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T-18/26 लो मेरी जा़त को ये भरोसा हो गया है-नवनीत शर्मा

लो मेरी जा़त को ये भरोसा हो गया है
वो मेरा था ही कब जो किसी का हो गया है

उसे दिखती कहां है कोई तारीक वादी
जो सूरज परबतों का मुजारा हो गया है

रहे होंगे वो अव्‍वल वफ़ा के इम्तिहां में
जिन्‍हें अश्‍कों का हासिल वज़ीफ़ा हो गया है

चला भी आ कि फिर से, मुझे सुइयां चुभो दे
ये दिल फि़र आबलों का ज़ख़ीरा हो गया है

रुलाई ज़ब्‍त कर ली, हंसी आती नहीं है
हुआ ये क्‍या है दिल को मरा सा हो गया है

मैं रक़बा हूं वो साझा, जो मौके से है ग़ायब
ज़रा चेहरा तो देखो, ततीमा हो गया है

तिरी यादों का लश्‍कर अब उठ भी जाये तो क्‍या
मुझे तन्‍हाइयों का सलीक़ा हो गया है

निगाहें गिर रही हैं सभी की आके जिसमें
था मेरा जिस्‍म लेकिन वो क़ासा हो गया है

किसी की आंख रोई, कहीं चीख़ा है कोई
कहीं बस सिसकियों से गुज़ारा हो गया है

उजाला जब मिला है, गले रातों के लग कर
‘अंधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है’

नहीं सुनता किसी की, सुनाता भी नहीं है
सुना है आजकल वो फ़रिश्ता हो गया है

किनारे साथ ही थे मगर अब हैं कहां वो
था दरिया नाम जिसका कुहासा हो गया है

दिखायी दे रहा हूं मैं अब तो साफ़ खुद को
हुआ जो दूर खुद से करिश्‍मा हो गया है

नहीं मिसकॉल कब से न एसएमएस ही कोई
किसे अब याद किसकी ख़ुलासा हो गया है

कसैले पल वो कितने, रही कड़वी वो घडि़यां
तुम्‍हारा ज्रिक्र लेकिन बताशा हो गया है

नवनीत शर्मा 9418040160

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12 comments on “T-18/26 लो मेरी जा़त को ये भरोसा हो गया है-नवनीत शर्मा

  1. Bhaiya sadar pranam…
    Bahut khoobsurat ghazal kahi hai apne hamesha ki tarah…matle ne ghazal ke baqi ash’aar ke bare me ittila kar dia tha ki bahut umdaa ghazal padhne ko milne wali hai…maqte tak wahh wahh kehte rhe…badhai aur daad qubul kare’n…
    kanha

    • बहुत प्रिय कान्‍हा !
      शुक्रिया।
      एक अच्‍छे शायर से दाद मिली और मैंने संभाल कर रख ली।
      खुश रहें। आप तो खु़द बहुत अच्‍छा कहते हैं।
      सप्रेम
      नवनीत

  2. चला भी आ कि फिर से, मुझे सुइयां चुभो दे
    ये दिल फि़र आबलों का ज़ख़ीरा हो गया है

    दिखायी दे रहा हूं मैं अब तो साफ़ खुद को
    हुआ जो दूर खुद से करिश्‍मा हो गया है
    आ. नवनीत भाई सा. बहुत खुबसूरत ग़ज़ल हुई है ,ज़ज्बात का हर रंग उकेरा गया है |काफ़ियों का चयन अलहदा है |बहुत बहुत मुबारकबाद ………… ढेरों दाद कबूल फरमाएं
    सादर

    • खुर्शीद भाई साहब,
      प्रणाम।

      आप जिस उदारता के साथ प्रशंसा करते हैं, उससे इतना बल मिलता है कि हीनग्रंथी शायर के पास फ़टक तक नहीं सकती।
      विनम्र आभार
      नवनीत

  3. रहे होंगे वो अव्वल वफ़ा के इम्तिहां में
    जिन्हें अश्कों का हासिल वज़ीफ़ा हो गया है

    किसी की आँख रोई, कहीं चीखा है कोई
    कहीं बस सिसकियों से गुजारा हो गया है

    दिखायी दे रहा हूं मैं अब तो साफ़ खुद को
    हुआ जो दूर खुद से करिश्मा हो गया है

    बहुत बड़ी यात्रा है साहब •••••• यक़ीनन जन्मों जन्मों का मुआमला है।
    आप सच्चे उत्तराधिकारी हैं।
    मेरा सौभाग्य है कि आप को पढना नसीब हो सका !
    हजारों दाद !

    • गुरु भाई
      प्रणाम और आभार।
      आपके शब्‍दों में मेरे प्रति आपका स्‍नेह बोल रहा है।
      यह मेरे साथ रहेगा हमेशा।
      पुन: आभार।
      सादर
      नवनीत

  4. लो मेरी जा़त को ये भरोसा हो गया है
    वो मेरा था ही कब जो किसी का हो गया है
    मुबारक हो नवनीत भाई !! जो अपना था ही नही वो किसी का हो जाये हमें क्या !!
    उसे दिखती कहां है कोई तारीक वादी
    जो सूरज परबतों का मुजारा हो गया है
    वाह !!! वाह !!
    रहे होंगे वो अव्वाल वफ़ा के इम्तिहां में
    जिन्हेंग अश्कोंर का हासिल वज़ीफ़ा हो गया है
    सुन्दर शेर कहा हैआपने !!!
    जिनके होठो पे हँसी पाँव मे छाले होंगे
    हाँ वही लोग तेरे चाहने वाले होंगे
    चला भी आ कि फिर से, मुझे सुइयां चुभो दे
    ये दिल फि़र आबलों का ज़ख़ीरा हो गया है
    इस शेर पर इसके शिल्प पर बार बार दाद !!
    निगाहें गिर रही हैं सभी की आके जिसमें
    था मेरा जिस्मे लेकिन वो क़ासा हो गया है
    इस शेर की जितनी तारीफ की जाये कम होगी !!! क्या मोती गढा है भाई आपने वाह !! वाह !! बहुत सुन्दर बहुत सुन्दर क्या बात है !!!!
    किसी की आंख रोई, कहीं चीख़ा है कोई
    कहीं बस सिसकियों से गुज़ारा हो गया है
    सब अपने अपने उजालो को ले के चलते है
    किसी की शम्म: मे लौ है किसी के दाग़ मे है -शाहिद कबीर
    उजाला जब मिला है, गले रातों के लग कर
    ‘अंधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है’
    गिरह अच्छी है !!!
    दिखायी दे रहा हूं मैं अब तो साफ़ खुद को
    हुआ जो दूर खुद से करिश्मात हो गया है
    इस शेर पर फिर बेशुमार दाद !! दाद !! दाद !!
    आइना खुद मै हूँ बाहर अक़्स बैठा है मेरा
    मै वहाँ हूँ आज तक पहुँचा जहाँ कोई नही !! –मयंक
    नहीं मिसकॉल कब से न एसएमएस ही कोई
    किसे अब याद किसकी ख़ुलासा हो गया है
    इस शेर को मतले से जोड़ कर पढते है !!
    कसैले पल वो कितने, रही कड़वी वो घडि़यां
    तुम्हापरा ज्रिक्र लेकिन बताशा हो गया है
    स्मृति नूरानी हो गई है महबूब के तस्व्वुर मे वाह !!!! नवनीत भाई !! बहुत बहुत बधाई !! सुन्दर गज़ल –मयंक

    • आदरणीय मयंक भाई साहब।
      प्रणाम।
      अब क्‍या कहूं।
      सूरज के सामने कोई दीपक क्‍या बोल सकता है ?
      आभार।
      नवनीत

  5. उसे दिखती कहां है कोई तारीक वादी
    जो सूरज परबतों का मुजारा हो गया है ..Kya baat hai Navneet bhaai! Waah! Waah!

  6. KYA KYA SHER KAHE HAIn…aur kya kya qawaafi liye haiN…bahut khoob..
    daad hi daad…DR.AZAM

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