12 टिप्पणियाँ

T-18/13 उसे देखा नहीं है ज़माना हो गया है-दिनेश नायडू

उसे देखा नहीं है ज़माना हो गया है
मेरी दुनिया में जैसे अंधेरा हो गया है

वो जो मुर्दा नहीं था मिरे अंदर का शायर,
तुम्हारी याद आयी तो ज़िंदा हो गया है

कोई फिर याद बन कर चला आया है मुझमे
मेरी बेचैनियों में इज़ाफ़ा हो गया है

अब अपना मौन तोड़ो, कोई तो बात छेड़ो
मेरे खाबो ख़यालो तुम्हे क्या हो गया है

यक़ीनन है कहीं पर तुम्हारा अक्स मन में
समय के साथ शायद वो धुँधला हो गया है

यहीं फूटा था यारो मेरी आँखों से चश्मा
यहीं सहरा था पहले जो दरिया हो गया है

मैं उसका नाम ले कर उलझता ख़ुद से क्यों हूँ
ये कैसा रंज मुझमें इकट्ठा हो गया है

मुझे घेरे हुए हैं किसी की सर्द आहें
कोई रहता है मुझमें जो तन्हा हो गया है

हमें घर छोड़ने का भला ग़म कोई क्यूँ हो
मुकम्मल दश्त देखो हमारा हो गया है

ज़रा सा ज़िक्र उसका बहुत है इस ज़मीं पर
मिरा ये शेर देखो मुरस्सा हो गया है

दिनेश नायडू 09303985412

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12 comments on “T-18/13 उसे देखा नहीं है ज़माना हो गया है-दिनेश नायडू

  1. हमें घर छोड़ने का भला ग़म कोई क्यूँ हो
    मुकम्मल दश्त देखो हमारा हो गया है ..Bahut Khoob Dinesh bhaai! Waah! Waah!

  2. बड़ी खूबसूरत ग़ज़ल हुई है दिनेश साहब। दिली दाद कुबूल करें।

  3. उसे देखा नहीं है ज़माना हो गया है
    मेरी दुनिया में जैसे अंधेरा हो गया है

    वो जो मुर्दा नहीं था मिरे अंदर का शायर,
    तुम्हारी याद आयी तो ज़िंदा हो गया है

    कोई फिर याद बन कर चला आया है मुझमे
    मेरी बेचैनियों में इज़ाफ़ा हो गया है

    अब अपना मौन तोड़ो, कोई तो बात छेड़ो
    मेरे खाबो ख़यालो तुम्हे क्या हो गया ह…bilkul hamesha ki tarah se alag ….dil me uatrne wale she’r…apke she’r to koi bhi pehchan lega..wahhhhh…daad qubule’n bhaiya
    sadar
    -Kanha

  4. अब अपना मौन तोड़ो, कोई तो बात छेड़ो
    मेरे खाबो ख़यालो तुम्हे क्या हो गया है

    यक़ीनन है कहीं पर तुम्हारा अक्स मन में
    समय के साथ शायद वो धुँधला हो गया है

    यहीं फूटा था यारो मेरी आँखों से चश्मा
    यहीं सहरा था पहले जो दरिया हो गया है

    मैं उसका नाम ले कर उलझता ख़ुद से क्यों हूँ
    ये कैसा रंज मुझमें इकट्ठा हो गया है
    आ. दिनेश सा. मुहब्बत की बेकली से लबरेज़ इस खुबसूरत ग़ज़ल का हर शेर पसंद आया |कोट किये अशहार ने तो लड़कपन का हसीं ज़माना याद दिलाकर दिल की उमंगों को नया शबाब अता कर दिया है
    ढेरों दाद और बहुत बहुत शुक्रिया |

  5. मैं उसका नाम ले कर उलझता ख़ुद से क्यों हूँ
    ये कैसा रंज मुझमें इकट्ठा हो गया है

    मुझे घेरे हुए हैं किसी की सर्द आहें
    कोई रहता है मुझमें जो तन्हा हो गया है
    दिनेश भाई।
    आपको पढ़ना बेचैन करता है। यही इन ग़ज़लों की कामयाबी है।
    बहुत उम्‍दा।
    बहुत सुंदर।
    बहुत खूब।
    सादर
    नवनीत

  6. उसे देखा नहीं है ज़माना हो गया है
    मेरी दुनिया में जैसे अंधेरा हो गया है
    कई दिन से तुम्हे देखा नहीं है
    ये आँखों के लिये अच्छा नहीं है –मुनव्वर
    मुनव्वर के शेर की इंतेहा दिनेश भाई के शेर मे नुमाया हुई है –अच्छा मतला है मतले पर दाद !!!
    वो जो मुर्दा नहीं था मिरे अंदर का शायर,
    तुम्हारी याद आयी तो ज़िंदा हो गया है
    ये इल्म के शिकवे ये रिसाले ये किताबे
    इक शख़्स की यादो को भुलाने के लिये हैं –जाँनिसार अख्तर
    अन्दर का शाइर कभी किसी के कारन जन्मा होगा –वही मर्कज़ भी होगा हर ख्याल का ..
    यक़ीनन है कहीं पर तुम्हारा अक्स मन में
    समय के साथ शायद वो धुँधला हो गया है
    और हम भूल गये हो तुम्हे कोई ऐसा भी नहीं … फ़िराक !!
    यहीं फूटा था यारो मेरी आँखों से चश्मा
    यहीं सहरा था पहले जो दरिया हो गया है
    शेर का कैनवास बहुत अच्छा बनाया है !!!
    मैं उसका नाम ले कर उलझता ख़ुद से क्यों हूँ
    ये कैसा रंज मुझमें इकट्ठा हो गया है
    मुझे घेरे हुए हैं किसी की सर्द आहें
    कोई रहता है मुझमें जो तन्हा हो गया है
    ऊपर के दोनो शेर भिन्न मन:स्थितियों के हैं जिन्हे कामयाबी से उकेरा गया है !!
    ज़रा सा ज़िक्र उसका बहुत है इस ज़मीं पर
    मिरा ये शेर देखो मुरस्सा हो गया है
    यह ज़िक्र महबूब और मालिक दोनो का ही हो सकता है !!
    दिनेश भाई !!! ग़ज़ल पर बधाई !!! –मयंक

  7. उस्तादों के कलाम पर कुछ कहूँ ये मेरी हैसियत से बाहर है। बस नमन है आप में बिराजती सरस्वती जी को। अभिभूत करने वाली ग़ज़ल। हर शेर एक नायाब मोती। साधुवाद ह्रदय से।

  8. दादा बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है। व्यस्तता के चलते आपसे कई दिनों से दूर रहा। लेकिन अब धीरे धीरे आपकी सारी ग़ज़लें पढ़ रहा हूँ। एक से बढ़कर एक।

    यक़ीनन है कहीं पर तुम्हारा अक्स मन में
    समय के साथ शायद वो धुँधला हो गया है

  9. NAIDU SAHAB ACHCHHI GHAZAL HUI HAI, MATLA AUR IS SHER KA TO JAWAAB NAHI’N

    उसे देखा नहीं है ज़माना हो गया है
    मेरी दुनिया में जैसे अंधेरा हो गया है

    कोई फिर याद बन कर चला आया है मुझमे
    मेरी बेचैनियों में इज़ाफ़ा हो गया है

    BESHUMAAR DAAD, QABOOL KARE’N.

  10. Dinesh Bhai Achchi ghazal hui, phone par bhi sun chuka hooN..
    कोई फिर याद बन कर चला आया है मुझमे
    मेरी बेचैनियों में इज़ाफ़ा हो गया है

    kya baat hai.. waaaah!1

  11. Poori ki poori ghazal achchi hai.
    Ikattha. dariya. Murassa qafiye wala sHer
    sHer bahut khoob hua dinesh bhai….
    Dil se mubarakbad

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