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T-18/28 निगाहों से जो ओझल किनारा हो गया है-अभय कुमार ‘अभय’

निगाहों से जो ओझल किनारा हो गया है
ये दरिया नीला नीला ज़ियादा हो गया है

धनक,ख़ुशबू, घटा को, सभी नाज़-ओ-अदा को
जिसे भी देखते हैं वो तेरा हो गया है

ग़मों की धूप भी थी बरहना सर भी था मै
ख़याल आया जो तेरा तो साया हो गया है

बहुत रास आयी मुझको तिरी निश्तरज़नी भी
कि दिल का तंग आंगन कुशादा हो गया है

ये शबनम आंसूओं की गिरी आरिज़ प गुल के
चमक उट्ठी यूँ आँखें सवेरा हो गया है

दिलों से थी दिलों तक हकीक़त इक हकीक़त
ज़बां तक आते आते फ़साना हो गया है

बहुत बेरंग दिन थे बहुत तारीक रातें
ये किसका अक्स आकर सुनहरा हो गया है

तसव्वुर में है चन्दन गुलअफ़शाँ हैं बहारें
घटा में चांदनी है करिश्मा हो गया है

निगाहों के भंवर में “अभय” हम डूब जाते
तबस्सुम से कुछ उनके सहारा हो गया है

अभय कुमार ‘अभय’ 08171611298

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6 comments on “T-18/28 निगाहों से जो ओझल किनारा हो गया है-अभय कुमार ‘अभय’

  1. बहुत खूब अभय साहब। दाद कुबूलें।

  2. आप सभी हज़रात का तहे -दिल से शुक्रिया , अभय

  3. बहुत बेरंग दिन थे बहुत तारीक़ रातें
    ये किसका अक्स आकर सुनहरा हो गया है

    बड़ा सच्चा शे’र है, कभी कभार होता है ऐसा ••••• नसीब आपका, कि आप इसे ढूंढ पाऐ !!!!
    दाद क़बूल करें !

  4. निगाहों से जो ओझल किनारा हो गया है
    ये दरिया नीला नीला ज़ियादा हो गया है
    अपने तरीके का एक नया मतला !! मतले पर दाद !!!
    धनक,ख़ुशबू, घटा को, सभी नाज़-ओ-अदा को
    जिसे भी देखते हैं वो तेरा हो गया है
    स्मृति का एक केन्द्र है जो कि ईरानी नहीं नूरानी है –यानी महबूब !! और जब ख्याल उसके साथ रहता है तो धनक घटा खुश्बू सभी कुछ उसी के हो जाते हैं !!!
    ग़मों की धूप भी थी बरहना सर भी था मै
    ख़याल आया जो तेरा तो साया हो गया है
    तुमको देखा तो ये ख्याल आया
    ज़िन्दगी धूप तुम घना साया – ये शेर जानिसार साहब के साहब्ज़ादे के नाम से जाना जाता है इसके भी और पहले एक शेर सुना था जो फिराक़ साहब था शायद !!
    ये ज़िन्दगी के कड़े कोस याद आता है
    तेरे निगाहे करम का घना घना साया !!!
    दिलों से थी दिलों तक हकीक़त इक हकीक़त
    ज़बां तक आते आते फ़साना हो गया है
    ज़ुबान का द्ख़्ल न हो तो हकीक़त खामुशी से ज़ियादा निस्बत रखती है –लेकिन जितने मुँह उतनी ज़ुबाने किसी भी मंज़र को फसाना बना देते है !!
    बहुत बेरंग दिन थे बहुत तारीक रातें
    ये किसका अक्स आकर सुनहरा हो गया है
    बहुत सुन्दर !!!सूर्योदय दिख रहा है शेर मे !!
    तसव्वुर में है चन्दन गुलअफ़शाँ हैं बहारें
    घटा में चांदनी है करिश्मा हो गया है
    शेर की तस्वीरी सिफत गज़ब की है !!
    निगाहों के भंवर में “अभय” हम डूब जाते
    तबस्सुम से कुछ उनके सहारा हो गया है
    तब्स्सुम मे कोई आहट होगी !! यकीनन !! जिसने डूबने से बचा लिया !!!
    अभय साहब !! गज़ल के लिये बधाई !!! –मयंक

  5. उस्‍तादों की ग़ज़ल पर सिवा वाह के और क्‍या कहें।
    बहुत उम्‍दा ग़ज़ल।
    सादर
    नवनीत

  6. pyari ghazal par daad haazir hai Abhay sahib
    DR.AZAM

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