14 टिप्पणियाँ

ग़ज़ल- चाँद छूने का भले ख़्वाब न पूरा होता-बिमलेंदु कुमार

चाँद छूने का भले ख़्वाब न पूरा होता
एक खुशफ़हमी बनी रहती तो अच्छा होता

शाम! सहरा के फ़लक पर वो उमड़ता बादल
आ गया था तो ज़रा टूट के बरसा होता

अब्र यादों के तिरी कुछ तो छंटे ही होते
मै भी इक रोज़ अगर फूट के रोया होता

तपते सहरा को भी हम रेत का दरिया कहते
अपनी नज़रों का अगर ज़ाविया बदला होता

धूप जो मिलती यक़ीनन मियां गुल भी खिलते
बीज बरगद के तले काश न बोया होता

जिस्म है बोझ सा और बोझ को कब तक ढोयें
जिस्म का बोझ उतर जाता तो अच्छा होता

बिमलेंदु कुमार 9711381945

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14 comments on “ग़ज़ल- चाँद छूने का भले ख़्वाब न पूरा होता-बिमलेंदु कुमार

  1. तपते सहरा को भी हम रेत का दरिया कहते
    अपनी नज़रों का अगर ज़ाविया बदला होता

    zindabaad !!!

  2. धूप जो मिलती यक़ीनन मियां गुल भी खिलते
    बीज बरगद के तले काश न बोया होता

    वाह बिमलेंदु वाह , आप जिस रफ़्तार से शायरी के मकाम पर अपनी पुख्ता जगह बंनाने की कोशिश में लगे हैं उसे देख मुझे बेहद ख़ुशी हो रही है। अभी कल तक ग़ज़ल के व्याकरण से अनजान आपने अपनी मेहनत और लगन से बहुत दूरी तय की है। मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं। जोरे कलम जियादा – अमीन

    नीरज

  3. bahut khoob bimlendu sahab achchhi ghazal kahi..

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