44 टिप्पणियाँ

T-19/1 टिमटिमाते हुए बोला ये सितारा मुझसे-स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

टिमटिमाते हुए बोला ये सितारा मुझसे
कोई भी रंग ख़ला का हो खिलेगा मुझसे

एक दीवार ने माँगा है सहारा मुझसे
सो अलग हो गया है मेरा ही साया मुझसे

कातता जाता हूँ मैं तेरा तसव्वुर सुब्ह-शाम
टूट जाये न तेरी याद का चरखा मुझसे

जिससे इक ज़ायक़ा रहता था उदासी में मिरी
खो गयी याद के केसर की वो डिबिया मुझसे

देख तो कैसा ये सब्ज़ा सा बपा है हर सू
ले गया था वो हरे रंग की पुड़िया मुझसे

मैं बढ़ा था नई दुनिया की तरफ़ जो लेकर
खो गया है तेरी यादों का वो नक़्शा मुझसे

या तो इक जिस्म हो ये या मैं धुंआ हो जाऊं
यूँ ही लिपटा न रहे वरना ये कुहरा मुझसे

जाने क्यों ख़ुद से ही डरता हूँ अकेले में मैं
‘साहिबो ! उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे’

जान देने में भी दुश्वारियां इतनी हैं कि बस
यार ये काम नहीं होगा दुबारा मुझसे

दूर तक कुछ भी नहीं तेरे तबस्सुम के सिवा
कर न ले अब ये जज़ीरा भी किनारा मुझसे

कौन सी राह गुज़रती है सहर से बचकर
रास्ता पूछ रहा है ये सितारा मुझसे

जिस्म से टूट के बिखरे हैं हज़ारों जुगनू
हो गया रात की मुट्ठी में उजाला मुझसे

मैं तो ममनून हूँ मशकूर हूँ ऐ मौत तिरा
तूने इस जिस्म का आसेब उतारा मुझसे

मेरी सहरा में तलाशी तो कई बार हुई
एक सूखा हुआ बादल भी न निकला मुझसे

क्यूँ न फ़िलहाल ये दीपक ही जलाऊँ ‘आतिश’
वो भी दिन आयेगा सूरज भी जलेगा मुझसे

स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’ 08879464730

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44 comments on “T-19/1 टिमटिमाते हुए बोला ये सितारा मुझसे-स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

  1. जान देने में भी दुश्वारियां इतनी हैं कि बस
    यार ये काम नहीं होगा दुबारा मुझसे

    क़माल है दादा….आप हर रंग से खेल लेते हैं…..

    सादर

  2. जिस्म से टूट के बिखरे हैं हज़ारों जुगनू
    हो गया रात की मुट्ठी में उजाला मुझसे

    मैं तो ममनून हूँ मशकूर हूँ ऐ मौत तिरा
    तूने इस जिस्म का आसेब उतारा मुझसे

    मेरी सहरा में तलाशी तो कई बार हुई
    एक सूखा हुआ बादल भी न निकला मुझसे

    क्यूँ न फ़िलहाल ये दीपक ही जलाऊँ ‘आतिश’
    वो भी दिन आयेगा सूरज भी जलेगा मुझसे

    WAAH SWAPNIL SAHAB KYA MUNFARID LAB-O-LAHJE ME’N ASH’AAR NIKALE HAI’N, ”MUBAARAKBAAD”

  3. वाह, बहुत खूब स्वप्निल भाई !
    दिली दाद क़ुबूल कीजिये..

    कातता जाता हूँ मैं तेरा तसव्वुर सुब्ह-शाम
    टूट जाये न तेरी याद का चरखा मुझसे |

    मैं बढ़ा था नई दुनिया की तरफ़ जो लेकर
    खो गया है तेरी यादों का वो नक़्शा मुझसे |

    जान देने में भी दुश्वारियां इतनी हैं कि बस
    यार ये काम नहीं होगा दुबारा मुझसे | क्या बात है वाह !!

    क्यूँ न फ़िलहाल ये दीपक ही जलाऊँ ‘आतिश’
    वो भी दिन आयेगा सूरज भी जलेगा मुझसे |

    बहुत खूब ! बहुत खूब !!

  4. स्‍वप्निल भाई,
    बहुत अच्‍छी ग़ज़ल। जितनी तारीफ़ की जाए उतनी कम।
    नवनीत

  5. मेरी सहरा में तलाशी तो कई बार हुई
    एक सूखा हुआ बादल भी न निकला मुझसे

    मैं तो ममनून हूँ मशकूर हूँ ऐ मौत तिरा
    तूने इस जिस्म का आसेब उतारा मुझसे

    जान देने में भी दुश्वारियां इतनी हैं कि बस
    यार ये काम नहीं होगा दुबारा मुझसे

    Swapnil Bhaiyya,

    Aise sher sochne par majboor kar dete hai ki hum kya likh rahe hai !!!

    Asli shayari to ye hai… Waah… Is paanch sitara gazal ke liye bahut bahut badhai 🙂

  6. स्वप्निल जी पूरी ग़ज़ल कमाल हुई है …बधाई

  7. Swapnil Bhai Shandaar agaaz, matle se makte tak firk o khyaal ki tazgi aur usloob ki infradiyat barqarar rahi.. maza aa gya.. waaaaah!!

    # Asif Amaan

  8. kash mere paas taarif ke liya alfaaz bache hote….. !!!!

  9. MaiN to mamnoon huN mashkoor huN ay maut tira..
    Tu ne is jism ka aaseb utara mujh se..
    …waahhhh…
    kya khoob sher aur kya mukammal ghazal kahi hai…pahli hi pesh kash…ke paDhne ke baaD…ahle bazm se maiN poochne par bazid huN…

    AIK BHI SHER RAQAM KYUn NAHIn HOTA MUJH SE
    “SAAHIBO UTH GAYA KYA MERA BHAROSA MUJH SE”
    …DR .AZAM

  10. Lajawab matla..khoobsurat ghazal..nayab ash’aar…
    जिससे इक ज़ायक़ा रहता था उदासी में मिरी
    खो गयी याद के केसर की वो डिबिया मुझस…kya kehne dada…behatreen..
    sadar pranam
    -kanha

  11. Chuninda tashbeehaat aur taaza istaare! Aapki shayri khoob shayri hai bhaai!

  12. एक मुकम्मल गज़ल है ये –मतले मे अना और विश्वास – अलग हो गये साये मे हकीकत – याद के चरखे मे –नास्तेल्जिया – हरे रेंज की पुडिया मे विप्रलम्भ का माधुर्य – यादो के नक्शे मे भटकन –धुनाँ –कुहरे का वसवसा – तनहाई का डर – तब्स्सुम के जजेरे की आखिरी उमीद –सितारे की सचाई – जिसमे के जुगनुओ मे शहादत – मौत को शुक्रिया मे फल्स्फहा – शरा की तलाशी मे दौरे हाज़िर का दबाव – और मक़्ते मे अना के बुलन्दी उमीद के साथ – इतने रंग इतना संगीत –इतनी जदीदियत – सिर्फ उअर सिर्फ एक ही नाम से मंसूब हो सकती है – मैने स्वप्निल के लिये गलत नही कहा था — तू अव्वल था,अव्वल है , अव्वल रहेगा /// बता तेरा सानी कहाँ है कहाँ है !!!??
    जियो स्वनिल –”आतिश” –अब तुम नामो – तख़ल्लुस बदल लो –तुम बेदार आफताब हो अब !!!

  13. जिससे इक ज़ायक़ा रहता था उदासी में मिरी
    खो गयी याद के केसर की वो डिबिया मुझसे
    Vaah kya khoobsurat she’r hai Janaab! Badhayi!

  14. स्वप्निल भैया
    क्या ही अच्छी गज़ल हुई है
    याद का चरखा,केसर की डिबिया

    वाह्ह वाह्ह
    मज़ा आ गया
    एक और खूबसूरत ग़ज़ल के लिए
    आपको लाखों दाद

    With regards

  15. जियो मेरी जान, क्या ही अच्छी ग़ज़ल कही है. ताज़ा ख़याल और अगर ख़याल पुराना तो उस्लूब नया आपका ख़ासा है सो इस बार भी निभा. बहुत अच्छी ग़ज़ल. ज़िंदाबाद

  16. एक दीवार ने माँगा है सहारा मुझसे
    सो अलग हो गया है मेरा ही साया मुझसे

    कातता जाता हूँ मैं तेरा तसव्वुर सुब्ह-शाम
    टूट जाये न तेरी याद का चरखा मुझसे

    जिससे इक ज़ायक़ा रहता था उदासी में मिरी
    खो गयी याद के केसर की वो डिबिया मुझसे
    आ . स्वप्प्निल सा. एक से बढ़कर एक शेर , मज़ा आ गया ,,ढेरों दाद ….उम्दा ग़ज़ल , ताज़ा तसव्वुर
    सादर ‘खुरशीद’ खैराड़ी

  17. एक दीवार ने माँगा है सहारा मुझसे
    सो अलग हो गया है मेरा ही साया मुझसे

    कातता जाता हूँ मैं तेरा तसव्वुर सुब्ह-शाम
    टूट जाये न तेरी याद का चरखा मुझसे

    जिससे इक ज़ायक़ा रहता था उदासी में मिरी
    खो गयी याद के केसर की वो डिबिया मुझसे
    आ . स्वप्प्निल सा. एक से बढ़कर एक शेर , मज़ा आ गया ,,ढेरों दाद ….उम्दा ग़ज़ल , ताज़ा तसव्वुर
    सादर

  18. Aapke yahan Makta hamesha hi bahut gazab hota hai…..kya hi shandar….wah…dheron daad🙏

  19. Swapnil as usual baDhiya ghazal. DheroN duaayeiN.

    Aap k yahaN ek kafi achchha sher ho gayaa hai. Is k lie vishesh ashirwad.

    या तो इक जिस्म हो ये या मैं धुंआ हो जाऊं
    यूँ ही लिपटा न रहे वरना ये कुहरा मुझसे

    Shanawar ko lalkaartaa huaa sher

  20. kya hi shandaar aaghaaz hua tarhi ka ….
    ghazal bilkul waisi hi jaisi hona chahiye
    swapnil bhai mubarakbaad qubool keejiye….

  21. ‘आतिश’साहब,
    या तो इक जिस्म हो ये या मैं धुंआ हो जाऊं
    यूँ ही लिपटा न रहे वरना ये कुहरा मुझसे
    मैं तो ममनून हूँ मशकूर हूँ ऐ मौत तिरा
    तूने इस जिस्म का आसेब उतारा मुझसे
    ऐसे अच्‍छे शै’र होजाएं तो फिर क्‍या चाहिये।

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