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T18/13 तुम्हें खोया तो प्यासा वो दरिया हो गया है-आसिफ़ ‘अमान’

तुम्हें खोया तो प्यासा वो दरिया हो गया है
तुम्हें पाया तो पुरनम ये सहरा हो गया है

अधूरी तेरी दुनिया अधूरी मेरी दुनिया
मुकम्मल इक जहाँ अब हमारा हो गया है

मुझे ग़म इसलिये है रिहा होने का अपने
निगाहों मैं सभी की वो झूठा हो गया है

दवाएँ ना दुआएँ ना अपनों की अयादत
फ़क़त आमद से तेरी दिल अच्छा हो गया है

वो जो दिखता है तुमको हमेशा ग़मज़दा सा
वो ऐसा था नहीं पर वो ऐसा हो गया है

हो कबसे इस जहाँ मैं चुकाने की भी सोचो
इकठ्ठा उम्र भर का किराया हो गया है

मैं एक मुद्दत से जिसकी रहा ख़ाहिश में शामिल
वो ख़ुद अब जाके मेरी तमन्ना हो गया है

सभी अशआर तेरे हैं वाबस्ता उसी से
मिरे अन्दर के शायर तुझे क्या हो गया है

जो चेहरा तुझसे मिलकर गुलाबी हो गया था
तेरे जाने की सुनकर वो पीला हो गया है

सवेरा मुस्कुराकर अँधेरा हो गया था
‘अँधेरा तिलमिलाकर सवेरा हो गया है’

अमान आसिफ़ तो साहब अमां मैं रह के उसकी
उसी में मिल गया है, उसी सा हो गया है

आसिफ़ ‘अमान’ 08233418156

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28 comments on “T18/13 तुम्हें खोया तो प्यासा वो दरिया हो गया है-आसिफ़ ‘अमान’

  1. भाई मेरे कभी कोई ऐसा शे’र भी कहो जो पसंद नहीं आए। मुबारकबाद।

  2. अधूरी तेरी दुनिया अधूरी मेरी दुनिया
    मुकम्मल इक जहाँ अब हमारा हो गया है…kya kahne Asif saahb! Waah! Waah! Girah bhi khoob!

  3. बड़े खूबसूरत अश’आर हुए हैं आसिफ़ साहब। दिली दाद कुबूल करें।

  4. Asif bhai
    तुम्हें खोया तो प्यासा वो दरिया हो गया है
    तुम्हें पाया तो पुरनम ये सहरा हो गया है
    matle ne hi loot lia..kya behtreen matla hai..wahhh…
    girah to kamal ki baandhi hai
    सभी अशआर तेरे हैं वाबस्ता उसी से
    मिरे अन्दर के शायर तुझे क्या हो गया है..kya kahu’n bhai ..daad qubule’n
    -Kanha

  5. मैं एक मुद्दत से जिसकी रहा ख़ाहिश में शामिल
    वो ख़ुद अब जाके मेरी तमन्ना हो गया है

    सभी अशआर तेरे हैं वाबस्ता उसी से
    मिरे अन्दर के शायर तुझे क्या हो गया है

    तुम्हें खोया तो प्यासा वो दरिया हो गया है
    तुम्हें पाया तो पुरनम ये सहरा हो गया है

    अधूरी तेरी दुनिया अधूरी मेरी दुनिया
    मुकम्मल इक जहाँ अब हमारा हो गया है
    आ. आसिफ़ सा. मतला ता मक्ता एक मुक़म्मल ग़ज़ल है |ढेरों दाद कबूल फरमाएं|
    सादर

  6. अधूरी तेरी दुनिया अधूरी मेरी दुनिया
    मुकम्मल इक जहाँ अब हमारा हो गया है

    इस शे’र को कोट करने का अर्थ यह नहीं है कि बाकी शे’र मुझे अच्‍छे नहीं लगे। बस यह हुआ कि ये शे’र अपने बहुत करीब लगा।
    आपको पढ़ने की तलब रहती है।
    शुक्रिया। बहुत उम्‍दा ग़ज़ल।
    नवनीत

  7. तुम्हें खोया तो प्यासा वो दरिया हो गया है
    तुम्हें पाया तो पुरनम ये सहरा हो गया है
    मुहब्बत की बात है और मुहब्बत के ऊँचाई को काइम रखते हुये कही गई है –मेरे ख्याल से मुहब्बत , दोस्त , गुर्बत , जैसे शब्दो को सबसे अधिक शाइरी ने एक्स्प्लोर किया है और इन्हे एक नई स्वीकृति भी दी है !!!
    अधूरी तेरी दुनिया अधूरी मेरी दुनिया
    मुकम्मल इक जहाँ अब हमारा हो गया है
    ये शेर तो अब बहुत जगह पहुँच चुका है—गो कि उसका ज़ाविया और लुत्फ वहाँ पर मुख़्तलिफ है – एक कार्टून जिसमे लालू यादव और नीतीश एक ही अण्दरवीयर के दो पाय्चों मे खडे हैं और नाड़े का एक एक सिरा थामे हुये है !! उसके उंवान के तौर पर ये शेर कई जगह शेयर किया गया और लोगों को खूब हम्सा सका !! – फिर भी शेर अपनी जगह संजीदा है और किसी के भी दिल को छूने का माद्दा रख्ता है !!
    मुझे ग़म इसलिये है रिहा होने का अपने
    निगाहों मैं सभी की वो झूठा हो गया है
    ये भी मुहब्बत का एक रंग है और गहरा है – तेरे वादे पर जिये हम तो ये जान झूठ जाना … जैसी सिफत इस शेर की भी है !! महबूब , महबूब है चाहे वो जो नुकसान करें लेकिन उसका जवाल बर्दाश्त नहीं … वाह !!!
    दवाएँ ना दुआएँ ना अपनों की अयादत
    फ़क़त आमद से तेरी दिल अच्छा हो गया है
    बहुत खूब !! उनके देखे जो आ जाती है मुँह पे रौनक ….
    वो जो दिखता है तुमको हमेशा ग़मज़दा सा
    वो ऐसा था नहीं पर वो ऐसा हो गया है
    नियति है हमारे देश के नौजवानो की , सदाकत की राह पर चल्ने वालो की और कोई भी श्रेष्ठ और शुभ आरम्भ करने वालो की ….ग़मज़दा रहना !!
    हो कबसे इस जहाँ मैं चुकाने की भी सोचो
    इकठ्ठा उम्र भर का किराया हो गया है
    यकीनन !!
    दोनो जहान दे के वो समझा ये खुश हुआ
    याँ आ पड़ी ये शर्म के तकरार क्या करें –गालिब !!!
    मैं एक मुद्दत से जिसकी रहा ख़ाहिश में शामिल
    वो ख़ुद अब जाके मेरी तमन्ना हो गया है
    उधर के मुहब्बत की शिद्दत ज़ियादा होगी –तय है !! अच्छा शेर कहा है !!
    सभी अशआर तेरे हैं वाबस्ता उसी से
    मिरे अन्दर के शायर तुझे क्या हो गया है
    इश्क हो गया है !! साफ है !!!
    जो चेहरा तुझसे मिलकर गुलाबी हो गया था
    तेरे जाने की सुनकर वो पीला हो गया है
    गुलाबी , लाल , पीला हरा और नीला , शफक –इन रंगो का शैरी मे खूब इस्तेमाल किया जाता है –हर रँग का शाइरी मे अपना वकार है –कुछ रंग इधर जगह बना रहे है – आसमानी , ज़ाफरानी और सियाह भी ….
    सवेरा मुस्कुराकर अँधेरा हो गया था
    ‘अँधेरा तिलमिलाकर सवेरा हो गया है’
    अच्छी गिरह है !! मता ए जाँ का बदल किरदार और श्ख़्सीयत के लिहाज से क़ुबूल होता है !!!
    अमान आसिफ़ तो साहब अमां मैं रह के उसकी
    उसी में मिल गया है, उसी सा हो गया है
    हुबाब हूँ, मेरा दरिया मुझे समोये है
    बड़ा यकीन मुझे अपने बादशाह मे है — आसिफ भाई !! गज़ल बहुत पसन्द आई बधाई !!! –मयंक

    • Mayank Awasthi Bhai, yakeen janiye kal se aapke comment ka intezaar kar raha tha, ghazal to jaisi hoti hai hoti hai leking aapka tabsara use balandi baksh deta hai.. wohi meri is ghazal ke saath bhi hui.. Tahe dil se shukrguzaar hooN!!

  8. वो ऐसा था नहीं पर वो ऐसा हो गया है। काश खुदा मुझे दस बीस हज़ार शब्द देते जो इस ग़ज़ल की कुछ दाद दे पाता। अतिरंजना न समझें। यही मैं वास्तव में सोच रहा हूँ। अति सुन्दर ग़ज़ल।

  9. हो कबसे इस जहाँ मैं चुकाने की भी सोचो
    इकठ्ठा उम्र भर का किराया हो गया है

    दवाएँ ना दुआएँ ना अपनों की अयादत
    फ़क़त आमद से तेरी दिल अच्छा हो गया है

    khoob sir ji bahut khoobsurat gazal kahi badhai sweekaren

  10. आसिफजी मैं गजल के सम्बन्ध में कुछ खास नहीं जानता फिर भी पढ़ लेता हूँ और गजल की मार्फत दिल की मासूमियत महसूस करता हूँ आपकी ये गजल भी कुछ इसी तरह का अहसास करवाती है ।आपकी गजल का हर शेर सादगी भरा है जो दिल को छू गया

  11. achchhi ghazal hui asif bhai.
    जो चेहरा तुझसे मिलकर गुलाबी हो गया था
    तेरे जाने की सुनकर वो पीला हो गया है…achchha hai… mujhe apna ek sher yaad aaya
    तिरे आने से जो आबाद हुआ है गुलशन
    तिरे जाते ही बियाबान न होगा? होगा! ..

  12. Waaaah…!! Kya kehne Aasif saahab!! Bahut achche she’r kahe hain aap ne…Dili daad kubool kijiye…!!

  13. हो कबसे इस जहाँ मैं चुकाने की भी सोचो
    इकठ्ठा उम्र भर का किराया हो गया है

    इस शेर का तो क्या कहना….पूरी ग़ज़ल उम्दा है। ढेरों दाद।

  14. वो जो दिखता है तुमको हमेशा ग़मज़दा सा
    वो ऐसा था नहीं पर वो ऐसा हो गया है
    जनाब आसिफ़ ‘अमान’ साहब,लिखने का शऊर ना हो बेशक़, लेकिन पढना मुझे पहले आ गया था और उसी आधार पर मैं कहने की कोशिश कर रहा हूँ कि इतना प्यारा,इतना सादा,इतना गहरा और साथ ही साथ इतना सरल (आम लोगों को समझ में आ जाए जो) शे’र अभी resent past में मेरी नज़रों से तो नहीं गुज़रा है ।इससे जियादा अल्फ़ाज़ आते मुझे, तो वे सारे इस एक शे’र पर निस्सार !
    ग़ज़ल क्या है साहब, एक नज़ीर है हम जैसों के लिये।
    दर्ज़ा देने की औक़ात तो नहीं मेरी, लेकिन ये ज़ुर्रत आज मुझसे हो रही है कि मैं कहूँ कि बहुत ऊँचे दर्जे का है आपका क़लाम ।
    हज़्ज़ारों हज़ार दाद !!!!!!!!

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