6 टिप्पणियाँ

T-18/22 वो ख़ाकी पैरहन में फ़रिश्ता हो गया है-शरीफ़ अंसारी

वो ख़ाकी पैरहन में फ़रिश्ता हो गया है
कि जिसके घर में उनका ठहरना हो गया है

तुम्हारी रहबरी का सहारा हो गया है
मैं अब चलता रहूँगा भरोसा हो गया है

ये किस महताब-रुख़ का इशारा हो गया है
कि अब तारीक दिल में उजाला हो गया है

किसी की यादे-पैहम से रिश्ता हो गया है
बस अपनी ज़िन्दगी का सहारा हो गया है

अमल की रहगुज़र पर ज़रा देखो तो चल के
कहाँ क्या हो रहा है कहाँ क्या हो गया है

क़दम रुकते कहाँ हैं किसी के रोकने से
अगर दिल में मुसलसल इरादा हो गया है

ग़ज़ल का लम्स पा कर ज़रा देखो तो चल कर
ग़ज़ल का लहजा-लहजा सयाना हो गया है

निगाहों में हमारी बसद शौक़ो-तजस्सुस
हर इक आलम का आलम निराला हो गया है

है मौसम बेख़ुदी का चले आओ कि अब तो
अँधेरी शब का दामन कुशादा हो गया है

हर इक मंज़र यहाँ का बहुत दिलकश है लेकिन
चाचा ग़ालिब के आगे तमाशा हो गया है

कभी हिचकी जो आयी तुम्हारा नाम लेकर
तो दिल की धड़कनों में इज़ाफ़ा हो गया है

तसव्वुर में जो आये तो उस आमद के सदक़े
नज़र में चार जानिब उजाला हो गया है

बहुत अफ़सोसकुन हैं सियासत की फ़िज़ाएं
यहाँ सूरज के रहते अँधेरा हो गया है

तिरी यादों ने मुझसे कभी रिश्ता न तोड़ा
अगरचे तुझसे बिछड़े ज़माना हो गया है

मिरी तफ़कीरे-फ़न में मिरे तर्ज़े-सुख़न में
तिरे लुत्फ़ो-करम का इज़ाफ़ा हो गया है

सफ़ेदी खिल उठी है परिंदे जाग उट्ठे
उठो उट्ठो मुसाफ़िर सवेरा हो गया है

ये मर्ज़ी है तुम्हारी इसे चाहो न चाहो
ये दिल तो कब का प्यारे तुम्हारा हो गया है

न कोई ग़म न आंसू न कोई लम्से-ख़ुश्बू
अजीरन अब हमारा ये जीना हो गया है

लबों पर मुस्कराहट सजा रक्खी है लेकिन
तुम्हारे दिल का लेकिन ख़ुलासा हो गया है

मिली जब सरफ़राज़ी मुझे उसकी अता से
तो चेहरा दोस्तों का ज़रा सा हो गया है

बफ़ैज़े-कैफ़ो-मस्ती बउनवाने-महब्बत
ग़ज़ल कहने की धुन में क़सीदा हो गया है

न तन्हाई न महफ़िल न सहरा में लगे है
दिले-नादान आख़िर तुझे क्या हो गया है

मुसलसल रंजो-ग़म से ‘शरीफ़’ उलझे है इतना
कि अब ये रंजो-ग़म ही खिलौना हो गया है

शरीफ़ अंसारी 09827965460

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6 comments on “T-18/22 वो ख़ाकी पैरहन में फ़रिश्ता हो गया है-शरीफ़ अंसारी

  1. हर एक मंज़र यहाँ का बहुत दिलक़श है लेकिन
    चचा ग़ालिब के आगे तमाशा हो गया है

    ये मर्जी है तुम्हारी इसे चाहो न चाहो
    ये दिल तो कब का प्यारे तुम्हारा हो गया है

    और

    मिली जब सरफ़राज़ी मुझे उसकी अता से
    तो चेहरा दोस्तों का जरा सा हो गया है

    और ख़ास तौर से मक़्ता ••••••बहुत पसंद आऐ ।
    दाद क़बूल फरमाएगा।

  2. laboN par muskurahat saja rakhkhi hai LEKIN
    tumhare dil ka LEKIN khulasa ho gaya hai

    ….itni taweel ghazal meN …aisa ho jata hai..ghairdanista taur par…
    baharhaal umda ashaar nikale haiN ….kai rawayati andaaz ke sher haiN…magar zabaan ki chashni purlutf hai…
    daad haazir hai..
    DR .AZAM

  3. बड़ी और उम्‍दा ग़ज़ल के लिए मशकूर हूं।
    वाह…वाह…वाह।
    सादर
    नवनीत

  4. बहुत ही उम्दा और बेहतरीन

  5. वो ख़ाकी पैरहन में फ़रिश्ता हो गया है
    कि जिसके घर में उनका ठहरना हो गया है
    मिट्टी का हो गया, जिसके घर डा0 वाई एम राज़ आ कर चारगर हो गये !! फिर वो ख़ाकी पैरहन मे फरिश्ता बन गया !! खूब !!
    तुम्हारी रहबरी का सहारा हो गया है
    मैं अब चलता रहूँगा भरोसा हो गया है
    इस रहबर के रहते आप चैन से सो नही सक्ते सो चलना बन्दिश भी है –तंज़ सुन्दर है !!!
    ये किस महताब-रुख़ का इशारा हो गया है
    कि अब तारीक दिल में उजाला हो गया है
    सुन्दर शेर है !! रिवायती ख्याल !! पढने मे सुख दे रहा है और तस्व्वुर मे मंज़र भी दिल को सुकून दे रहा है !!! काश किसी महताब रोख़ का इशारा हो ही जाय , लेकिन ये किस्मत कहाँ !!
    अमल की रहगुज़र पर ज़रा देखो तो चल के
    कहाँ क्या हो रहा है कहाँ क्या हो गया है
    हम तो अखबार मे और मीडिया के संसार मे जीते है !! लेकिन अमल की राह सारे गुमान को दरहम बरहम कर सकती है और एक नई तर्तीब दे सकती है ज़िन्दगी को तस्लीम !!!!
    है मौसम बेख़ुदी का चले आओ कि अब तो
    अँधेरी शब का दामन कुशादा हो गया है
    तंज़ है और सानी मिसरे मे खुलता है कुशादा दामन !!! गहरा शेर है !!!
    हर इक मंज़र यहाँ का बहुत दिलकश है लेकिन
    चाचा ग़ालिब के आगे तमाशा हो गया है
    बाज़ी चा ए अफ़्चाल है दुनिया मेरे आगे !!! यानी हर मंज़र दिलक्श है फिर भी जानकार के आगे उस्ताद के आगे तस्व्वुफ़ की सरहद पर खड़े आदमी के आगे ये बाते खेल है !! बहुत सुन्दर वाह !!!
    तसव्वुर में जो आये तो उस आमद के सदक़े
    नज़र में चार जानिब उजाला हो गया है
    वो आये बज़्म मे इतना तो मीर ने देखा !!
    बहुत अफ़सोसकुन हैं सियासत की फ़िज़ाएं
    यहाँ सूरज के रहते अँधेरा हो गया है
    फलक है सुर्ख़ मगर आफताब काला है
    अन्धेरा है कि तेरे शहर मे उजाला है ??!!
    तिरी यादों ने मुझसे कभी रिश्ता न तोड़ा
    अगरचे तुझसे बिछड़े ज़माना हो गया है
    एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें
    और हम भूल गये हो तुम्हे ऐसा भी नही –फिराक़
    ये मर्ज़ी है तुम्हारी इसे चाहो न चाहो
    ये दिल तो कब का प्यारे तुम्हारा हो गया है
    तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा !! ठीक है !! वाह !!!
    न कोई ग़म न आंसू न कोई लम्से-ख़ुश्बू
    अजीरन अब हमारा ये जीना हो गया है
    शक न कर मेरी खुश्क आँखो पर
    यूँ भी आँसू बहाये जाते है
    लबों पर मुस्कराहट सजा रक्खी है लेकिन
    तुम्हारे दिल का लेकिन ख़ुलासा हो गया है
    हम अपने दोस्तो के तंज़ सुनकर मुस्कुराते है
    मगर उस वक़्त कुछ अन्दर ही अन्दर टूट जाता है
    मिली जब सरफ़राज़ी मुझे उसकी अता से
    तो चेहरा दोस्तों का ज़रा सा हो गया है
    सच्चे दोस्त है !!! चेहरा नही छुपता छुपाये !!!
    न तन्हाई न महफ़िल न सहरा में लगे है
    दिले-नादान आख़िर तुझे क्या हो गया है
    दिल का मुआमला संगीन है !! !!
    मुसलसल रंजो-ग़म से ‘शरीफ़’ उलझे है इतना
    कि अब ये रंजो-ग़म ही खिलौना हो गया है
    मुश्किले इतनी पड़ी मुझ पर कि आसाँ हो गईं ….
    शरीफ़ साहब !! इस गज़ल का इंतज़ार था !! मुबारक !! हर पढने वाले को इसमे अपनी पसन्द के शेर मिल जायेंगे !! बड़ा गुलदस्ता है ये अश आर का !! –मयंक

  6. बहुत खूब शरीफ़ साहब। अच्छे अश’आर हुए हैं।

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