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इक बवंडर सा उठा एड़ी पे चकराते हुए- स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

सब के सब भागे अचानक दूर चिल्लाते हुए 
इक बवंडर सा उठा एडी पे चकराते हुए

रतजगों से चोट खायी चल रही है शब् मेरी 
चाँद के काँधे पे रख के हाथ, लंगडाते हुए

गर मैं अपना साथ पा जाता तो तुझको ढूंढता 
आज पूरी शाम गुज़री ख़ुद से कतराते हुए

सूख कर मुझसा ही हो जाए न ये मीठा कुआं
मेरी बातों को यूँ ही बेकार दुहराते हुए 

बढ़ रही है याद तेरी अब उदासी की तरफ 
रास्ते में सैकड़ों यादों से टकराते हुए 

मर गया जानां तुम्हारा ख़ाब सिरहाने मेरे 
प्यार से माथा मिरा इक रात सहलाते हुए 

सारे मौसम सर्दियों के हों यही आया ख़याल
अपने हाथों में तुम्हारा हाथ गरमाते हुए

अपना हर तिनका समेटे किस जगह पर जा छुपें
हम तेरी आवाज़ की चिड़ियों से घबराते हुए 

आंच कितनी ही सदाओं की हुई है रायगाँ
तेरी ख़ामोशी की ‘आतिश’ बर्फ़ पिघलाते हुए

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5 comments on “इक बवंडर सा उठा एड़ी पे चकराते हुए- स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

  1. bahut khoob wah

  2. गज़लो की अगर मिस इण्डिया प्रतियोगिता हो तो स्वप्निल की ग़ज़ल निश्चित रूप से ये क्राउन पहनेगी !! कहाँ कहाँ के मनाज़िर हैं आपके पास !!! और कितने शेडस हैं ??!! सभी एक से बढकर एक !!
    गर मैं अपना साथ पा जाता तो तुझको ढूंढता
    आज पूरी शाम गुज़री ख़ुद से कतराते हुए
    बढ़ रही है याद तेरी अब उदासी की तरफ
    रास्ते में सैकड़ों यादों से टकराते हुए
    एक शेर पढा था कभी –आखिरी हिचकी तेरे जानूँ पे आये // मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ !!! लेकिन इस शेर का भी जवाब नही
    मर गया जानां तुम्हारा ख़ाब सिरहाने मेरे
    प्यार से माथा मिरा इक रात सहलाते हुए
    बहुत बहुत बधाई !!

  3. “हम तेरी आवाज़ की चिड़ियों से घबराते हुए”

    दादा इस मिसरे पे सब कुछ कुर्बान…..यह नि:संदेह काबिले गौर और काबिले तारीफ़ है…. शायरों की फेहरिश्त में आमफहम से अलग….आसान शब्दों में एक तस्वीर समेट लेना कितना मुश्किल होता है यह वक शायर बखूबी समझ सकता है। पूरी ग़ज़ल शानदार….

  4. रतजगों से चोट खायी चल रही है शब् मेरी 
    चाँद के काँधे पे रख के हाथ, लंगडाते हुए….
    मर गया जानां तुम्हारा ख़ाब सिरहाने मेरे 
    प्यार से माथा मिरा इक रात सहलाते हुए ….
    In shoron ne to dil hi nikal dia hatheli par…puri ghazal ek ibarat hai kisee adhure khab ki …dheron daad

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