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T-18/16 मताये-दिल लूटी है ख़सारा हो गया है-अहमद सोज़

मताये-दिल लूटी है ख़सारा हो गया है
मिरी आँखों के आगे अँधेरा हो गया है

तुम्हारे इश्क़ ने ये किया है हाल मेरा
मिरी दीवानगी का तमाशा हो गया है

बदलते मौसमों ने बदल डाला है सब कुछ
यहाँ सब कुछ हमारा तुम्हारा हो गया है

ये भीगी-भीगी आँखें ये उतरा-उतरा चेहरा
मियां अख़बार पढ़ कर तुम्हें क्या हो गया है

जिहालत और ग़ुरबत उजाड़ना और जलना
हमारी बस्तियों का नसीबा हो गया है

जो सूरज कसमसा कर उठा अंगड़ाई ले कर
‘ अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है’

दुआ मक़बूल इसकी हुई है ‘सोज़’ साहब
अभी मुल्के-आदम वो रवाना हो गया है

अहमद सोज़ 09768556225

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9 comments on “T-18/16 मताये-दिल लूटी है ख़सारा हो गया है-अहमद सोज़

  1. क्‍या बात है सोज़ साहब। बहुत उम्‍दा ग़ज़ल।

  2. जो सूरज कसमसा कर उठा अंगड़ाई ले कर
    अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है’

    बहुत अच्छी गिरह लगी है आ.सोज़ साहब। एक अच्छी ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई।

  3. UMDA GHAZAL…RAWAYAT BHI JIDDAT BHI…ACHCHA IMTIZAJ HAI JNB..DAAD HAAZIR HAI..
    DR.AZAM

  4. मताये-दिल लूटी है ख़सारा हो गया है
    मिरी आँखों के आगे अँधेरा हो गया है अहमद सोज़ साहब ” MATLA TA MAQTA ” MURASSA GHAZAL HAI JANAAB-E-AALI, LAGAATAAR WAAH WAAH KARNE KO DIL KAR RAHA HAI. ”BE-SHUMAAR DAAD”

  5. मताये-दिल लूटी है ख़सारा हो गया है
    मिरी आँखों के आगे अँधेरा हो गया है
    लाज़मी है !! आँखो के आगे अन्धेरा !!! कीमती शै लुटी है – मतले पर दाद !!!
    तुम्हारे इश्क़ ने ये किया है हाल मेरा
    मिरी दीवानगी का तमाशा हो गया है
    इब्तिदा ए इश्क है ……… आगे आगे देखिये ….
    बदलते मौसमों ने बदल डाला है सब कुछ
    यहाँ सब कुछ हमारा तुम्हारा हो गया है
    हमारा तुम्हारा सब मालिक का ही है !!!
    ये भीगी-भीगी आँखें ये उतरा-उतरा चेहरा
    मियां अख़बार पढ़ कर तुम्हें क्या हो गया है
    अर्से से अखबार की तासीर यही है !!!!!
    जिहालत और ग़ुरबत उजाड़ना और जलना
    हमारी बस्तियों का नसीबा हो गया है
    बस एक रात का सफर है क्या गिला कीजै !!!! मुसाफिरो को गनीमत है ये सराय बहुत !!!!
    जो सूरज कसमसा कर उठा अंगड़ाई ले कर
    ‘ अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है’
    उम्दा !!!!
    दुआ मक़बूल इसकी हुई है ‘सोज़’ साहब
    अभी मुल्के-आदम वो रवाना हो गया है
    मुल्के– अदम ( परलोक ) — सोज़ साहब !! एक शेर !!!
    हम खुदकुशी की ताब जुटा ही नही सके
    इस बेबेसी का नाम, चलो ज़िन्दगी सही –मयंक
    ग़ज़ल पर दाद !!! पुराने चावलो की खुश्बूओ का क्या कहना !!! –मयंक

  6. तुम्हारे इश्क़ ने ये किया है हाल मेरा
    मिरी दीवानगी का तमाशा हो गया है

    बदलते मौसमों ने बदल डाला है सब कुछ
    यहाँ सब कुछ हमारा तुम्हारा हो गया है

    ये भीगी-भीगी आँखें ये उतरा-उतरा चेहरा
    मियां अख़बार पढ़ कर तुम्हें क्या हो गया है
    आ. सोज़ साहब नायाब ग़ज़ल और उम्दा अशहार के लिए ढेरों दाद कबूल फरमाएं
    सादर

  7. ये भीगी-भीगी आँखें ये उतरा-उतरा चेहरा
    मियां अख़बार पढ़ कर तुम्हें क्या हो गया है

    Bahut Khoob….

  8. kya kahne soz sahab…

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