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ग़ज़ल-सौरभ शेखर

फ़ज़ा का हब्स चीरती हुई हवा उठ्ठे
सफ़र में धूप है बहुत कोई घटा उठ्ठे

फिराये ज़िस्म पर मिरे वो उँगलियाँ ऐसे
कि साज़े-रूह मेरी आज झनझना उठ्ठे

जो और कुछ नहीं तो जुगनुओं को कर रक्सां
सियाह शब ज़रा-ज़रा सी जगमगा उठ्ठे

मिरी तरह तमाम लोग बेज़ुबां तो नहीं
किसी तरफ़,किसी जगह से मसअला उट्ठे

मिरा फ़ितूर ख़ुद सदायें दे मुझे मंज़िल
क़दम को चूमने मिरे ये रास्ता उठ्ठे

न जाने सुहबतों में उसकी है नशा कैसा
कि दर से उसके हर इक शख़्स झूमता उठ्ठे

करे तो ज़िंदगी में ऐसा कुछ करे ‘सौरभ’
मिरी नज़र में तेरा यार मर्तबा उठ्ठे.

सौरभ शेखर 09873866653

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10 comments on “ग़ज़ल-सौरभ शेखर

  1. ahaaa…kya umdaa ghazal hai bhaiya..

    फिराये ज़िस्म पर मिरे वो उँगलियाँ ऐसे
    कि साज़े-रूह मेरी आज झनझना उठ्ठे..

    ये शेर तो हमें दे दीजिये…सादर
    -कान्हा

  2. सौरभ !!!खूब शेर कहे हैं !! गज़ल पर दाद !! इस शेर ने अपने शिल्प और ध्वन्यनुसरिता से मोह लिया —
    फिराये ज़िस्म पर मिरे वो उँगलियाँ ऐसे
    कि साज़े-रूह मेरा आज झनझना उठ्ठे
    मय्ंक

  3. saurabh bhai umda ghazal hui hai… matle aur doosre she’r ka to jawaab nahi.. waah

  4. Zabardast gazal huii h bhaiya
    Maza aa gya
    Har sher hi umda
    Dili daad

    Regards

  5. सौरभ पहले ही खासी पेचीदा ज़मीन थी और उस पर आख़िरी हर्फ़ बढ़ा कर और दुश्वार कर लिया. फिर भी अच्छे शेर निकले हैं. वाह वाह

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