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क़दम दर क़दम ठोकरें खा रहा हूं-‘ख़ुर्शीद’ खैराड़ी

क़दम दर क़दम ठोकरें खा रहा हूं
मुसलसल मगर दौड़ता जा रहा हूं

ग़ज़ल को वसीला बनाकर अज़ीज़ों
तवालत ग़मों की घटाता रहा हूं

न कोई शनासा न कोई सगा अब
तुझे भूलने की सज़ा पा रहा हूं

कमी रहबरों की नहीं है जहाँ में
मुझे होश तो हो कहाँ जा रहा हूं

फ़क़त घूँट भर दीद तेरा किया है
नशे में नहीं हूं क़सम खा रहा हूं

शबे-हिज्र की है रसाई कहाँ तक
अदीबों अज़ल से ग़ज़ल गा रहा हूं

‘ख़ुर्शीद’ खैराड़ी जोधपुर 09413408422

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2 comments on “क़दम दर क़दम ठोकरें खा रहा हूं-‘ख़ुर्शीद’ खैराड़ी

  1. मतला और आखिरी शे’र तो बेइंतेहा खूबसूरत हुए हैं खुर्शीद साहब.. वाह वाह.. ढेरों दाद.. वाह

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