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T-18/20 वो क़िस्सा क़ैस-जी का अलग सा हो गया है-बिमलेंदु कुमार सिंह

वो क़िस्सा क़ैस-जी का अलग सा हो गया है
कि खाका इश्क़ का अब तिकोना हो गया है

कहाँ साक़ी रहे वो कहाँ मयख़ाने यारो
कि अब दैरो-हरम पर भी पहरा हो गया है

कोई इक पल में कैसे वो धागा जोड़ देगा
जिसे टूटे हुए इक ज़माना हो गया है

बहारों से रहा है तिरा नाता यक़ीनन
तिरे आते ही मौसम सुहाना हो गया है

नई उम्मीद चमकी मिरी आँखों में शब भर
‘ अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है’

सुना है इक ज़माना हुआ करता था उसका
जो इक बिखरा हुआ अब फ़साना हो गया है

तवज्जो दे रहा है वो मुझ पर आज इतनी
करेगा वार कोई ये पक्का हो गया है

इसे खुदगर्ज़ी कहिये या मेरी ख़ुद-परस्ती
मिरे भीतर ही मेरा ठिकाना हो गया है

बिमलेंदु कुमार सिंह 09711381945

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14 comments on “T-18/20 वो क़िस्सा क़ैस-जी का अलग सा हो गया है-बिमलेंदु कुमार सिंह

  1. कोई इक पल में कैसे वो धागा जोड़ देगा
    जिसे टूटे हुए इक ज़माना हो गया है

    बहारों से रहा है तिरा नाता यक़ीनन
    तिरे आते ही मौसम सुहाना हो गया है
    आ. बिमलेंदु सा. नायाब अशहार हुये हैं ,इस मुक़म्मल ग़ज़ल पर ढेरों दाद कबूल फरमाएं
    सादर

  2. बहारों से रहा है तेरा नाता यक़ीनन
    तेरे आते ही मौसम सुहाना हो गया है
    उम्र गुजर जाती है, इतना ग़ज़ब का शे’र किसी किसी को नसीब होता है।
    मंजिल तक यूँ ही नहीं पहुंच गये होंगे, यक़ीनन आपकी यात्रा भी बड़े कमाल की रही होगी।
    दाद क़बूल फरमाएगा!!!!!

  3. धन्यवाद् कान्हा भाई। ये आपका स्नेह है बस।

  4. विमलेंदु साहब।
    बहुत अच्‍छी ग़ज़ल।
    दिल में घर करने वाली।
    बहुत बढि़या।
    शुक्रिया।
    नवनीत

  5. वो क़िस्सा क़ैस-जी का अलग सा हो गया है
    कि खाका इश्क़ का अब तिकोना हो गया है
    विमलेन्दु एक नये शेर पर दाद !!! ये नया ख्याल है तअज़्ज़ुब है कि किसी को सूझा क्यों नही आज तक –इश्क अब त्रिकोणीय हो गया है यानी आशिक माशूका के सिवा एक एन्ट्री और हो गई है !! बहुत खूब बहुत खूब !!!
    कोई इक पल में कैसे वो धागा जोड़ देगा
    जिसे टूटे हुए इक ज़माना हो गया है
    जुड़ेगा भी तो गाँठ पड़ जायेगी – हाँ राजनैतिक धागे जल्द जुड़ते है राजद जे डीयू जैसे लेकिन ये धागे अनैतिक है इसलिये जुड़ जाते है !!
    बहारों से रहा है तिरा नाता यक़ीनन
    तिरे आते ही मौसम सुहाना हो गया है
    सुन्दर !!!
    नई उम्मीद चमकी मिरी आँखों में शब भर
    ‘ अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है’
    शेर पर दाद !! दाद !! दाद !!
    सुना है इक ज़माना हुआ करता था उसका
    जो इक बिखरा हुआ अब फ़साना हो गया है
    बहुत खूब फिर एक बार ज़ोरदार तालियाँ !!!
    तवज्जो दे रहा है वो मुझ पर आज इतनी
    करेगा वार कोई ये पक्का हो गया है
    मस्लहत का तकाज़ा तो यही है सही पढा सामने वाले को !!
    इसे खुदगर्ज़ी कहिये या मेरी ख़ुद-परस्ती
    मिरे भीतर ही मेरा ठिकाना हो गया है
    नया और अच्छा शेर !!!
    बिमलेंदु !!! बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही आपने दिल जीत लिया !!! –मयंक

  6. बहुत खूब बिमलेन्दु जी, अच्छे अश’आर हुए हैं।

  7. कोई इक पल में कैसे वो धागा जोड़ देगा
    जिसे टूटे हुए इक ज़माना हो गया है

    बहारों से रहा है तिरा नाता यक़ीनन
    तिरे आते ही मौसम सुहाना हो गया है

    इसे खुदगर्ज़ी कहिये या मेरी ख़ुद-परस्ती
    मिरे भीतर ही मेरा ठिकाना हो गया ह WAAH WAAH ;;MUBAARAKBAAD;; QABOOL KARE’N.

  8. Bimlendu bhai …kya badhiya ghazal kahi hai apne…bahut hi umdaa ash’aar nikale hain….
    बहारों से रहा है तिरा नाता यक़ीनन
    तिरे आते ही मौसम सुहाना हो गया है….bahut umdaa she’r hua hai…

    नई उम्मीद चमकी मिरी आँखों में शब भर
    ‘ अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है’..girah to shandaar lagayi hai

    तवज्जो दे रहा है वो मुझ पर आज इतनी
    करेगा वार कोई ये पक्का हो गया है…wahh wahh…
    -Kanha

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