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चले पत्थरों पे जो हम कभी तो ये जुगनुओं में बदल गये-‘शबाब’ मेरठी

चले पत्थरों पे जो हम कभी तो ये जुगनुओं में बदल गये
जो चराग़ क़ैद में थे कभी सभी बंदिशों से निकल गये

जिन्हें हमसे मिलने की छह थी उन्हें ख़ुद ही अपनी तलाश थी
हमें बाद में ये पता चला वो तो ख़ुद से मिल के निकल गये

ये पुराने शह्र को तोड़ कर नया शह्र किसने बसा दिया
जो पनाहघर थे उमीद के सभी क़त्लगाहों में ढल गये

न हसद रही न अना रही न ग़ुरूर मेरा बचा रहा
मैं जो इश्क़ की आग में घिर गया मिरे सारे चेहरे पिघल गये

जिन्हें हम समझते हैं बारिशें वो हैं मौसमों की नवाज़िशें
नयी उम्र की ये ज़मीन है यहाँ सब के पांव फिसल गये

तिरी लहर ने जो छुआ इन्हें वही टीस ख़न्दाज़न हुई
वही फिर से पुरानी तड़प उठी मेरे घाव फिर से मचल गये

दिनेश कुमार स्वामी ‘शबाब’ मेरठी 09997220102

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7 comments on “चले पत्थरों पे जो हम कभी तो ये जुगनुओं में बदल गये-‘शबाब’ मेरठी

  1. Shabaab saahb tareef ka koi lafz nahi hai mere paas is ghazal ke liye. Bas ye kahunga ki salaamat rahiye aur hamen yun hi apne kalaam se nawaazte rahiye.

  2. जिन्हें हम समझते हैं बारिशें वो हैं मौसमों की नवाज़िशें
    नयी उम्र की ये ज़मीन है यहाँ सब के पांव फिसल गये
    umda sher

  3. यह बहर खुद में बहुत खूबसूरत है. और फिर इतने असरदार और गहरे शेर.. दिल खुश हो गया. दिली दाद कबूल करें…

    चले पत्थरों पे जो हम कभी तो ये जुगनुओं में बदल गये
    जो चराग़ क़ैद में थे कभी सभी बंदिशों से निकल गये

    जिन्हें हमसे मिलने की छह थी उन्हें ख़ुद ही अपनी तलाश थी
    हमें बाद में ये पता चला वो तो ख़ुद से मिल के निकल गये

    ये पुराने शह्र को तोड़ कर नया शह्र किसने बसा दिया
    जो पनाहघर थे उमीद के सभी क़त्लगाहों में ढल गये

    न हसद रही न अना रही न ग़ुरूर मेरा बचा रहा
    मैं जो इश्क़ की आग में घिर गया मिरे सारे चेहरे पिघल गये

    जिन्हें हम समझते हैं बारिशें वो हैं मौसमों की नवाज़िशें
    नयी उम्र की ये ज़मीन है यहाँ सब के पांव फिसल गये

    तिरी लहर ने जो छुआ इन्हें वही टीस ख़न्दाज़न हुई
    वही फिर से पुरानी तड़प उठी मेरे घाव फिर से मचल गये

  4. बशीर बद्र की इकाई के बाद तवील बहर की गज़ल बहुत कम देखने को मिली !! कारन शायद यही होगा कि उस मेयार को बेहतर करना आसान नही था !! लेकिन इस ग़ज़ल ने बहुत अश्वस्त किया कि कोई यकीन शाइरी के मुआमले मे जाइज़ नही है —
    जिन्हें हमसे मिलने की छह थी उन्हें ख़ुद ही अपनी तलाश थी
    हमें बाद में ये पता चला वो तो ख़ुद से मिल के निकल गये
    बहुत गहरा अर्थ है शेर का !! किसी को किसी की दरकार नही!! सच ये है कि इंसान को खुदा की भी दरकार नही !!! हम खुद को ही तलाशते है हर मंज़र मे हर पैकर मे !!!
    ये पुराने शह्र को तोड़ कर नया शह्र किसने बसा दिया
    जो पनाहघर थे उमीद के सभी क़त्लगाहों में ढल गये
    सिस्टम बदलता है और सबके लिये ये बदल मुफीद नही होता !!!
    न हसद रही न अना रही न ग़ुरूर मेरा बचा रहा
    मैं जो इश्क़ की आग में घिर गया मिरे सारे चेहरे पिघल गये
    इक आग का दरिया है और डूब के जाना है !!! मुहब्बत श्फ्फ़ाफ बना देती हि सिरिश्त को रूह को और वज़ूद को सच है !!
    ‘शबाब’ मेरठी साहब !! बहुत उम्दा शेर कहे है बधाई !! –मयंक

  5. जिन्हें हम समझते हैं बारिशें वो हैं मौसमों की नवाज़िशें
    नयी उम्र की ये ज़मीन है यहाँ सब के पांव फिसल गये

    तिरी लहर ने जो छुआ इन्हें वही टीस ख़न्दाज़न हुई
    वही फिर से पुरानी तड़प उठी मेरे घाव फिर से मचल गये

    वाह बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है दिनेश साहब…..

  6. क्या ही अच्छी ग़ज़ल है शबाब साहब की वाह वाह

  7. चले पत्थरों पे जो हम कभी तो ये जुगनुओं में बदल गये
    जो चराग़ क़ैद में थे कभी सभी बंदिशों से निकल गये

    जिन्हें हमसे मिलने की छह थी उन्हें ख़ुद ही अपनी तलाश थी
    हमें बाद में ये पता चला वो तो ख़ुद से मिल के निकल गये

    ये पुराने शह्र को तोड़ कर नया शह्र किसने बसा दिया
    जो पनाहघर थे उमीद के सभी क़त्लगाहों में ढल गये

    न हसद रही न अना रही न ग़ुरूर मेरा बचा रहा
    मैं जो इश्क़ की आग में घिर गया मिरे सारे चेहरे पिघल गये

    जिन्हें हम समझते हैं बारिशें वो हैं मौसमों की नवाज़िशें
    नयी उम्र की ये ज़मीन है यहाँ सब के पांव फिसल गये

    तिरी लहर ने जो छुआ इन्हें वही टीस ख़न्दाज़न हुई
    वही फिर से पुरानी तड़प उठी मेरे घाव फिर से मचल ग….waah kya ghazal hui hai waaah hazar dad ek ek sher par ….kai kai bar padh gaya ek janepehchane tarannum men….

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