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वेद-पुराण और उपनिषदों का पीछा कर के – नवीन

वेद-पुराण और उपनिषदों का पीछा कर के।
हाँ जी! हमने शेर कहे हैं – चरबा कर के।।

भव-सागर के तट-बन्धों से किनारा कर के।
कब का सब कुछ त्याग चुके हम, दावा कर के।।

किसी ने हम को मुआफ़ किया और ये समझाया।
हाथ नहीं लगना कुछ भी, मन मैला कर के।।

जिन का जलवा है, वोह तो छुप कर बैठी हैं।
डाल और पत्ते झूम रहे हैं – साया कर के।।

देख के तुम को हम क्यों बन्द करेंगे आँखें।
हम तो उजाले ढूँढ रहे थे – अँधेरा कर के।।

दुनिया के मुँह लगने का अञ्ज़ाम हुआ यह।
उलटा पाठ पढ़ा डाला है – सीधा कर के।।

हर काहू की ख़िदमत हम से हो न सकेगी।
चाकर हैं हम राधारानी के चाकर के।।

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

+91 9967024593

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About Navin C. Chaturvedi

www.saahityam.org 09967024593 navincchaturvedi@gmail.com http://vensys.in

8 comments on “वेद-पुराण और उपनिषदों का पीछा कर के – नवीन

  1. नवीन भाई
    प्रणाम
    नए लहजे के साथ नयी ग़ज़ल परोसने का आभार
    किसी ने हम को मुआफ़ किया और ये समझाया।
    हाथ नहीं लगना कुछ भी, मन मैला कर के।।
    waaah

  2. Dada praNam.

    Prkhar, bimleNdu n naaswaa ji bahut bahut shukriya

  3. किसी ने हम को मुआफ़ किया और ये समझाया।
    हाथ नहीं लगना कुछ भी, मन मैला कर के।।..वाह वाह वाह
    ..क्या सरलता से ऊँची बात कही है आपने
    सादर
    -कान्हा

  4. भव-सागर के तट-बन्धों से किनारा कर के।
    कब का सब कुछ त्याग चुके हम, दावा कर के।।

    वाह कितनी सुन्दर अभिव्यक्ति……बहुत दिनों बाद कुछ ऐसा पढने को मिला….

  5. ये ढब और रंग शुभ है. नवीन अगर आप इसी डगर पर चले तो ग़ज़ल में बृज के आंचलिक रंगों का इज़ाफ़ा करेंगे. आज ये शैली अलग सी है मगर इस रंग में 10 -20 कहने वाले आ गए तो ये नयी दिशा का वातायन खोल सकती है.

  6. वाह लाजवाब नवीन भाई … हर शेर लाजवाब बन पडा है …

  7. साहिबान

    कुछ महीने कब्ल एक शेर हुआ था –

    न कोई कह रहा कुछ न कोई सुन रहा कुछ
    चलो सामाँ उठाओ इशारा हो गया है

    इसे कुछ लोगों ने दाग़ साहिब के शेर

    होश-ओ-हवास-ओ-ताब-ओ-तवाँ ‘दाग़’ जा चुके
    अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया

    से जोड़ कर देखा। जबकि मेरे जह्न में हम लोगों के यहाँ किसी के मरने पर होने वाली गरुण-पुराण की कथा के अन्श थे। इसी अनुसन्धान में इस ग़ज़ल का मतला हुआ।

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