8 टिप्पणियाँ

T-18/29 न था जिस पर भरोसा भरोसा हो गया है-दिनेश कुमार स्वामी ‘शबाब’ मेरठी

न था जिस पर भरोसा भरोसा हो गया है
सुना है मेरा क़ातिल मसीहा हो गया है

बचा ली लाज उसकी अब उसकी मुफ़लिसी ने
अब उसका आसमां ही दुपट्टा हो गया है

हर इक बंदिश हटा दी नज़र ने सामने से
इसी दीवार में अब झरोखा हो गया है

बरसना चाहती हैं ख़ुशी की छातियाँ अब
हमारे ग़म का मौसम सुहाना हो गया है

मेरी आँखें मुसलसल बरसती जा रही हैं
तिरी यादों का बादल इकठ्ठा हो गया है

कभी जो चांदनी में लिखा था तुमने छत पर
वो सपना फाड़ डालो पुराना हो गया है

जिसे मैंने मरोड़ा कलाई झूट की थी
मुख़ालिफ़ क्यों मिरा फिर ज़माना हो गया है

लहू बिखरा हुआ है मिरे ख़ाबों का शायद
मिरे तकिये पे शब में कशीदा हो गया है

जिसे उम्मीद थी कल कभी इंसाफ़ होगा
वो जंगल की दिशा में रवाना हो गया है

जहाँ तक खूं बहाया गया था कल हमारा
हुकूमत का वहीँ तक इज़ाफ़ा हो गया है

मैं क़ैदी हूँ यक़ीनन अभी अपनी सहर का
मगर सब कह रहे है अँधेरा हो गया है

तमन्ना चाहती है मुझे आज़ाद करना
चलो ज़िन्दाँ में अपना ठिकाना हो गया है

हिदायत बोतलों पर लिखी जब से किसी ने
हज़ारों मयकशों का इज़ाफ़ा हो गया है

कोई भी लफ्ज़ इसको नहीं भर पायेगा अब
मिरे दिल में ये कैसा ख़ला सा हो गया है

कभी उसके बदन में परों को खोल दूंगा
मिरा दिल कुछ दिनों से परिंदा हो गया है

उमीदों की तरह ये कभी धोका न देगा
मुझे अब अपने दुख पर भरोसा हो गया है

बताओ शहर अब भी युंहीं जलते रहेंगे
जुलाई का भी आख़िर महीना हो गया है

अलसका की तरह है हमारा दिल भी शायद
नहीं सूरज ढला और अँधेरा हो गया है

दिनेश कुमार स्वामी ‘शबाब’ मेरठी 09997220102

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8 comments on “T-18/29 न था जिस पर भरोसा भरोसा हो गया है-दिनेश कुमार स्वामी ‘शबाब’ मेरठी

  1. इन खूबसूरत अश’आर के लिए दिली दाद कुबूल कीजिए शबाब साहब।

  2. UMDA GHAZAL HUI HAI SHABAAB SAHAB, WAAH WAAH , MUBAARAKBAAD

  3. आदरणीय ‘शबाब’ मेरठी साहब, एक पाठक की हैसियत से कहने की जुर्रत कर रहा हूँ कि
    कोई भी लफ़्ज़ इसको नहीं भर पायेगा अब
    मेरे दिल में ये कैसा ख़ला सा हो गया है
    दिल की गहराईयों से शे’र है साहब •••••• ऐसे ऐसे कमाल के शख़्स एक ही जगह उपलब्ध हैं ••••यकीन नहीं हो पा रहा ••
    करोड़ों करोड़ दाद ••••

  4. न था जिस पर भरोसा भरोसा हो गया है
    सुना है मेरा क़ातिल मसीहा हो गया है
    दौरे हाज़िर का शेर तो यही है !!! ये सर्वस्वीकार्य आवाज़ नही है लेकिन जो कहने वाले हैं और जो इसे मानने वाले है वो पुरयकीन हैं !!
    बचा ली लाज उसकी अब उसकी मुफ़लिसी ने
    अब उसका आसमां ही दुपट्टा हो गया है
    आसमा दुपट्टा , धरती चादर और चन्दा मामा कर लिया –उरियानियो को शाल बना लेती है मुफलिसी !!!!
    हर इक बंदिश हटा दी नज़र ने सामने से
    इसी दीवार में अब झरोखा हो गया है
    हर नज़र बस अपने अपने ज़र्ब तक ही जा सकती है –नज़र की बन्दिश हटे तो खला का दरवाज़ा तोड़ा जा स्कता है !!!
    बरसना चाहती हैं ख़ुशी की छातियाँ अब
    हमारे ग़म का मौसम सुहाना हो गया है
    ऊला सानी के दो मुख्तलिफ रंग शेर को नावेल्टी दे रहे हैं !!!
    कभी जो चांदनी में लिखा था तुमने छत पर
    वो सपना फाड़ डालो पुराना हो गया है
    हम पढ रहे थे ख्वाब के पुर्ज़ो को जोड़ कर
    आँधी ने ये तिलस्म भी रख डला तोड़ कर –श्हरयार !!
    जिसे मैंने मरोड़ा कलाई झूट की थी
    मुख़ालिफ़ क्यों मिरा फिर ज़माना हो गया है
    ताकत को आजमा तो लिया दोस्तो ने भी
    अपने ही दोस्तो की कलाई मरोड़ कर
    लहू बिखरा हुआ है मिरे ख़ाबों का शायद
    मिरे तकिये पे शब में कशीदा हो गया है
    मंज़र !! सुर्ख़ है और असरदार है …. लहू बिखरा हुआ है मिरे ख़ाबों का शायद
    जिसे उम्मीद थी कल कभी इंसाफ़ होगा
    वो जंगल की दिशा में रवाना हो गया है
    ज़रूर सोचिये कि तब क्या ग़ज़ब होगा गर इंसाफ माँगने वाला इंसाफ करने वाला बन जाये !!!
    जहाँ तक खूं बहाया गया था कल हमारा
    हुकूमत का वहीँ तक इज़ाफ़ा हो गया है
    सियासत के कदम मस्लहत आमेज़ होते हैं … हम नही सम्झ सक्ते ये आहटे क्या कहती हैं !!
    मैं क़ैदी हूँ यक़ीनन अभी अपनी सहर का
    मगर सब कह रहे है अँधेरा हो गया है
    बहुत सुन्दर शेर कहा है हासिले गज़ल !! दाद दाद !!! !
    तमन्ना चाहती है मुझे आज़ाद करना
    चलो ज़िन्दाँ में अपना ठिकाना हो गया है
    ज़िन्दगी की एक इको है और उससे भी ज़िन्दाँ ही गूँजता है !!!
    कभी उसके बदन में परों को खोल दूंगा
    मिरा दिल कुछ दिनों से परिंदा हो गया है
    फिर किसी नज़्म की तमहीद उठाई जाये
    फिर किसी जिस्म को लफ़्ज़ो मे पिरोया जाये –शाहिद कबीर
    उमीदों की तरह ये कभी धोका न देगा
    मुझे अब अपने दुख पर भरोसा हो गया है
    मुझे ऊला मिसरा बाँध रहा है !!!! क्या खूब !!! उमीदों की तरह ये कभी धोका न देगा…..
    अलसका की तरह है हमारा दिल भी शायद
    नहीं सूरज ढला और अँधेरा हो गया है
    अलस्का हो या एण्टार्कटिका !! सूरज की सल्तनत मे हमें कितने धूप मिलेगी ये वो ही तय करेगा !!!
    शबाब साहब !! कई शेर कहे आपने और सभी खूब कहे और कई शेर तो बहुत खूब कहे !!! बधाई !! –मयंक

  5. तमन्ना चाहती है मुझे आज़ाद करना
    चलो ज़िन्दाँ में अपना ठिकाना हो गया है

    आ. दिनेश साहब बहुत खूबसुरत ग़ज़ल हुई है। एक एक शेर गहरा और उम्दा। ढेरों दाद।

  6. MAIn QAIDI HUn YAQEENAN..ABHI APNI SAHAR KA..
    MAGAR SAB KAH RAHE HAIn ..ANDHERA HO GAYA HAI…

    KYA GHAZAB KA SHER AUR KYA KHOOB GHAZAL HUYI HAI JNB…DHEROn MUBARAKBAAD..
    DR.AZAM

  7. उमीदों की तरह ये कभी धोका न देगा
    मुझे अब अपने दुख पर भरोसा हो गया है….Kya kahne Shabaab saab! Waah! Waah!

  8. bahut khoob gazal kahi hai kisi ek ke bare me kuchh kahu to dusaraa chhoot jata hai poori gazal pasand aai badhai sweekaren

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