकते कैसे
जुगनुओ तुमको भी मिलता है सहारा मुझसे

अपनी उखड़ी हुई सांसों से ये महसूस हुआ
दूर जाता हो कोई जैसे परिंदा मुझसे

सबकी नावों ने यहाँ डाल दिये हैं लंगर
अब सफ़र दोस्तो पूरा नहीं होगा मुझसे

मैंने सोचा है कि अब और ख़ुशामद न करूँ
वरना हो जायेगा मेरा ये मैं धुंधला मुझसे

फिर से बाज़ार में महंगाई बढ़ाने वाला
छीन कर ले गया इक और निवाला मुझसे

मैंने आवाज़ उठायी ही थी कि मालूम हुआ
हो गया ज़िंदा ये मुर्दों का इलाक़ा मुझसे

दिनेश कुमार स्वामी ‘शबाब’ मेरठी 09997220102

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14 comments on “T-19/3 वो किसी तौर, कहीं भी नहीं मिलता मुझसे-दिनेश कुमार स्वामी ‘शबाब’ मेरठी

  1. भरपुर ग़ज़ल हुई है दिनेश सर…..वाह…मज़ा आ गया…

  2. साल हा साल से आँखों में छुपा बैठा है
    कितना मानूस है सावन का महीना मुझसे WAAH KYA KAHNE, BADHAAYI

  3. वो किसी तौर, कहीं भी नहीं मिलता मुझसे
    सिर्फ़ टकराता है अब उसका अँधेरा मुझसे

    बूंद पड़ते ही उभर आया है पौधे की तरह
    धूल में वो जो कोई नाम गिरा था मुझसे

    मैंने आवाज़ उठायी ही थी कि मालूम हुआ
    हो गया ज़िंदा ये मुर्दों का इलाक़ा मुझसे

    साल हा साल से आँखों में छुपा बैठा है
    कितना मानूस है सावन का महीना मुझसे

    फिर से हो जाये न मुझ पर कहीं वहशत तारी
    मिलने आया है बड़ी दूर से सहरा मुझसे

    Sir,

    Kya hi achhe sher hue hai…. Aankhe chaundhiya gayi in shero ki raushni se… Waah…

    Bharpoor Gazal hui hai… Padh kar dil khush ho gaya 🙂

  4. कितने चिपकाये थे होटों पे हँसी के टुकड़े
    हाल क्यों पूछ लिया बाबा रे बाबा मुझसे
    ******************************************
    मैंने सोचा है कि अब और ख़ुशामद न करूँ
    वरना हो जायेगा मेरा ये मैं धुंधला मुझसे
    **********************************************
    फिर से बाज़ार में महंगाई बढ़ाने वाला
    छीन कर ले गया इक और निवाला मुझसे

    दिलों को लूट लेने वाली ग़ज़ल……

  5. बूंद पड़ते ही उभर आया है पौधे की तरह
    धूल में वो जो कोई नाम गिरा था मुझसे
    पूरी ग़ज़ल के लिये दिली दाद

  6. बंद होतीं ही नहीं आँखें कि थोड़ा सो लूँ
    साफ़ होता भी नहीं नींद का जाला मुझसे
    मैं अँधेरा नहीं होता तो चमकते कैसे
    जुगनुओ तुमको भी मिलता है सहारा मुझसे
    भई अच्‍छे अशआर हैं। वाह वाह।

  7. बूंद पड़ते ही उभर आया है पौधे की तरह
    धूल में वो जो कोई नाम गिरा था मुझसे
    waah zindabad

    साल हा साल से आँखों में छुपा बैठा है
    कितना मानूस है सावन का महीना मुझसे
    ye sher bhi kya khoob raha

    ऐ जुनूं मेरे जुनूं फाड़ के रख दे मुझको
    अब नहीं होता है हर वक़्त तमाशा मुझसे
    kya andaz e bayaN hai sahab

  8. shabab sahab aap mere behad pasandeeda shayar hain.. aur aisi ghazalen ye bataati hain k kyun hain.. kya hi umdaah..kya hi acchi.. kuch khayal to bilkul anchhue… dher saari daad

  9. हाल क्यों पूछ लिया बाबा रे बाबा मुझसे ……Shabaab saahb aapki is ghazal ke baad..’Aur tarhi me kahne ko kya rah gaya?’

  10. badhiya ghazal hai bhai, bahut khoob

  11. वो किसी तौर, कहीं भी नहीं मिलता मुझसे
    सिर्फ़ टकराता है अब उसका अँधेरा मुझसे
    बीती ताहि बिसारि दे !! शबाब साहब !! अन्धेरा –इस लफ्ज़ ने नूर भर दिया है शेर मे !!!
    बूंद पड़ते ही उभर आया है पौधे की तरह
    धूल में वो जो कोई नाम गिरा था मुझसे
    अश्के बेज़ुबान की सिफत बयाँ की है और खूब बयाँ की है !!!
    पहली बरसात में ख़ुश हो के बहुत फूल गया
    दिल का दरवाज़ा कभी बंद न होगा मुझसे
    दिल बच्चा है दिल ज़िद्दी है दिल उमीद है दिल रौनके हयात है !! क्या बात है क्या बात है !!!
    इसलिए झील सी आँखों में तिरी डूब गया
    ज़िन्दगी में न कभी तैरना आया मुझसे
    मुहब्बत बेशऊर कर देती है मुहब्ब्त नातवाँ बना देती है-मुहब्बत कासिर कर देती है –पहले आदमी काम का होता है मुहब्बत के बाद नाकाम हो जाता- लेकिन मुहब्बत एक ज़रूरी हादसा है ज़िन्दगी केलिये !!!
    फिर से हो जाये न मुझ पर कहीं वहशत तारी
    मिलने आया है बड़ी दूर से सहरा मुझसे
    क्या बात है क्या खूब !! तसव्वुर मे क़ैस जाग गया –सहरा जाग गया और वहशत जाग गई !! शेर ने माहौल को पहले हौले से फिर यकलख़्त ज़िन्दा कर दिया !!
    संगदिल अब मिरे नालों का भरम टूट गया
    क्यों तिरे सीने का पत्थर नहीं टूटा मुझसे
    हज़ारो जुगनुओ से भी अंधेरा कम नही होता !!
    ऐ जुनूं मेरे जुनूं फाड़ के रख दे मुझको
    अब नहीं होता है हर वक़्त तमाशा मुझसे
    मज़ाज़ की नज़्म मे एक ख्याल है –जे मे आता है ये मुर्दा चँद तरे नोच लूँ –एक दो की बात क्या सारे के सारे नोंच लूँ – यहाँ –गिरे पदे और बेहद उर्याँ लफ्ज़ – शऊरी हो जाते हैं मुहत्तरम हो जाते है –फाद के राखी दे –इस जुमले को ज़ीनत बख़्श दी आपके शेर ने !!1
    आँखें ख़ाली हुईं, चेहरे से हँसी ग़ायब है
    और क्या लेता वो अब इससे ज़ियादा मुझसे
    अच्छी सूरत वाला लुटेरा सब ले गया !! क्या बचा आपके पास एक मुसल्ल्सल खला के सिवा !!!)”):
    बंद होतीं ही नहीं आँखें कि थोड़ा सो लूँ
    साफ़ होता भी नहीं नींद का जाला मुझसे
    नींद का जाला ये सिम्बल पसन्द आया और शेर मे तो अरूज़ पर है !!
    कितने चिपकाये थे होटों पे हँसी के टुकड़े
    हाल क्यों पूछ लिया बाबा रे बाबा मुझसे
    हंसी ओढी जाती है और हँसी बिछाई जाती है –सच है हमारे खोखलेपन की सनद होती है हमारी हंसी !!
    मैं अँधेरा नहीं होता तो चमकते कैसे
    जुगनुओ तुमको भी मिलता है सहारा मुझसे
    किसी की सख़ गिरा कर कोई नाम करता है अज के दौर मे –वाह !!!
    अपनी उखड़ी हुई सांसों से ये महसूस हुआ
    दूर जाता हो कोई जैसे परिंदा मुझसे
    क्या खूबसूरत मंज़र है –अल्विदाह का !!
    फिर से बाज़ार में महंगाई बढ़ाने वाला
    छीन कर ले गया इक और निवाला मुझसे
    स्माजवादे सोच के लिये आप मशहूर हैं मालिक !! तस्लीम !!!
    मैंने आवाज़ उठायी ही थी कि मालूम हुआ
    हो गया ज़िंदा ये मुर्दों का इलाक़ा मुझसे
    आपकी आवज़ ने मुर्दो के इलाके को मर्दो का इलाका बना दिया !!!
    ‘शबाब’ मेरठी साहब !! मेरठ ही नही दूर दूर तक शबाब है आपका बस आपका !! – बहुत दिल्कश गज़क कही है –मयंक

  12. dil ka darwaja kabhi band n hoga mujhse…………….naya khyaal……..wah…..

  13. Shabab sahab kya hi achhi gazal huii hai ,har sher hi zabardast hai
    man hi man duhraaye ja raha hun bas

    aapko dher sari daad

    Sadar

  14. भरपूर ग़ज़ल….मुकम्मल ग़ज़ल ….बड़ी ग़ज़ल…तारीफ से बालातर…ज़िंदाबाद…ज़िंदाबाद…ज़िंदाबाद

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