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T-18/27 पसे-जम्हूरियत ये अजूबा हो गया है-मुहम्मद आज़म

पसे-जम्हूरियत ये अजूबा हो गया है
कोई क्या हो गया है कोई क्या हो गया है

किसी की बेहिसी से किसी की सरकशी से
किसी का था कभी जो किसी का हो गया है

कसाफ़त छंट गयी है कि नज़रों का है धोका
हर इक मंज़र यहां का नया सा हो गया है

मोअज़्ज़िन की अज़ाँ से परिंदों की सदा से
“अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है ”

बनामे-शायरी अब सहाफ़त हो रही है
ग़ज़ल का आज लहजा ख़बर सा हो गया है

जो आँखों में थे बादल वो बरसे झूम कर तो
हमारे दिल का मौसम सुहाना हो गया है

ग़ज़ल पूरी हुई तो हमें लगने लगा ये
हमारे दर्द का काम ख़ज़ाना हो गया है

ये सुलझी-सुलझी बातें ये सच्ची सच्ची बातें
नशा आज़म तुझे क्या ज़ियादा हो गया है

मुहम्मद आज़म 09827531331

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8 comments on “T-18/27 पसे-जम्हूरियत ये अजूबा हो गया है-मुहम्मद आज़म

  1. पसे-जम्हूरियत ये अजूबा हो गया है
    कोई क्या हो गया है कोई क्या हो गया है

    इकबाल साहब को याद करे —
    इस राज़ को इक मर्गे – फिरंगी ने बताया
    हरचंद इसे दाना खोला नहीं करते
    ज़म्हूरियत इक तर्ज़ ए हुकूमत है कि जिसमे
    बन्दों को गिना करते हैं तोला नहीं करते
    ज़म्हूरियत में क्या से क्या हो जाय !! कोई क्या हो गया है कोई क्या हो गया है।

    किसी की बेहिसी से किसी की सरकशी से
    किसी का था कभी जो किसी का हो गया है

    मता ए जां का बदल एक पल की सरशारी
    सुलूक ख़्वाब का आंखो से ताजीराना था —-इफ्तिखार आरिफ

    हमारे घर तो है पानी पे तैरने वाले
    हवा के रुख को समझना बहुत ज़रूरी है -नाज़्मी
    यूं ही कोई किसी को छोड़_ कर किसी और का नहीं हो जाता !!!

    मोअज़्ज़िन की अज़ाँ से परिंदों की सदा से
    “अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है “
    बहुत उम्दा गिरह लगाई है जनाब !!!!

    बनामे-शायरी अब सहाफ़त हो रही है
    ग़ज़ल का आज लहजा ख़बर सा हो गया है
    न्यूज़ चैनल आजकल ज़ियादा चल रहे है ग़ज़ल भी उनके असर में बहक रही है !!

    जो आँखों में थे बादल वो बरसे झूम कर तो
    हमारे दिल का मौसम सुहाना हो गया है
    आज जी भर के जो रोये हैं तो यूं खुश हैं फ़राज़
    चाँद लम्हों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे –अहमद फ़राज़

    ग़ज़ल पूरी हुई तो हमें लगने लगा ये
    हमारे दर्द का काम ख़ज़ाना हो गया है

    दर्द का खजाना कम होगा ही कई गुहर आपने और लुटा दिए !!!

    आज़म साहब !! इस ग़ज़ल पर सारी दाद !!! –मयंक

    • aap ki yaddasht…ham sab ke liye…bawaal e jaaN hai…koi sher mauzooN karo …us se milta julta…koi sher aap daagh hi dete haiN…magar is baat ki khushi zaroor hoti hai ki maiN ne bhi baDe baDe shayeroN ke aas paas kuchh to socha…haseeN tawarud…charba nahiN….kyuNki khair se mujhe apne sher hi yaad nahiN rahte…doosroN se istefada ki gunzayish hi nahiN banti…
      aap ne beshtar ashaar ki taareef ki hai…is ki bahut khushi hai…
      sameem e qalb se shukriya…MayaNk bhai

  2. ये सुलझी-सुलझी बातें ये सच्ची सच्ची बातें
    नशा आज़म तुझे क्या ज़ियादा हो गया है ….Waah Azam saab! Khoob!

  3. आज़म साहब,
    बहुत अच्‍छी ग़ज़ल पर बार-बार दाद।
    सभी अश्‍आर बहुत देर तक याद रहने वाले।
    सादर
    नवनीत

  4. SAATWEn SHER MEn….
    lafz KAAM nahiN …KAM [less] hai..

  5. thanx for posting my ghazal…
    dil se shukriya..Tufail sahib
    DR.AZAM

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