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T-18-समापन- तुफ़ैल चतुर्वेदी

मित्रो इस बार तरही ग़ज़ल का काम उस तरह नहीं चल पाया जिस तरह सामान्यतः चलता है. इसके दो कारण थे. पहला मकान बना कर उसमें रहने के लिये जाना और उसकी दीवारो-दर में हज़ार तरह की ख़ामियां देखना, उन्हें बदलवाने की जद्दो-जहद में पड़ना. दूसरे मैं अकेला पड़ गया हूँ. राज़, नवीन, स्वप्निल अपने-अपने कारणों से सक्रिय नहीं रह पाये. तो जो स्थिति इस बार के चुनाव में कांग्रेस के लोगों की थी वही मेरी भी रही. हताश, एकाकी, हततेज, क्लांत…मयंक और मैं ही कितना चल पाते. फिर भी मयंक ने संपादक होने का कर्तव्य पूरा निभाया. बहरहाल मेरा ये हाल था तो था. इस बार मेरी उम्मीद से ज़ियादा ठीक-ठाक गज़लें आयीं. मैं 20 तक अंदाज़ा लगा रहा था. इस तरह के मिसरे हमारे ज़हन रवां करते हैं. इस तरह की बहरों में एक बात ख़ास तौर से ध्यान रखने की होती है. वो एक ख़ास ख़ामी है. अरूज़ की ज़बान में इसे शिकस्ते-नारवा कहते हैं. ऐसी हर बह्र में जो दो बराबर के हिस्सों में तोड़ी जा सके, में इसका ध्यान रखना ज़रूरी है कि शिकस्त के बाद बचे दो टुकड़ों में कोई शब्द एक हिस्से से दूसरे हिस्से में न चला जाये. आप अपनी-अपनी गज़लें इस पर खुद तोलिये. मैं उदाहरण से इसे और स्पष्ट करता हूँ

मेरा ही एक शेर है

सफ़ेद बाल सर पे………आ………गयीं बदन पे झुर्रियां
उड़ा गयी हवायें देख………………मुझको तेरी शाल माँ

पहले मिसरे में आ का इस्तेमाल हो तो बदन की झुर्रियों के लिये रहा है मगर लफ्ज़ आ दाख़िल सफ़ेद बाल वाले हिस्से में हो गया है. ये शिकस्ते-नारवा की ख़ामी है. इस चूक को जिन हज़रात ने इस्तेमाल कर लिया है वो खुद इसे दुरुस्त करने की कोशिश कीजिये. इस तरह की 8-10 मैंने केवल इस लिये छोड़ दिया कि उनमें ये ख़ामी हद से ज़ियादा थी.

तुफ़ैल चतुर्वेदी 09810387857

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One comment on “T-18-समापन- तुफ़ैल चतुर्वेदी

  1. aap ne bilkul baja kaha…maiN ne Gurwant singh ko likhe gaye comment meN ye baat wazeh ki thi..ki ye bahr e shikasta hai..
    DR.AZAM

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