6 टिप्पणियाँ

T-18/21 मज़ा दुश्वारियों का दुबाला हो गया है-आलोक मिश्रा

मज़ा दुश्वारियों का दुबाला हो गया है
तो मुझमें हौसला भी बला का हो गया है

जिसे तुम ढूँढते हो,नहीं है अब वो मुझमें
उसे गुज़रे हुए तो ज़माना हो गया है

तड़प कर आ गिरा है उदासी की ज़मीं पर
तिरे हमले से घायल परिन्दा हो गया है

उसी से रौशनी है हमारी जिंदगी में
वो पुर्ज़ा ख़त का हम को सहीफा हो गया है

ठहरता ही नहीं है कहीं इक पल मिरा दिल
मिरे मालिक ये आख़िर मुझे क्या हो गया है

हथेली जगमगाई मिरे अश्कों से तेरी
हिना का रंग कैसा सुनहरा हो गया है

कभी शक्लें उतारीं कभी शक्लें पहन लीं
हमारा मशग़ला भी अनोखा हो गया है

उमीदें बुझ गयी हैं सभी जब रौशनी की
“अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है’

आलोक मिश्रा 09711744221

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6 comments on “T-18/21 मज़ा दुश्वारियों का दुबाला हो गया है-आलोक मिश्रा

  1. जिसे तुम ढूढंते हो नहीं है अब वो मुझ में
    उसे गुजरे हुए तो ज़माना हो गया है
    लाजवाब !!!
    दाद क़बूल फरमाएगा।

    तडप कर आ गिरा है उदासी की ज़मीं पर
    तेरे हमले से घायल परिन्दा हो गया है

    सच्ची बात के लिये एक बार फिर दाद क़बूल फरमाएगा !!!!!

  2. कभी शक्लें उतारीं कभी शक्लें पहन लीं
    हमारा मशग़ला भी अनोखा हो गया है

    आलोक जी! इस शे’र के असर से बाहर आ पाऊंगा तो आगे कुछ कहूंगा।
    बहुत शुक्रिया।
    सादर
    नवनीत

  3. मज़ा दुश्वारियों का दुबाला हो गया है
    तो मुझमें हौसला भी बला का हो गया है
    क्या मतला कहा है !! यार अना का कितना सुन्दर शेर कह दिया आपने !!! खुदी को कर बुलन्द इतना ……. मिटा दे अपनी हस्ती को …..या हम खाक़ नशीनो की ठोकर पए ज़माना है ……जैसे अशार के सम्क्ष शान से खड़ा हो सकता है ये शेर !!!
    जिसे तुम ढूँढते हो,नहीं है अब वो मुझमें
    उसे गुज़रे हुए तो ज़माना हो गया है
    सानी मिसरा ज़ुबान का है और उसने ऊला को और रवानी दे दी बहुत खूब !!!!
    तड़प कर आ गिरा है उदासी की ज़मीं पर
    तिरे हमले से घायल परिन्दा हो गया है
    सिम्बल क्लियर नही है परिन्दे की शैडो किसी मंज़र पर फिक्स नही कर पा रहा हूँ –उदासी की ज़मी तो ठीक है !!! मिरा जज़्बा गिरा है उदासी की ज़मी पर …. ख़ुलूस आ कर गिरा है उदासी की ज़मी पर ….. जैसे कुछ से ये स्पष्ट होता !!!
    उसी से रौशनी है हमारी जिंदगी में
    वो पुर्ज़ा ख़त का हम को सहीफा हो गया है
    बहुत खूब !!! ढेर सारी दाद !!!
    ठहरता ही नहीं है कहीं इक पल मिरा दिल
    मिरे मालिक ये आख़िर मुझे क्या हो गया है
    कहीं वही तो नही हो गया जिसकी रौ मे पहाड़ काट डाला जाता है या सहरा आबाद कर दिया जाता है .. वही है दोस्त !!! वही है … मुबारक हो …!!!
    हथेली जगमगाई मिरे अश्कों से तेरी
    हिना का रंग कैसा सुनहरा हो गया है
    शेर है कि पेंटिंग बनाने का दिल हो रहा है इस ख्याल पे !!!
    कभी शक्लें उतारीं कभी शक्लें पहन लीं
    हमारा मशग़ला भी अनोखा हो गया है
    ज़बर्दस्त शेर ज़बर्दस्त !! इस ज़मीन से क्या खूब शेर निकाला !!!
    आलोक !! तुम आशा !! विश्वास हमारे !! जीते रहो आबाद रहो !!-मयंक

  4. बहुत खूब आलोक जी। अच्छे अश’आर हुए हैं।

  5. ठहरता ही नहीं है कहीं इक पल मिरा दिल
    मिरे मालिक ये आख़िर मुझे क्या हो गया है

    हथेली जगमगाई मिरे अश्कों से तेरी
    हिना का रंग कैसा सुनहरा हो गया है

    कभी शक्लें उतारीं कभी शक्लें पहन लीं
    हमारा मशग़ला भी अनोखा हो गया है

    उमीदें बुझ गयी हैं सभी जब रौशनी की
    “अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है’..
    wahhh wahhh…ye hote hain she;r ..bahut bahut badhai Alok bhai..lajawab ghazal hui hai..daad qubule’n
    _kanha

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