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T-18/18 मरज़ हद से बढ़ा जब तो अच्छा हो गया है-अब्दुल अहद ‘साज़’

मरज़ हद से बढ़ा जब तो अच्छा हो गया है
‘अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है’

नफ़स की आमदो-शुद नहीं कुछ हमको शुद-बुद
प कहता है समय ख़ुद कि पूरा हो गया है

नसों में सनसनाहट रगों में सरसराहट
अजल की सी है आहट इशारा हो गया है

पड़े ख़ुद में सिमट कर रही दुनिया उचट कर
ज़रा देखो पलट कर ये सब क्या हो गया है

न कोई नामो-निसबत न दिल की मिल्कियत कुछ
हमारा था ही कब जो तुम्हारा हो गया है

ग़ज़ल में ‘साज़’ हमने मुआफ़ी मांग ली है
सुख़न की ग़लतियों का इज़ाला हो गया है

अब्दुल अहद ‘साज़’ 09833710207

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7 comments on “T-18/18 मरज़ हद से बढ़ा जब तो अच्छा हो गया है-अब्दुल अहद ‘साज़’

  1. नफ़स की आमदो-शुद नहीं कुछ हमको शुद-बुद
    प कहता है समय ख़ुद कि पूरा हो गया है

    न कोई नामों-निसबत न दिल की मिल्कियत कुछ
    हमारा था ही कब जो तुम्हारा हो गया है

    जनाब अब्दुल अहद ‘ साज़’ साहब,
    दाद क़बूल फरमाएगा !!!!!

  2. उस्‍तादाना ग़ज़ल पर मुझ जैसा शख्‍़स क्‍या कहे।
    बहुत उम्‍दा।
    शुक्रिया।
    नवनीत

  3. मरज़ हद से बढ़ा जब तो अच्छा हो गया है
    ‘अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है’
    सोज़ साहब !! गिरह आपके नाम हुई !!! बहुत खूब !! जिस ज़ाविये से आपने इस शेर पर गिरह लगाई है उसका जवाब नहीं और वो भी मतले मे !! क्या बात है !!!! इस शेर पर इस मतले पर इस गिरह पर देर तक तालियाँ !!!!
    नफ़स की आमदो-शुद नहीं कुछ हमको शुद-बुद
    प कहता है समय ख़ुद कि पूरा हो गया है
    होशो हवास तावो –तुवाँ दाग़ खो चुके
    अब हम भी जाने वाले है सामान तो गया –मिर्ज़ा दग़ देहलवी
    वक़्त आहट दे देता है कि मियाँ !!! अब हम कम बचे है !!!!
    नसों में सनसनाहट रगों में सरसराहट
    अजल की सी है आहट इशारा हो गया है
    एक परिपूरक है पिछले शेर का यह शेर !! –लेकिन बदलते वक़्त की आहटे ऊला मिसरा मे शेर को एक रेंज भी दे रही है !!!
    पड़े ख़ुद में सिमट कर रही दुनिया उचट कर
    ज़रा देखो पलट कर ये सब क्या हो गया है
    सोज़ साहब !! ऊला मिसरे की गढन जटिल है !!!
    न कोई नामो-निसबत न दिल की मिल्कियत कुछ
    हमारा था ही कब जो तुम्हारा हो गया है
    कम्बख़्त नामुराद लड़कपन का यार था !!!
    ग़ज़ल में ‘साज़’ हमने मुआफ़ी मांग ली है
    सुख़न की ग़लतियों का इज़ाला हो गया है
    अब्दुल अहद ‘साज़’ साहब !! इस उस्तादाना ग़ज़ल पर आपको दाद !! –मयंक

  4. नफ़स की आमदो-शुद नहीं कुछ हमको शुद-बुद
    प कहता है समय ख़ुद कि पूरा हो गया है

    नसों में सनसनाहट रगों में सरसराहट
    अजल की सी है आहट इशारा हो गया है

    waah kya achha sher hua hai abdul sahab. dheron daad.

  5. achchi gazal huyi hai jnb …daad haazir hai
    Maqte meN aap inkesaar ne dil jeet liya..
    wahh waaahhhh
    DR .AZAM

  6. अब्दुल अहद ‘साज़’ SAHAB, UMDA GHAZAL HUI HAI MUBAARAK BAAD PESH KARTA HU’N QABOOL FARMAAYE’N.

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