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T-18/19 न था तेरा कभी जो वो तेरा हो गया है-शाज़ जहानी

न था तेरा कभी जो वो तेरा हो गया है
न था मेरा कभी जो वो मेरा हो गया है

उजाले में जो दिन के नहीं दिखलायी देता
वो आयेगा नज़र अब अंधेरा हो गया है

मनाज़िर हो के मुबहम सिमटते जा रहे हैं
ये कोहरा रफत: रफत: घनेरा हो गया है

ये गिरदाबो-तलातुम नहीं उसको डराते
समंदर से शनासा मछेरा हो गया है

हुआ है बारहा ये कि रहबर इब्तिदा का
सफर तय होते होते लुटेरा हो गया है

यक़ीं आता नहीं अब यहाँ तारी ख़ला थी
तेरी यादों का दिल में बसेरा हो गया है

रहा उन गेसुओं के तसव्वुर में मैं शब भर
अंधेरा तिलिमला कर सवेरा हो गया है

बनी तसवीर उस से कुछ इतनी ख़ूबसूरत
कि ख़ुद तिमसाल-आसा चितेरा हो गया है

हमेशा के लिये तो नहीं मसकन किसी का
फ़क़त कुछ रोज़ सबका ये डेरा हो गया है

आलोक कुमार श्रीवास्तव “शाज़” जहानी 9350027775

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4 comments on “T-18/19 न था तेरा कभी जो वो तेरा हो गया है-शाज़ जहानी

  1. आदरणीय आलोक कुमार श्रीवास्तव ‘ साज़’ जहानी साहब, सबसे हटकर, और उम्दा शायरी के लिये दाद क़बूल फरमाएगा ।
    उजाले में जो दिन के नहीं दिखलायी देता
    वो आएगा नज़र अब अन्धेरा हो गया है
    वाह !!!

  2. बहुत अच्‍छे अश्‍’आर हुए हैं साहब।
    वाह…बहुत उम्‍दा।

  3. न था तेरा कभी जो वो तेरा हो गया है
    न था मेरा कभी जो वो मेरा हो गया है
    मतले कि गढन अच्छी और मुकम्मल है लेकिन फिर भी यह मतला रहस्य के इम्कान खोल कर ठहर जाता है –वह क्या शै है जो तेरी हो गई और क्या मेरा हो गया अभी भी वसवसे की ज़द मे ही है !!!
    उजाले में जो दिन के नहीं दिखलायी देता
    वो आयेगा नज़र अब अंधेरा हो गया है
    खूबसूरत शेर है !!! इन तेज़ उजालो से बीनाई को खतरा है— के आलोक मे देखे तो
    अन्धेरा चाँद तारे और जुगनुओ को नुमाया भी करता है !!!
    मनाज़िर हो के मुबहम सिमटते जा रहे हैं
    ये कोहरा रफत: रफत: घनेरा हो गया है
    क्या खूब शिल्प है इस शेर का बहुत खूब बहुत खूब शाज़ जी बहुत खूब !!!! मजबूत कहन उम्दा !!!
    ये गिरदाबो-तलातुम नहीं उसको डराते
    समंदर से शनासा मछेरा हो गया है
    यह शेर भी बहुत उम्दा है !! समन्दर और मछेरा –दोनो अर्थ लिये है और शेर कामयाब है !!!
    हुआ है बारहा ये कि रहबर इब्तिदा का
    सफर तय होते होते लुटेरा हो गया है
    चलता हूँ थोड़ी दूर हरिक तेज़ रौ के साथ
    पहचानता नहीं हूँ अभी राहबर को मै –ग़ालिब
    हमेशा के लिये तो नहीं मसकन किसी का
    फ़क़त कुछ रोज़ सबका ये डेरा हो गया है
    सच है !!
    आलोक कुमार श्रीवास्तव “शाज़” जहानी जी आपको ग़ज़ल के लिये बहुत बहुत बधाई !!!

  4. बड़े खूबसूरत अश’आर हुए हैं आलोक जी। दाद कुबूल करें।

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