3 टिप्पणियाँ

चन्द ग़ज़लें – नवीन

दादा के हुक़्म पर

 

काम आना हो तभी काम नहीं आते हैं
धूप के पाँव दिसम्बर में उखड़ जाते हैं

धूल-मिट्टी की तरह हम भी कोई ख़ास नहीं
बस, हवा-पानी की सुहबत में सँवर जाते हैं

वो जो कुछ भी नहीं उस को तो लुटाते हैं सब
और जो सब-कुछ है, उसे बाँट नहीं पाते हैं

सारा दिन सुस्त पड़ी रहती है ग़म की हिरनी
शाम ढलते ही मगर पङ्ख निकल आते हैं

शह्र थोड़े ही बदलते हैं किसी का चेहरा
आदमी ख़ुद ही यहाँ आ के बदल जाते हैं

 

जब सूरज दद्दू, नदियाँ पी जाते हैं
तटबन्धों के मिलने के दिन आते हैं

रातें ही राहों को सियाह नहीं करतीं
दिन भी कैसे-कैसे दिन दिखलाते हैं

बची-खुची ख़ुशबू ही चमन को मिलती है
कली चटखते ही भँवरे आ जाते हैं

नाज़ुक दिल वाले अक्सर होते हैं शार्प
आहट मिलते ही पञ्छी उड़ जाते हैं

दिल जिद पर आमादा हो तो बह्स न कर
बच्चों को बच्चों की तरह समझाते हैं

हम तो गहरी नींद में होते हैं अक्सर
पापा हौले-हौले सर सहलाते हैं

और किसी दुनिया के वशिन्दे हैं हम
याँ तो सैर-सपाटा करने आते हैं

दम-घोंटू माहौल में ही जीता है सच
सब को सब थोड़े ही झुठला पाते हैं

दिन में ख़्वाब सजाना बन्द करो साहब
आँखों के नीचे धब्बे पड़ जाते हैं

 

मेरे मौला की इनायत के सबब पहुँचा है
ज़र्रा-ज़र्रा यहाँ रहमत के सबब पहुँचा है

कोई सञ्जोग नहीं है ये अनासिर का सफ़र
याँ हरिक शख़्स इबादत के सबब पहुँचा है

दोस्त-अहबाब हक़ीमों को दुआ देते हैं
जबकि आराम अक़ीदत के सबब पहुँचा है

न मुहब्बत न अदावत न फ़रागत न विसाल
दिल जुनूँ तक तेरी चाहत के सबब पहुँचा है

एक तो ज़ख्म दिया उस पे यूँ फ़रमाया ‘नवीन’
“तीर तुझ तक, तेरी शुहरत के सबब पहुँचा है”

 

जिस को अपने बस में करना था उस से ही लड़ बैठा
सीधा मन्तर पढ़ते-पढ़ते उल्टा मन्तर पढ़ बैठा

वो ऐसा तस्वीर-नवाज़ कि जिस को मैं जँचता ही नहीं
और एक मैं, हर फ्रेम के अन्दर चित्र उसी का जड़ बैठा

ज्ञान लुटाने निकला था और झोली में भर लाया प्यार
मैं ऐसा रँगरेज़ हूँ जिस पे रङ्ग चुनर का चढ़ बैठा

परसों मैं बाज़ार गया था दरपन लेने की ख़ातिर
क्या बोलूँ दूकान पे ही मैं शर्म के मारे गड़ बैठा

बाकी बातें फिर कर लेङ्गे – आज ये गुत्थी सुलझा लें
धरती कङ्कड़ पर बैठी – या फिर – उस पर कङ्कड़ बैठा

 

देखते-देखते अफ़सानों में ढल जाते हैं
दिल की बातों में जो आते हैं, बदल जाते हैं

उस के सीने में कहीं दिल की जगह सिल तो नहीं
चूँकि बच्चे तो बहुत जल्द बहल जाते हैं

ज़िन्दगी चैन से जीने ही नहीं देती है
दिल सँभलता है तो अरमान मचल जाते हैं

अश्क़ आँखों से छलकते नहीं तो क्या करते
दिल सुलगता है तो एहसास भी जल जाते हैं

जिस्म की क़ैद से हम छूटें तो छूटें कैसे
दिल की दहलीज़ पे आते ही फिसल जाते हैं

 

बह रही है इस सलीक़े से हवा
एक भी पत्ता नहीं अलसा रहा

शेर की कुर्सी बिल-आख़िर छिन गयी
पेड़ पे चढ़ना ही सब कुछ हो गया

फ़िक्र करते ही नहीं उड़ते परिन्द
चोञ्च से कुछ गिर गया तो गिर गया

धान की नस्लों को जा कर देख लो
फ़स्ल ने हर बूँद को लौटा दिया

परबतों को थोड़े ही मालूम है
कौन झरना किस नदी में जा मिला

जब दरख़्तों की जड़ें तक जल गईं
घास का मैदान क्या बचता भला

कल ही पिंजड़े से छुड़ाया था जिसे
वो कबूतर भी ज़मीं पर आ गिरा

 

अब इस दयार में इन ही का बोलबाला है
हमारा दिल तो ख़यालों की धर्मशाला है

नज़ाकतों के दीवाने हमें मुआफ़ करें
हमारी फ़िक्र दुपट्टा नहीं, दुशाला है

यक़ीन जानो कि वो मोल जानता ही नहीं
सदफ़ के लाल को जिसने कि बेच डाला है

क़ुसूर सारा हमारा है, हाँ हमारा ही
मरज़ ये फर्ज़ का ख़ुद हमने ही तो पाला है

हमारी ख़ुद की नज़र में भी चुभ रहा था बहुत
लिहाज़ा हमने वो चोला उतार डाला है

 

रोज़ ही करती हैं ऐलाने-सहर
ओस की बूँदें मुलायम घास पर

रात भर टूटे थे इतने कण्ठ-हार
सुब्ह तक पत्तों से झरते हैं गुहर

बस ज़रा अलसाई थीं कोमल कली
आ गये गुलशन में बौराये-भ्रमर

भोर की शीतल-पवन अलसा चुकी
धूप से चमकेगा अब सारा नगर

इस का इस्तेमाल कर लीजे हुजूर
धूप को तो होना ही है दर-ब-दर

वाह री सीली दुपहरी की हवा
जैसे मिलने आ रहे हों हिम-शिखर

इक सितारा आसमाँ से गिर पड़ा
चाँद को ये भी नहीं आया नज़र

नये-नये गार्डन बने हैं शह्र में
पर वहाँ पञ्छी नहीं आते नज़र

सोचता हूँ देख कर ऊँचा गगन
एक दिन जाना है वाँ सब छोड़ कर

 

ज़र्रे-ज़र्रे में मुहब्बत भर रही है
क्या नज़र है और क्या जादूगरी है

प्यार के पट खोल कर देखा तो जाना
दिल हिमालय, ख़ामुशी गंगा नदी है

हम तो ख़ुशबू के दीवाने हैं बिरादर
जो नहीं दिखती वही तो ज़िन्दगी है

किस क़दर उलझा दिया है बन्दगी ने
उस को पाऊँ तो इबादत छूटती है

ये अँधेरे ढूँढ ही लेते हैं मुझ को
इन की आँखों में ग़ज़ब की रौशनी है

एक दिन मैं आँसुओं को पी गया था
आज तक दिल में तरावट हो रही है

 

कोई बताये कि हम क्यूँ पड़े रहें घर में
हमें भी तैरना आता है अब समन्दर में

ये तेरा आना मुझे छूना और निकल जाना
कि जैसे करने हों बस दस्तख़त रजिस्टर में

हमें तो रोज़ ही बस इन्तज़ार है तेरा
किसी भी डेट पे गोला बना केलेण्डर में

ये सोच कर ही कई रत्न आये थे मुम्बै
कि एक दिन वो दिखेंगे बड़े से पोस्टर में

वो एक दौर था जब डाकिये फ़रिश्ते थे
ख़ुदा सा दिखता था हजरात पोस्ट-मास्टर में

मेरी तरह से कभी सोच कर भी देखो ‘नवीन’
तुम्हें भी दिखने लगेगा – ‘शिवम’ – इरेज़र में

 

दर्द के हाथों में परचम आ गया
बात में लहज़ा मुलायम आ गया

क्या करिश्मे हो रहे हैं आज कल
आप को आवाज़ दी, ग़म आ गया

हम ने समझा प्यार बरसायेगा प्यार
अश्क़ बरसाने का मौसम आ गया

चार दिन तक ही रही दिल में बहार
फिर उजड़ जाने का मौसम आ गया

आज नज़राने की थी उस से उमीद
भर के वो आँखों में शबनम आ गया

फिर नई धुन छेड़ कर आलाप लूँ
ज़िन्दगी की ताल में सम आ गया

तैश में आने लगी हैं ख़्वाबगाह
सूर्य [शम्स] जो पूरब से पच्छम आ गया

 

किसी और में वो लचक न थी किसी और में वो झमक न थी
जो ठसक थी उस की अदाओं में किसी और में वो ठसक न थी

न तो कम पड़ा था मेरा हुनर न तेरा जमाल भी कम पड़ा
तेरा हुस्न जिस से सँवारता मेरे हाथ में वो धनक न थी

फ़क़त इस लिये ही ऐ दोसतो मैं समझ न पाया जूनून को
मेरे दिल में चाह तो थी मगर मेरी वहशतों में कसक न थी

ये चमन ही अपना वुजूद है इसे छोड़ने की भी सोच मत
नहीं तो बताएँगे कल को क्या यहाँ गुल न थे कि महक न थी

मेरी और तेरी उड़ान में भला कैसे होता मुक़ाबला
मेरे साथ मेरे उसूल थे तेरे साथ कोई झिझक न थी

 

सतत सनेह-सुधा-सार यदि बसे मन में
मिले अनन्य रसानन्द स्वाद जूठन में

समुद्र-भूमि, तटों को तटस्थ रखते हैं
उदारवाद भरा है अपार, कन-कन में

विकट, विदग्ध, विदारक विलाप है दृष्टव्य
समष्टि! रूप स्वयम का निहार दरपन में

विचित्र व्यक्ति हुये हैं इसी धरातल पर
जिन्हें दिखे ‘क्षिति-कल्याण-तत्व’ गो-धन में

ऋतुस्स्वभाव अनिर्वाच्य हो गया प्रियवर
शरीर स्वेद बहाये निघोर अगहन में
कहो तो कौन है जिस को यहाँ वुसअत नहीं मिलती
जिसे फुर्सत नहीं मिलती उसे सुहबत नहीं मिलती

तेरा ग़म यूँ है जैसे ख़ुद को चूँटी काटता हूँ मैं
बदन को टीस मिलती है फ़क़त, हरकत नहीं मिलती

मैं इस मौक़े को अपने हाथ से कैसे फिसलने दूँ
मुहब्बत में रक़ीबों को बहुत मुहलत नहीं मिलती

वफ़ा के आशियाने में सभी के सर सलामत हैं
भले इस आशियाने की ज़मीं को छत नहीं मिलती

कलेज़ा चीर कर उस के लहू से रौशनी करना
हमारे दौर में उस तौर की वहशत नहीं मिलती

न जाने कब का ये सारा ज़माना मिट चुका होता
अगर इन्सान को इन्सान से इज्ज़त नहीं मिलती

 

सूने जङ्गल देख के अक्सर ऐसा लगता है
उतना ही लिखना था जितना अच्छा लगता है

आप ही कहिये आप का दरिया किस को पेश करूँ
ये प्यासा, वो जल बिन मछली जैसा लगता है

रब ही जाने उस पर क्यों गुस्सा आता है मुझे
जबकि सलीक़ा उस का मेरे जैसा लगता है

मत पूछें मुझसे मेरी ख़ामोशी की वज़्हें
ख़ुद को चूँटी काट के बोलें – कैसा लगता है

यक़ीं न हो तो गूगल अर्थ पे जा कर देख लें ख़ुद
अपना मुम्बै खेत-खिलौनों जैसा लगता है

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

+91 9967024593

Advertisements

About Navin C. Chaturvedi

www.saahityam.org 09967024593 navincchaturvedi@gmail.com http://vensys.in

3 comments on “चन्द ग़ज़लें – नवीन

  1. दादा प्रणाम

    क्या कहने ,एक साथ इतने गजलों का तोहफा
    काफी दिनों के बाद
    मज़ा आ गया

    सादर
    आलोक

  2. Waaaah ek ek lafz moti….
    ..jitni tarif karun utni kami lagti hai….

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: