18 टिप्पणियाँ

T-19 तरह में दो शेर-चाक चलता है मगर कुछ नहीं बनता मुझसे-तुफ़ैल चतुर्वेदी

साहिबो श्री गणेश तो कर ही दूँ. हो सकता है बाद में तरह की आपाधापी शेर न कहने दे

चाक चलता है मगर कुछ नहीं बनता मुझसे
ख़ुद हुनर करने लगा हैं मिरा शकवा मुझसे

अश्क में तैरती यादें ही रहेंगी मुझमें ?
फिर मिरे दिल ने गयी रात ये पूछा मुझसे

 

 

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18 comments on “T-19 तरह में दो शेर-चाक चलता है मगर कुछ नहीं बनता मुझसे-तुफ़ैल चतुर्वेदी

  1. AHA …KYA GHAZAB KA MATLA AUR UTNA HI SHAANDAAR SHER HUWA HAI…TASHNAGI BAdH GAYI…POORI GHAZAL KE BAAD HI SAIRAAB HOnGE HAM ..JNB..BEQARAARI SE MUNTAZIR ..

  2. Dada sadar pranam…kya behatreen matla hua hai dada…puri ghazal ka muntzir hun …sadar
    -kanha

  3. Jaanlewaa matlaa hai daadaa. KyuN n is martbaa aap kee ghazal se shuruaat ho.

  4. Kya aagaz hai. ……. aapne is tarahi ko ek nayee rangat de di

  5. दादा !! मतला बहुत ख़ूबसूरत कहा है !! शेर भी अच्छा है !! ये संजीदा मूड है !!!
    चलिए मूड बदल कर एक शेर कहा जाय —

    आज महफिल में मुख़ालिफ़ वो रहा क्या कहिये
    जिसने कल शाम ही खाया था समोसा मुझसे –मयंक

  6. kya matla ban gaya hai aadarniy daad kabool ho.

  7. तुफ़ैल साहब,

    दाद सद दाद और
    बजाए ख़ून भरे अश्‍क ये कमाल किया
    उदास दिल का बयां ख़ूब हस्‍बेहाल किया।

  8. क्या मतला हुआ है…..वाह….फिक्रो-फ़न का इक ख़ूबसूरत नज़राना…..

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