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T-18/14 कृपा का आपकी जो सहारा हो गया है-‘खुरशीद’ खैराड़ी

कृपा का आपकी जो सहारा हो गया है
भँवर से पार मेरा सफ़ीना हो गया है

अहिल्या को भी तारा अजामिल को भी तारा
मुझे भी तार दोगे भरोसा हो गया है

गरल हर साँस है अब विषैला नाग हर पल
विरह कैलाश जीवन शिवाला हो गया है

ग़रज़ की खाद पाकर मरासिम बर्गे-गुल सा
मुसलसल चुभ रहा है नुकीला हो गया है

सगुण है रूप तेरा अगुण है प्यार मेरा
कभी मीरा कभी दिल कबीरा हो गया है

ये लौ सा जगमगाता सुनहरा जिस्म तेरा
उमंगों से भरा दिल पतंगा हो गया है

ग़रीबी-भूख-क़र्ज़ा घिरा है गाँव मेरा
खुला मैदान था जो तिराहा हो गया है

न कर अफ़सोस इसका ज़माना क्या कहेगा
नये हैं हम ज़माना पुराना हो गया है

मुझे रघुनाथ जी की व्यवस्था पर यक़ीं है
था जीवन एक पत्थर शिकारा हो गया है

ग़ज़ल फिर गुनगुनाने लगे हैं दिलजले सब
ग़मों को भूलने का वसीला हो गया है

उफ़ुक पर शान से फिर हुआ ‘ख़ुरशीद’ क़ाबिज़
‘अँधेरा तिलमिलाकर सवेरा हो गया है ‘

‘खुरशीद’ खैराड़ी जोधपुर 09413408422

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12 comments on “T-18/14 कृपा का आपकी जो सहारा हो गया है-‘खुरशीद’ खैराड़ी

  1. आदरणीय जनाब ख़ुर्शीद ‘ख़ैराडी’ साहब, आप को पढ़ पाना, मेरा सौभाग्य है !
    क्या कह सकता हूं इसके अतिरिक्त कि आप सचमुच अपने नाम के अनुरूप हैं,
    ” हुई आमद किसी की उजाला हो गया है”

    आप के अलावा, कौन हो सकता है भला !
    दिल करता है कि आपका क़लाम पढता ही रहूं !

  2. बड़े खूबसूरत अश’आर हुए हैं खुरशीद साहब। दिली दाद कुबूल करें।

  3. Do ghazale’n ..ek se badhkar ek ash’aar..kya kahu’n khursheed ji bus ye hi kahunga..daad daad aur dheri sari daad..wahhhh
    -Kanha

  4. tasawwuf raNg ashaar ne ghazal ko bahut bulandi ata ki hai…
    is ke alawa bhi deegar ashaar apne wajood meN mustehkam haiN…
    daad haazir hai…
    DR.AZAM

  5. खुर्शीद भाई
    आदाब।
    बहुत अच्‍छा कलाम। मैं इन दिनों मसरूफ़ रहा अब सभी ग़ज़लों का आनंद ले पाऊंगा।
    बहुत खूब।
    नवनीत
    मक्‍़ता बतौरे-खा़स बहुत अच्‍छा लगा।

  6. ग़ज़ल पहले नज़्म के नज़दीक आई तो हमें मुस्ल्सल गज़ले खूब पढने को मिलीं –इसके बाद इधर गज़ल को आँचलिक भाषाओं मे कहने का सिल्सिला सुरूअ हुआ है और इस फार्मेट मे न जाने क्या है कि हर भाषा मे ग़ज़ल का स्वागत हो रहा है – खुर्शीद भाई की गज़ल को मैं गज़ल को भजन की दिशा मे ले जाने वाले प्रयास की इब्तिदा मान रहा हूँ — मृदुल क्रष्ण शास्त्री और मुम्बई वाले विनोद अग्रवाल ऐसी तर्ज़ पर कई भजन गा भी चुके हैं और बहुत से पुराने भजन भी इस अन्दाज़ की थोड़ी बहुत आहट देते भी हैं !! इस प्रयास को सम्बल दिया है खुर्शीद भाई की पुरासर अभिव्यक्ति ने !! वो कम्ज़ोर शेर कहते ही नहीं हैं –इसलिये गज़ल अनूठी हुई है ये –इस गज़ल से भजन को अलग कर लिया जाये तो –भजन ये हुआ —
    कृपा का आपकी जो सहारा हो गया है
    भँवर से पार मेरा सफ़ीना हो गया है
    अहिल्या को भी तारा अजामिल को भी तारा
    मुझे भी तार दोगे भरोसा हो गया है
    गरल हर साँस है अब विषैला नाग हर पल
    विरह कैलाश जीवन शिवाला हो गया है
    सगुण है रूप तेरा अगुण है प्यार मेरा
    कभी मीरा कभी दिल कबीरा हो गया है
    मुझे रघुनाथ जी की व्यवस्था पर यक़ीं है
    था जीवन एक पत्थर शिकारा हो गया है
    और एक गज़ल ये भी हुई !!
    ग़ज़ल फिर गुनगुनाने लगे हैं दिलजले सब
    ग़मों को भूलने का वसीला हो गया है
    ग़रज़ की खाद पाकर मरासिम बर्गे-गुल सा
    मुसलसल चुभ रहा है नुकीला हो गया है
    ये लौ सा जगमगाता सुनहरा जिस्म तेरा
    उमंगों से भरा दिल पतंगा हो गया है
    ग़रीबी-भूख-क़र्ज़ा घिरा है गाँव मेरा
    खुला मैदान था जो तिराहा हो गया है
    न कर अफ़सोस इसका ज़माना क्या कहेगा
    नये हैं हम ज़माना पुराना हो गया है
    उफ़ुक पर शान से फिर हुआ ‘ख़ुरशीद’ क़ाबिज़
    ‘अँधेरा तिलमिलाकर सवेरा हो गया है ‘
    दोनो के लिये खुर्शीद भाई आपको बहुत बहुत बधाई !! –मयंक

    • आदरणीय मयंक भाईसाहब
      सादर प्रणाम
      मैंने चंद अशहार के फूल बिखेरे थे ,आपने इन्हें चुनकर भजन और ग़ज़ल की दो मालाएं तैयार कर दी हैं
      आपके स्नेह का मैं सदैव ऋणी रहूँगा |

  7. चमत्कारिक !!! अलौकिक !!! किसी भी शेर पर अंगुली रख दें वो अकेला अपने आप में नं 1 है। ऐसी ग़ज़ल सालों में कभी आती है। पूरी ग़ज़ल को जितना पढ़ते जाएँ हर शब्द एक ग्रन्थ है। बरसों याद रहेगी। साधुवाद। साधुवाद।

    • आ. राजमोहन सा.
      ज़र्रानवाज़ी के लिए शुक्रिया |आपके स्नेह का मैं तहेदिल से आभारी हूं
      सादर

  8. कृपा का आपकी जो सहारा हो गया है
    भँवर से पार मेरा सफ़ीना हो गया है

    अहिल्या को भी तारा अजामिल को भी तारा
    मुझे भी तार दोगे भरोसा हो गया है

    गरल हर साँस है अब विषैला नाग हर पल
    विरह कैलाश जीवन शिवाला हो गया है

    ग़रज़ की खाद पाकर मरासिम बर्गे-गुल सा
    मुसलसल चुभ रहा है नुकीला हो गया है

    सगुण है रूप तेरा अगुण है प्यार मेरा
    कभी मीरा कभी दिल कबीरा हो गया है

    किस किस शेर की तारीफ़ करूँ। सारे एक से बढ़कर एक।ढेरों दाद इस नए रंग के लिए।

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