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T-18/23 फ़िज़ा में उफ़ ये कैसे कुहासा हो गया है -परवीन ख़ान

फ़िज़ा में उफ़ ये कैसे कुहासा हो गया है
तिरे जाते ही दिल तक अँधेरा हो गया है

तबस्सुम ने हटाया उदासी की परत को
‘अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है’

कमी उसकी खली है हमेशा रास्तों पर
भले ही साथ मेरे ज़माना हो गया है

कभी दोबारा कमतर समझना मत किसी को
जिसे तुम समझे पत्थर वो हीरा हो गया है

अब उसका तज़करा भी न फूटी आँख भाये
पता जब से चला वो किसी का हो गया है

कहाँ मिलते हैं उससे हमारे अब सितारे
जो अपने ख़ाब में था सितारा हो गया है

जहाँ जाते हैं पहले पहुँच जाता है हमसे
अँधेरा ही मुक़द्दर हमारा हो गया है

लुटा कर दिल की दौलत आमिर अब भी है ‘परवीन’
तअज्जुब है लुटेरा ही कंगला हो गया है

परवीन ख़ान

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5 comments on “T-18/23 फ़िज़ा में उफ़ ये कैसे कुहासा हो गया है -परवीन ख़ान

  1. कभी दोबारा कमतर समझना मत किसी को
    जिसे तुम समझे पत्थर वो हीरा हो गया है

    जहां जाते हैं पहले पहुंच जाता है हमसे
    अन्धेरा ही हमारा मुकद्दर हो गया है

    वाह !!

    हजारों हज़ार दाद !!!

  2. कमी उसकी खली है हमेशा रास्तों पर
    भले ही साथ मेरे ज़माना हो गया है
    परवीन !!! सीधा सादा -लेकिन दिल को छू लेने वाला शेर !!

    कहाँ मिलते हैं उससे हमारे अब सितारे
    जो अपने ख़ाब में था सितारा हो गया है
    आसान जुबां और गहरी कहन !! और ज़िंदगी का अहसास भी यही है की हमारी उमीदों और तमन्नाओ पर सवारी कर फलक पर पहुँचाने वाला हमारा नहीं रह जाता !!!!

    जहाँ जाते हैं पहले पहुँच जाता है हमसे
    अँधेरा ही मुक़द्दर हमारा हो गया है लुटा
    ये आम हिन्दुस्तानी की पुकार है !!!
    मतला और दीगर अश आर भी अच्छे कहे है !!! बहुत बहुत बधाई !!! –मयंक

  3. फिर वही कहूंगा……..
    छोटी बहन और बड़ी शायरा परवीन को बहुत बधाई।
    नवनीत

  4. कमी उसकी खली है हमेशा रास्तों पर
    भले ही साथ मेरे ज़माना हो गया है

    कभी दोबारा कमतर समझना मत किसी को
    जिसे तुम समझे पत्थर वो हीरा हो गया है

    अब उसका तज़करा भी न फूटी आँख भाये
    पता जब से चला वो किसी का हो गया है UMDA ASH’AAR HUYE HAI’N MOHTARMA MUBAARAKBAAD QABOOL KARE’N.

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