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T18/10 ये माना जंग मेँ कुछ खसारा …..सिराज फ़ैसल ख़ान

ये माना जंग मेँ कुछ खसारा हो गया है
ये कम है, जीतने का सलीका हो गया है

कज़ा जैसी चली है हवा अब के चमन मेँ
सभी पेड़ों का जड़ से सफाया हो गया है

जिसे सब लोग अपने निशाने पर लिए थे
उसी का हर कोई अब निशाना हो गया है

किसी ने तोड़ ली हैँ सफ़ेँ सब काफिले की.
के रहबर काफिले का अकेला हो गया है.

दिये ने तीरगी मेँ उजाले की अज़ां दी
“अंधेरा तिलमिलाकर सवेरा हो गया”

मियां तुम अपने सर पे लगी टोपी हटा लो
सुना है मारकिट* मेँ धमाका हो गया है ((Market)

जहां पर सल्तनत थी अज़ल से रोशनी की
वहां पर तीरगी का बसेरा हो गया है

जो मिट्टी थी बदन की उसे निगला ज़मीं ने
जो मिट्टी मेँ बसा था खला का हो गया है

सियासत घुल गयी है सभी रिश्तोँ मेँ ‘फैसल’
मुहब्बत का समन्दर भी खारा हो गया है

क़लम मक़्ते पे पहुँची तो हमको होश आया
ग़ज़ल कहनी थी उस पे, कसीदा हो गया है

सिराज फ़ैसल ख़ान ( 07668666278)

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31 comments on “T18/10 ये माना जंग मेँ कुछ खसारा …..सिराज फ़ैसल ख़ान

  1. Bahut Achhi ghazal hui hai siraj Faisal Khan sahab. ..ye dono aaj’aar khaas tour pe pasand aaye. .daad qubule’n

    जो मिट्टी थी बदन की उसे निगला ज़मीं ने
    जो मिट्टी मेँ बसा था खला का हो गया है

    क़लम मक़्ते पे पहुँची तो हमको होश आया
    ग़ज़ल कहनी थी उस पे, कसीदा हो गया ह

    -Kanha

  2. क़लम मक़्ते पे पहुँची तो हमको होश आया
    ग़ज़ल कहनी थी उस पे, कसीदा हो गया है..Kya baat hai bhaai Waah!

  3. अच्छे अश’आर हुए हैं सिराज साहब। दाद कुबूल कीजिए। ये शे’र हासिल-ए-ग़ज़ल

    जो मिट्टी थी बदन की उसे निगला ज़मीं ने
    जो मिट्टी मेँ बसा था खला का हो गया है

  4. जो मिट्टी थी बदन की उसे निगला ज़मीं ने
    जो मिट्टी मेँ बसा था खला का हो गया है

    लूट लिया जनाब………। बहुत अच्‍छे बहुत अच्‍छे।
    बधाई।

  5. किसी ने तोड़ ली हैँ सफ़ेँ सब काफिले की.
    के रहबर काफिले का अकेला हो गया है.
    किसी ने तोड़ ली हैँ सफ़ेँ सब काफिले की.
    के रहबर काफिले का अकेला हो गया है.
    आ. सिराज सा. मतला ता मक्ता एक मुकम्मल ग़ज़ल हुई है ,बधाई कबूल फरमाएं |मार्किट वाला शेर और धमाके को टोपी से वाबस्ता किया जाना अच्छी थीम है |ढेरों दाद …..वा…………ह वाह
    सादर

  6. ये माना जंग मेँ कुछ खसारा हो गया है
    ये कम है, जीतने का सलीका हो गया है

    जहां पर सल्तनत थी अज़ल से रोशनी की
    वहां पर तीरगी का बसेरा हो गया है

    जो मिट्टी थी बदन की उसे निगला ज़मीं ने
    जो मिट्टी मेँ बसा था खला का हो गया है

    सिराज साहब , क्या ही अच्छी ग़ज़ल कही है आपने, ये शेर ख़ास तौर पर पसंद आए , दिली मुबारकबाद 🙂

  7. दिये ने तीरगी मेँ उजाले की अज़ां दी
    “अंधेरा तिलमिलाकर सवेरा हो गया”

    हर शेर बेहतरीन है

    दाद कबूल फ़रमायें….

  8. ACHCHI GHAZAL KE SAARE LAWAZEMAAT HAIn..KAHIn HAQ BAYANI ..KAHIn TANZ…KAHIn falsafa…kahiN josh…kahiN..SOZ…
    BAHUT KHOOB…
    DR.AZAM

  9. सिराज फ़ैसल ख़ान साहब पहली बार आपको पढ़ा, बड़ी अच्छी ग़ज़ल कही है.. मतला खूब कहा है .. मुबारकबाद!!
    # आसिफ

  10. क़लम मक़्ते पे पहुँची तो हमको होश आया
    ग़ज़ल कहनी थी उस पे, कसीदा हो गया है

    मियां तुम अपने सर पे लगी टोपी हटा लो
    सुना है मारकिट* मेँ धमाका हो गया है

    waah saahab bahut khoob …….

  11. ये माना जंग मेँ कुछ खसारा हो गया है
    ये कम है, जीतने का सलीका हो गया है
    सानी मिसरे के लहजे ने मतले की ज़ीनत में इज़ाफा किया !! ज़रूरी नहीं कि हर मिसरा नस्र करने पर व्याकरणीय अनुशासन का अनुपालक हो – नासिर काज़मी के बेशतर शेर इसके सुबूत हैं – ये कम है ??!!! —, जीतने का सलीका हो गया है—बहुत खूब सिराज भाई !!!
    जिसे सब लोग अपने निशाने पर लिए थे
    उसी का हर कोई अब निशाना हो गया है
    शेर की गढन और मौजूँ दोनो ही खूब हैं !!!!
    किसी ने तोड़ ली हैँ सफ़ेँ सब काफिले की.
    के रहबर काफिले का अकेला हो गया है.
    रहबरों की तनहाई का आज जो आलम है वो काबिले दीद है !! ):
    दिये ने तीरगी मेँ उजाले की अज़ां दी
    “अंधेरा तिलमिलाकर सवेरा हो गया”
    बेहतरीन गिरह है ये !! बेहतरीन !!!
    मियां तुम अपने सर पे लगी टोपी हटा लो
    सुना है मारकिट* मेँ धमाका हो गया है ((Market)
    तंज़ के साथ एक बहुत नाज़ुक सवाल भी है शेर में
    जो मिट्टी थी बदन की उसे निगला ज़मीं ने
    जो मिट्टी मेँ बसा था खला का हो गया है
    फल्सफा है और प्रभावशाली है –
    सुन्न मरै अनहद मरै अजपा हू मरि जाय
    दास कबीरा ना मरै कहिं वेद समुझाय –कबीरदास
    सियासत घुल गयी है सभी रिश्तोँ मेँ ‘फैसल’
    मुहब्बत का समन्दर भी खारा हो गया है
    ऐ दोस्त!! सियासत से भलाई न मिलेगी
    कीचड़ को मथोगे तो मलाई न मिलेगी –मयंक
    क़लम मक़्ते पे पहुँची तो हमको होश आया
    ग़ज़ल कहनी थी उस पे, कसीदा हो गया है
    सानी मिसरा एक आदर्श तरही मिसरा भे बन सकता है !!
    सिराज भाई !! ग़ज़ल के लिये बहुत बहुत बधाई !! –मयंक

    • Thanks a lot Bhai! Aap k shabd ham sabme nayi oorja bhar dete hain…aapki muhabbat aur duaayein mujhe hasil hain…ye jo bhi hai aapki dua hai…remember me in dua.

  12. *****
    Kuch samajh nhi aa raha kya tareef me likhu’n

    Bahrhal ghazal ka husn aisa hai ke sabko muhabbat ho jaye

    Ye she’r dil o dimag ki mashaqqat ke baad hi nikalte hai.
    Waah…

  13. bahut achchhe siraj sahab achchhe ash’aar kahe aapne ji khush ho gaya mubarakbaad qubool keejiye

  14. जो मिट्टी थी बदन की उसे निगला ज़मीं ने
    जो मिट्टी मेँ बसा था खला का हो गया है

    यह शेर कहने के लिए न जाने कितने बरसों क्या क्या अध्ययन किया गया होता है। तब कही जा कर ये गहरी बात निकलती है। मैं आप को बहुत बहुत साधुवाद देता हूँ।

  15. जनाब सिराज फ़ैसल ख़ान साहब,इतनी उम्दा शायरी के लिये क्या कहे कोई !
    आपकी ‘मारकिट’ पर कुछ कहने से अपने आप को रोक नहीं पा रहा हूँ,गुस्ताख़ जो हूँ
    नए लहज़े की लुकनत बसी है ‘मारकिट’ में
    हरुफ़-ऐ-रेख़्तां में इज़ाफ़ा हो गया है ।।
    आम बोलचाल के शब्द जब आ पाएं ग़ज़ल में,दिल को बड़ा सूकून मिलता है।
    क़लम मक़्ते पे पहुँची तो हम को होश आया
    ग़ज़ल कहनी थी उस पे कसीदा हो गया है
    मक़्ता भी बहुत पसंद आया।
    बेहतरीन क़लाम के लिये आपको दिल से मुबारकबाद।
    बच्चा हूँ,अगर खुशी खुशी में कुछ जियादा कहा गया हो तो, मुआफ़ी का तलबगार हूँ।

    • Thanks a lot Guruwant saahab…is portal par shayad mai hi sabse chhota hun…mujhe aapki muhabbat aur duaayein yu hi milti rahein…

  16. किसी ने तोड़ ली हैँ सफ़ेँ सब काफिले की.
    के रहबर काफिले का अकेला हो गया है.
    faisal bhai shandar ghazal huyee hai ….. umda !!!!!
    waah waah

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