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T-18/25 हसीं रंगीं नज़ारो तुम्हें क्या हो गया है-मनोज कुमार मित्तल ‘कैफ़’

हसीं रंगीं नज़ारो तुम्हें क्या हो गया है
हरिक मंज़र अचानक जला सा हो गया है

नई दीवार खींची पुराने घर में किसने
किसी आसेब का यां बसेरा हो गया है

ज़रा सी देर तुम भी हमारे साथ रह लो
शबों में ख़ाब का दर अगर वा हो गया है

लहू टपका है दिल से हुए हैं हम भी ग़मगीं
अगर रोये नहीं तो ग़ज़ब क्या हो गया है

तअल्लुक़ तोड़ कर तुम ख़सारे में रहे हो
तुम्हारा था कभी दिल हमारा हो गया है

तुनुक-आबी से वुसअत ख़फ़ीफ़ ऐसी हुई है
हुआ करता था दरिया वो क़तरा हो गया है

उठायी जब तमन्ना गुलों सी थी मगर अब
हथेली पर मिरी ज़ख्म गहरा हो गया है

ये नाबीनों की दुनिया यहाँ आ कर बिचारा
‘ अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है ‘

मियां क़द के बशर अब ज़रा काम ही मिलेंगे
बहुत छोटे से क़द का ज़माना हो गया है

लिया बस नाम उसका लगा बेचैन दिखने
तो क्या अब ‘कैफ़’ की वो तमन्ना हो गया है

मनोज कुमार मित्तल ‘कैफ़’ 09887099295

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5 comments on “T-18/25 हसीं रंगीं नज़ारो तुम्हें क्या हो गया है-मनोज कुमार मित्तल ‘कैफ़’

  1. ये नाबीनों की दुनिया यहाँ आ कर बिचारा
    ‘ अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है ‘..kya baat hai Manoj saahb! Waah!

  2. नई दीवार खींची पुराने घर में किसने
    किसी आसेब का यां बसेरा हो गया है

    आँगन में नई दीवार के उठाने से यही होगा की अब हमारी बात मोहल्ले वाले सुनेगे !!! एक शेर —
    घर ही नहीं मयंक भी तकसीम हो गया
    आंगन में उठ गयी कोई दीवार देख कर

    ज़रा सी देर तुम भी हमारे साथ रह लो
    शबों में ख़ाब का दर अगर वा हो गया है
    अच्छा मशवरा है !! बेदारियाँ ज़रूरी है !!!सारी उम्र ख्वाबीदा रहना था तो -धरती पर आने की क्या ज़रुरत थी !!

    लहू टपका है दिल से हुए हैं हम भी ग़मगीं
    अगर रोये नहीं तो ग़ज़ब क्या हो गया है
    शक न कर मेरी खुश्क आंखो पर
    यूं भी आंसू बहाये जाते हैं

    तअल्लुक़ तोड़ कर तुम ख़सारे में रहे हो
    तुम्हारा था कभी दिल हमारा हो गया है
    तुनुक मिज़ाजों को कौन समझाये कि जिस दिल को वो ठुकराते हैं वो सोने का होता है !!!

    तुनुक-आबी से वुसअत ख़फ़ीफ़ ऐसी हुई है
    हुआ करता था दरिया वो क़तरा हो गया है
    सहारा मगर बतंगी ए चश्मे हुसूद था। । ग़ालिब !!!

    उठायी जब तमन्ना गुलों सी थी मगर अब
    हथेली पर मिरी ज़ख्म गहरा हो गया
    तृष्णा दुख का मूल है !! यह अमरबेल लगानी ही नहीं चाहिए !!!
    कैफ साहब !!! अशआर एक विचारतंत्र की परिपक्वता दर्शाते हैं !! किसी भी ज़मीन पर पारिजात का पौधा पारिजात के ही फूल देगा !! आपकी तख़लीक़ ही नहीं आपकी सोच को भी सलाम !!!आगे भी इस पोर्टल पर आपकी ग़ज़ल हम ज़रूर पढ़ना चाहेंगे –मयंक

  3. मित्‍तल साहब,
    ग़ज़ल बहुत उम्‍दा है लेकिन ये दो अश्‍आर मुझे बतौरे-खा़स पसंद आए।

    लहू टपका है दिल से हुए हैं हम भी ग़मगीं
    अगर रोये नहीं तो ग़ज़ब क्या हो गया है

    मियां क़द के बशर अब ज़रा काम ही मिलेंगे
    बहुत छोटे से क़द का ज़माना हो गया है

    दाद हाजि़र है।
    सादर
    नवनीत

  4. UMDA GHAZAL …KAI BAHUT GAHRE SHER…BULAND FIKR …DAAD HAAZIR HAI..
    DR.AZAM

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