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T-18/24 फरेबो झूठ का अब ठिकाना हो गया है-भुवन निस्तेज

फरेबो झूठ का अब ठिकाना हो गया है
तुम्हारे शह्र में भी ये क्या क्या हो गया है

मिरी शाइस्तगी का तमाशा हो गया है
गुलों के हाथ खंज़र तमाशा हो गया है

यहाँ ये आइना मत सरे बाज़ार रक्खो
जिसे सच का गुमाँ था वो झूठा हो गया है

यहाँ तुम धूप में जिस शजर की खोज में हो
बने वो बोनसाई* ज़माना हो गया है

नदी के पास ऐसा बहाना भी हो शायद
बहेगा बाढ़ में घर पुराना हो गया है

चरागों ने जो ठानी ‘उन्हें जलते है रहना’
‘अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है’

सितम की आग में है तपा भी इस क़दर क्यों
शहर ये आज जलता भगोना हो गया है

यक़ीनन अब नहीं है यक़ीं हम को किसी पे
तिरी मासूमियत से भी धोखा हो गया है

जो तेरा कृष्ण बनना गया है छा ख़बर में
यहाँ हर शख़्स देखो सुदामा हो गया है

है जिसका नाम सुनकर हवा भी थरथराती
नकाबों के हुनर से मसीहा हो गया है

कोई शिकवा नहीं है मिला है कुछ मुझे भी
जो ठुकराया जहाँ ने वो मेरा हो गया है

कोई उबटन नहीं है न है लेपन नया सा
मेरा श्रृंगार मेरा पसीना हो गया है

चलो ‘निस्तेज’ तुम भी उठा लो साज़ो-सामां
यहाँ होना तुम्हारा शगूफ़ा हो गया है

भुवन निस्तेज bbhuwan@gmail.कॉम 00977-9848513915

[*बोनसाई=
गमलों व प्लेटों में लगाया जाने वाला पेड़ का बौना प्रारूप]

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5 comments on “T-18/24 फरेबो झूठ का अब ठिकाना हो गया है-भुवन निस्तेज

  1. यक़ीनन अब नहीं है यक़ीं हमको किसी पे
    तिरी मासूमियत से भी धोखा हो गया है

    कोई शिकवा नहीं है मिला है कुछ मुझे भी
    जो ठुकराया जहाँ ने वो मेरा हो गया है
    कोई उबटन नहीं है न है लेपन नया सा
    मेरा श्रृंगार मेरा पसीना हो गया है

    साहब,गुस्ताखी मुआफ़, नाम ग़लत चुना है बस •••••• ,
    जिस तरह हम ‘गुरु’ नहीं हैं, वैसे ही आप ‘निस्तेज’ नहीं हो सकते !
    आपका ‘तेज’ ओर फैले, उस्तादों की अदा है।
    दाद क़बूल करें !

  2. भुवन भाई !! आपने अच्छे शेर कहे है –ये शेर पसन्द आये —
    फरेबो झूठ का अब ठिकाना हो गया है
    तुम्हारे शह्र में भी ये क्या क्या हो गया है
    चरागों ने जो ठानी ‘उन्हें जलते है रहना’
    ‘अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है’
    जो तेरा कृष्ण बनना गया है छा ख़बर में
    यहाँ हर शख़्स देखो सुदामा हो गया है
    कोई शिकवा नहीं है मिला है कुछ मुझे भी
    जो ठुकराया जहाँ ने वो मेरा हो गया है
    दीगर अश आर भी अच्छे है लेकिन मिसरे को नस्र करने पर उसे व्याकरणीय अनुशासन मे होना आवश्यक है और दोनो मिसरों मे एक न्यूनतम सम्बन्ध भी होना आवश्यक है इसलिये आपके कुछ शेर अच्छे होने के बावज़ूद क़्वोट् नही कर प रहा हूँ –कहन बहुत अच्छी है और आपसे आगे हम और बेहतर की उमीद करते है –मयंक

  3. भुवन साहब,

    उम्‍दा कलाम। आपको और पढ़ने की इच्‍छा है।
    बधाई एवं आभार।

    सादर
    नवनीत

  4. GHAZAL MEn TEJ HI TEJ HAI…
    KHOOBSOORAT..ASHAAR…WAHHHH
    DR.AZAM

  5. सर जी खूब ,,,,,,,,,,,, बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है ,,,,,,,,,,,,,

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