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रूह से तोड़के सबने बदन से जोड़ दिया-इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’

रूह से तोड़के सबने बदन से जोड़ दिया

रिश्ता-ए-इश्क़ के धागे को धन से जोड़ दिया

है मिरा काम मुहब्बत की पैरवी करना

जबसे इक चाँद ने मुझको  किरन से जोड़ दिया

मैं उसे ओढ़के फिरता था दश्त भर लोगो

क्यों मिरा जिस्म किसी पैरहन से जोड़ दिया

वक़्त ने तोड़ दिया था मगर तअज्जुब है

आपने दिल को मिरे इक छुअन से जोड़ दिया

मेरी ग़ज़लों ने मुहब्बत  की नींव रक्खी है

बेवतन जो था उसे भी वतन से जोड़ दिया

शह्र के लोगों को ये बात नागवार लगी

गाँव का दर्द भी हमने सुख़न से जोड़ दिया

अब तो लाज़िम है सियासत के कुछ हुनर सीखें

शाह ने हमको भी इक अंजुमन से जोड़ दिया

इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’ 09818354784

 

 

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About irshadkhansikandar

मैं मूलतः शायर हूँ . हाँ रोज़ी-रोटी के लिए फिल्म,धारावाहिक,म्युज़िक एल्बम में गीत लिखता हूँ

5 comments on “रूह से तोड़के सबने बदन से जोड़ दिया-इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’

  1. waaaah wah

  2. Good one !!!!

  3. इरशाद भाई.
    बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है. सभी शेर काबिले तारीफ है. ढेरों दाद और बधाई.

    रूह से तोड़के सबने बदन से जोड़ दिया
    रिश्ता-ए-इश्क़ के धागे को धन से जोड़ दिया

    है मिरा काम मुहब्बत की पैरवी करना
    जबसे इक चाँद ने मुझको किरन से जोड़ दिया

    मैं उसे ओढ़के फिरता था दश्त भर लोगो
    क्यों मिरा जिस्म किसी पैरहन से जोड़ दिया

    वक़्त ने तोड़ दिया था मगर तअज्जुब है
    आपने दिल को मिरे इक छुअन से जोड़ दिया

    मेरी ग़ज़लों ने मुहब्बत की नींव रक्खी है
    बेवतन जो था उसे भी वतन से जोड़ दिया

    शह्र के लोगों को ये बात नागवार लगी
    गाँव का दर्द भी हमने सुख़न से जोड़ दिया

    अब तो लाज़िम है सियासत के कुछ हुनर सीखें
    शाह ने हमको भी इक अंजुमन से जोड़ दिया

  4. मुश्किल ज़मीन को अधिकार से निभाया है !! मतला सुन्दर है !!
    रूह से तोड़के सबने बदन से जोड़ दिया
    रिश्ता-ए-इश्क़ के धागे को धन से जोड़ दिया
    कैस की खूबसूरती ही उसकी आवारगी मे है –इसकी ज़िन्दगी मे तर्तीब अगर आ गई तो ध्ब्बे जैसी दिखेगी !! बहुत जानदार शेर कहा है —
    मैं उसे ओढ़के फिरता था दश्त भर लोगो
    क्यों मिरा जिस्म किसी पैरहन से जोड़ दिया

    अब तो लाज़िम है सियासत के कुछ हुनर सीखें
    शाह ने हमको भी इक अंजुमन से जोड़ दिया
    दौरे हाज़िर की ज़रूरत है ये !!! इरशाद भाई मुबारक्बाद कुबूल कीजिये !! –मयंक

  5. मेरी ग़ज़लों ने मुहब्बत की नींव रक्खी है

    बेवतन जो था उसे भी वतन से जोड़ दिया

    शह्र के लोगों को ये बात नागवार लगी

    गाँव का दर्द भी हमने सुख़न से जोड़ दिया
    सुन्दर

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