37 टिप्पणियाँ

T18/9 मेरा किरदार अब यूँ बरहना……–मयंक अवस्थी

ग़ज़ल
मेरा किरदार अब यूँ बरहना हो गया है
मेरे शीशे के घर में उजाला हो गया है

सियासी नालियों ने पनाहें बख़्श दी जब
जो कल तक केंचुआ था, सँपोला हो गया है

चिकोटी काट ली जब,,उसे सूरज ने आकर
“अँधेरा तिलमिला कर सबेरा हो गया है”

मेरे अहसास पर यूँ कोई आँसू गिरा है
कि इस पत्थर के तन पर, फफोला हो गया है

मिंयाँ!! छोड़ो हटाओ, चलो तस्लीम कर लो
कोई शैतान अब तो, मसीहा हो गया है

गरल पीता रहा हूँ, मैं विषधर पालता हूँ
इसी ख़ातिर मेरा घर, शिवाला हो गया है

मेरे दुश्मन ने मुझको, तेरे जैसा बताया
मेरे मुँह पे ये थप्पड़, करारा हो गया है

मेरी ज़ख़्मी अना पर, जो इक जुमला नमक था
वो यारो की ज़ुबाँ पर, मसाला हो गया है

ख़ुलूस,ईमान,पुर्शिस, कहाँ, किस शहर मे हैं
इन्हें देखे हुये तो ज़माना हो गया है

मयंक अवस्थी (08765213905)

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37 comments on “T18/9 मेरा किरदार अब यूँ बरहना……–मयंक अवस्थी

  1. दिनेश कुमार स्वामी –हमारे बेहद अज़ीज़ शबाब मेरठी साहब ने ये कमेण्ट मुझे एस एम एस किया है मेरी गज़लो के लिये — इस आग्रह के साथ कि मैं इसे सन्दर्भ सहित पोस्ट कर दूँ !! आज से 40 बरस पहले ग़ज़ल के जिन तीन नामो का मैगज़ींस मे चर्चा रहता था –वो थे दुष्यंत कुमार , सूर्यभानु गुप्त और शबाब मेरठी साहब !! हमारा सौभाग्य है कि वो आज भी हमारे साथ मुशायरा शेयर करते है !!! उनकी विचारधारा समाजवादी है और उनके पिता राष्ट्रीय नाट्य संस्था IPTA के संस्थापक सदस्य भी थे जाँनिसार और क़ैफी के दोस्त भी थे !! रिवायत और ज़दीदियत का ब्लेण्ड शबाब साहब को बेहद पसन्द है और 60+ की उम्र मे वो जैसा कह रहे है वो नई उम्र वालो के लिये तो स्पना है ही –लम्बे अर्से से शायरी से जुडे अज़ीम शायरो के लिये भी एक सनद और मश्वरा है !!
    Your couplets are surreal walks through the lives of ordinary men. You explore their emotions , their actions as conspired by their ambitions and traumas and through them let slip in your poetry. In short they are representative of human experience in general . They achieve an aesthetic transcendence beyond the poetic material . What greater gift can a reader wish for!! I am really impressed by your poetry . Indeed there is an energetic engagement with chemical bond across vast gulf of time and experience . I wanted to post my comments as I did, not find any space expect boxes . FROM SHABAAB MEERATHI –FOR MAYANAK AWASTHI
    शबाब साहब !!! मेरी हैसियत से बडा कमेण्ट है !! मै नि:शब्द हूँ !! –साभार –मयंक

  2. मिंयाँ!! छोड़ो हटाओ, चलो तस्लीम कर लो
    कोई शैतान अब तो, मसीहा हो गया है..Waah Sir! Bahut khoob!

  3. मयंक अवस्थी साहब,

    एक शे’र भी अच्‍छा हो तो ग़ज़ल कामयाब,फिर यहां तो मुश्किल ये है कि किसे चुनें और किसे छोड़ें। बहरहाल जो अश’आर मुझे ख़ास पसंद आए वो हैं-

    मेरा किरदार अब यूँ बरहना हो गया है
    मेरे शीशे के घर में उजाला हो गया है

    चिकोटी काट ली जब,,उसे सूरज ने आकर
    “अँधेरा तिलमिला कर सबेरा हो गया है”

    मेरे अहसास पर यूँ कोई आँसू गिरा है
    कि इस पत्थर के तन पर, फफोला हो गया है

    गरल पीता रहा हूँ, मैं विषधर पालता हूँ
    इसी ख़ातिर मेरा घर, शिवाला हो गया है

    हर शख्‍़स अपनी फ़हम के हिसाब से शे’र को पहुंचता है। इन में से आखि़री शे’र को मैं आज घरों में दिख रहे अलगाव, मतलब परस्‍ती वग़ैरह पर शख्‍़स के रद्देअमल और उसके हासिल के, उसके अंजाम के बयान और उस रद्देअमल की पैरवी के रूप में देखता हूं।

    आप जिस फि़क्र के साथ अश’आर तक पहुंचते हैं वो आपके कलाम में भी नुमायां है।

    • कैफ़ साहब !! तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ !! मुझे भी आप जैसे संजीदा अदीबो की तलाश हमेशा रहती है !! एक बहुत जिम्मेदार पद पर रहते हुये आप इस विधा के लिये समय निकालते है !! यह ज़ौक़ भी काबिले सत्ताइश है !! आपकी ग़ज़ल का इंतज़ार है !!! –सादर –मयंक

  4. बड़ी खूबसूरत ग़ज़ल हुई है मयंक भाई। इन अश’आर के तो क्या कहने।

    मेरा किरदार अब यूँ बरहना हो गया है
    मेरे शीशे के घर में उजाला हो गया है

    सियासी नालियों ने पनाहें बख़्श दी जब
    जो कल तक केंचुआ था, सँपोला हो गया है

    मेरे अहसास पर यूँ कोई आँसू गिरा है
    कि इस पत्थर के तन पर, फफोला हो गया है

    मेरे दुश्मन ने मुझको, तेरे जैसा बताया
    मेरे मुँह पे ये थप्पड़, करारा हो गया है

    मेरी ज़ख़्मी अना पर, जो इक जुमला नमक था
    वो यारो की ज़ुबाँ पर, मसाला हो गया है

    ख़ुलूस,ईमान,पुर्शिस, कहाँ, किस शहर मे हैं
    इन्हें देखे हुये तो ज़माना हो गया है

    दिली दाद कुबूल कीजिए

  5. Dada sadar pranam…aapki ghazal ka hamesha intezar rehta hai mujhe….bahut behatreen ghazal hamesha ki tarah…aapke andaaz to alag se pehchane ja sakte hain….
    सियासी नालियों ने पनाहें बख़्श दी जब
    जो कल तक केंचुआ था, सँपोला हो गया है…bilkul sachha she’r..ahaa

    चिकोटी काट ली जब,,उसे सूरज ने आकर
    “अँधेरा तिलमिला कर सबेरा हो गया है”..kya masoom girah bandhi hai apne

    मेरे अहसास पर यूँ कोई आँसू गिरा है
    कि इस पत्थर के तन पर, फफोला हो गया है..kya kehne ..

    daad daad daad..

    -Kanha

  6. आदरणीय मयंक भाई साहब।

    क्‍या खूब ग़ज़ल हुई।
    मुझे ये अश्‍आर बेहद पसंद आए।

    मेरा किरदार अब यूँ बरहना हो गया है
    मेरे शीशे के घर में उजाला हो गया है

    सियासी नालियों ने पनाहें बख़्श दी जब
    जो कल तक केंचुआ था, सँपोला हो गया है

    चिकोटी काट ली जब,,उसे सूरज ने आकर
    “अँधेरा तिलमिला कर सबेरा हो गया है”

    मेरे अहसास पर यूँ कोई आँसू गिरा है
    कि इस पत्थर के तन पर, फफोला हो गया है

    मिंयाँ!! छोड़ो हटाओ, चलो तस्लीम कर लो
    कोई शैतान अब तो, मसीहा हो गया है

    गरल पीता रहा हूँ, मैं विषधर पालता हूँ
    इसी ख़ातिर मेरा घर, शिवाला हो गया है

    मेरे दुश्मन ने मुझको, तेरे जैसा बताया
    मेरे मुँह पे ये थप्पड़, करारा हो गया है

    मेरी ज़ख़्मी अना पर, जो इक जुमला नमक था
    वो यारो की ज़ुबाँ पर, मसाला हो गया है

    ख़ुलूस,ईमान,पुर्शिस, कहाँ, किस शहर मे हैं
    इन्हें देखे हुये तो ज़माना हो गया है

    …………………………………

    आपकी ग़ज़ल ने जादू कर दिया भाई।
    सादर
    नवनीत

  7. मेरा किरदार अब यूँ बरहना हो गया है
    मेरे शीशे के घर में उजाला हो गया है

    मतला इतना शानदार है की क्या कहूँ , बहुत ही ताकतवर आगाज़ , वाह , क्या कहने

    चिकोटी काट ली जब,,उसे सूरज ने आकर
    “अँधेरा तिलमिला कर सबेरा हो गया है”

    गिरह बेजोड़ है , और सानी मिसरा की जो तिलमिलाहट है वो चिकोटी काटने के साथ बिल्कुल फिट बैठती है

    मेरे अहसास पर यूँ कोई आँसू गिरा है
    कि इस पत्थर के तन पर, फफोला हो गया है

    वाह, हासिल-ए- ग़ज़ल ,
    हासिल -ए-मुशायरा , शायद ?
    क्या ही अच्छा शेर है , आँसू जी उठे , वीराना रोशन है

    तमाम ग़ज़ल बेमिसाल है ,बिल्कुल उसी मेयार की जैसी आपसे उम्मीद रहती है ,

    आपका,
    दिनेश

  8. UMDA GHAZAL MOHTARAM, KHAAS KAR GIRAH ME’N TO AAP NE WO KAMAAL KAR DIKHAYA HAI KI MAT POOCHHIYE, AISA LAGTA HAI K TARAH KA MISRA AAP KE MISRE KA HI MOHTAAJ HAI, AAP NE ” ANDHERA TILMILAA KAR” ME ”TILMILAANA” KO KHOOB NIBHAYA HAI . चिकोटी काट ली KYA KAHNE JANAAB, LUTF ANDOZ HONE KE LIYE ITNA HI KAAFI HAI. चिकोटी काट ली KI JITNI BHI DAAD DI JAAYE KAM HAI, MERE NAZDEEK ”HAASILE-MUSHAAYERA GIRAH” YAHI RAHEGI BAHUT BAHUT MUBAARAK BAAD.

  9. MaiN AKSAR AAP KI NIGARISHAAT DEKH KAR SOCHTA HUn…aap nassar achche haiN ki ghazalgo …is nateeje par pahuNcha huN ki aap aik genuine adeeb haiN…AUR GENIUS haiN…
    JIS QADAR AAP KI NASR HAIRATZADA KARTI HAI…USI TARAH AAP KI GHAZLEn bhi asarandaaz karti haiN….
    HAR SHER IS GHAZAL KA..SHAAHKAAR HAI..

    MayaNk ik baat sun lo,har ik sher is ghazal ka
    Takhayyul aur fan ka,namoona ho gaya hai

    • Muhattaram !!! waise main awaaz aur lahaje se pahachaan leta hun ki khushboo kiski hai –Lekin is waqt yaqeen waswase ki zad me hai !! Phir bhi ek baat tey hai ki anonymous title se ye bayaan mere liye –SADA E SANG E MEEL HAI –JO SAFAR ME MUJHE AAGE KISI MOD PAR ZAROOR MILEGA !!

      Kyonki filbadain Jo sher kaha gaya hai …Mayank ik baat sun lo ……aur jo zubaan hai Comment ki wo sang e meel ki hi hai —– tahe dil se shukriya apaka –regards –mayank

  10. Bahut umda ashaar huye hain bhai!

    मेरी ज़ख़्मी अना पर…Kya kehne bahut umda…!!
    Ye she’r padh k aapki wo ghazal yaad aa gayi jisme ye misra hai:

    कुछ दोस्त अपने जिस्म के अंदर उछल पड़े…!!

    Karara aur fafola kaafiye wale ashaar bhi bahut pasand aaye…lajawaab…waaah..!!

  11. मेरे अहसास पर यूँ कोई आँसू गिरा है
    कि इस पत्थर के तन पर, फफोला हो गया है

    आ. मयंक सा. ज़ज्बात का जुदा रंग उकेरा गया है ,नायाब शेर पर ढेरों दाद

    गरल पीता रहा हूँ, मैं विषधर पालता हूँ
    इसी ख़ातिर मेरा घर, शिवाला हो गया है

    क्या कहने ….भारतीय वैराग्य और तसव्वुफ़ का बेजोड़ संगम है
    प्रतिक्रिया दे रहा हूं आशीर्वाद की आशा है

    गरल हर साँस है अब विषैला नाग हर पल
    विरह कैलाश जीवन शिवाला हो गया है

    मेरे दुश्मन ने मुझको, तेरे जैसा बताया
    मेरे मुँह पे ये थप्पड़, करारा हो गया है
    क्या ख़ूब नया मिज़ाज नया अंदाज़ शुभान अल्लाह …..वाह

    मेरी ज़ख़्मी अना पर, जो इक जुमला नमक था
    वो यारो की ज़ुबाँ पर, मसाला हो गया है
    सही फरमाया आपने अज़ल से ज़माने का यही शगल है
    न कर अफ़सोस इसका ज़माना क्या कहेगा
    नये हैं हम ज़माना पुराना हो गाया है

    ख़ुलूस,ईमान,पुर्शिस, कहाँ, किस शहर मे हैं
    इन्हें देखे हुये तो ज़माना हो गया है
    मयंक सा. इस बेमिसाल ग़ज़ल पर ढेरों दाद कबूल फरमाएं
    तखय्युल की उड़ानें तसव्वुर की रवानी
    ग़ज़ल का जिस्म कुन्दन सरापा हो गया है
    सादर

    • खुर्शीद ख़ैराड़ी भाई !!!
      मैं नागपुर मे एक साहित्यिक संस्था का सदस्य था –वहाँ एक मासिक कार्यक्रम होता था ” सबकी नज़र से”!हर सदस्य को अपनी रचना सुनानी होती थी और उसके बाद हर सदस्य को उस पर कमेण्ट देना होता था!! इस प्रकार हर रचना प्र्स्तुत भी हो जाती थी और उसका एक ठीक ठाक मूल्याँकन भी हो जाता था –क्योकि उस संस्था के सदस्यों मे उस शहर के वरिष्ठ साहित्यकार भी थे – उस स्ंस्था मे एक विलक्षण प्रतिभा के धनी शाइर भी थे – वो इतनी अच्छी व्याख्या करते थे कि हम सब सम्मोहित रहते थे –उस प्रोग्राम की भीड़ का एक बड़ा कारण उनकी तनकीद ही थी – वो शेर के जदीदी और रिवायती पहलू का मूल्याँकन करते थे –शेर की अगर कोई मुख़्तलिफ शिनाख़्त होती थी तो उसे रेखंकित करते थे और –साथ ही मश्वरे के तौर पर उसी ज़मीन मे फिल्बदाइन एक दो शेर कहते थे !!! कहने की ज़रूरत नहीं कि उनका इतना सम्मोहन क्यों था ??!!
      सच कहूँ ऐसा लगा कि –वही क्षण पुनर्जीवित हो गये हैं !! इस प्रकार की साँगोपाँग व्याख्यायें लिख कर आप इस पोर्टल को समृद्ध भी कर रहे हैं और शाइर को गौरवांवित भी महसूस करवा रहे हैं – जो शेर आप कह रहे हैं वो मुहर हैं इस बात की कि कहने वाला विलक्षण प्रतिभा का धनी है – क्या खूब शेर कहा है — गरल हर साँस है अब, विषैला नाग हर पल
      विरह कैलाश, जीवन शिवाला हो गया है
      मैं बहुत बहुत आभारी हूँ –मयंक

  12. kya hi achchi ghazal kahi hai waah.
    kya mushkil qaafiye nazm kiye aapne
    barahna,sapola,phaphola, qarara.kya kahne bade bhai
    dili daad qubool keejiye..

  13. गरल पीता रहा हूँ, मैं विषधर पालता हूँ
    इसी ख़ातिर मेरा घर, शिवाला हो गया है

    बहुत विचार विमर्श (अपने आप से ) करने के बाद इस शेर को इस लिए पसंद किया मेरे ह्रदय और मस्तिष्क ने , क्योंकि यही कवि और शायर के ह्रदय को यथार्थ में प्रस्तुत करता है। वह दुनिया में से गरल को पी कर कर दुनिया को आगाह करता है। विषधरों को अपने घर में पालता है तो उसका घर एक भयानक स्थान नहीं अपितु एक पवित्र स्थान बनता जाता है। शब्द होते तो कुछ और भी कह पाता। साधुवाद मयंक जी।

    • राजमोहन साहब !! आभार !! पूर्णत: सहमत हूँ आपसे ! भगवान शिव शक्ति के सर्वकालीन अधिकारी देव हैं –ये शक्तियाँ विष को अमृत बनाने की सामर्थ्य रखती हैं !! तारीख़ की तफ़्सील में उतरें तो शिव पुराणों की आयु 5000 वर्ष से पहले की हो सकती है और वैष्णवों शैवों की लड़ाई भी इसके बाद गोस्वामी तुलसीदास तक स्पष्ट: चली –इसके बाद ही शायद हमारे धर्म की अधोमुखी चेतना के पराभव से उपजी प्रज्ञा ने ने दोनो परमपुरुषों में सामंजस्य का रास्ता स्वीकर कर लिया!! कारण ??! शिव का औघड़दानी होना ही है –भूत पिशाचों यक्ष गन्धर्व और किन्नरों में समभाव से पूज्य और प्रसन्न हो कर भस्मासुरों को भी इच्छावर देने वाले वाले शिव -क्रुद्ध होने पर देवयोनि कामदेव को भी भस्म करने वाले शिव की सत्ता ही गरल को जीत लेने –विषधरों से सिंगार करने के कारण है !! ये ही एक प्रकट देव हैं –ब्रहमा जैसे निर्गुण नहीं –जिनके तस्व्वुर का भार विचार भी नहीं उठा सकते !! और विष्णु जैसे नहीं जो एक अगम क्षीरसागर में विलास करते हैं !! सवाल उठता है कि नकारात्मक ऊर्जा को विश्ववैभव बना देने की सामर्थ्य के कारण ही उनकी प्रभुता है और सभी के लिये दरवाज़े खुले होने के कारण ही उनका घर शिवाला हो गया है –शेर को आपने समय दिया इसके लिये बहुत आभारी हूँ –मयंक

  14. Bhaiya… bahut umdaah ghazal… matla.. chautha sher aakhiri sher aur girah to behad pasand aaye… dher saari daad.. safar men hun isliye ziyada kah nahi pa raha….

  15. सियासी नालियों ने पनाहें बख़्श दी जब
    जो कल तक केंचुआ था, सँपोला हो गया है

    चिकोटी काट ली जब,,उसे सूरज ने आकर
    “अँधेरा तिलमिला कर सबेरा हो गया है”

    गरल पीता रहा हूँ, मैं विषधर पालता हूँ
    इसी ख़ातिर मेरा घर, शिवाला हो गया है

    वाह सर जी बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई है बधाई स्वीकारें

  16. मेरे दुश्मन ने….क्या बात कही जनाब आपने,मजा आ गया और मुहँ पे थप्पड़ …………गजब ढा दिया साहब आपने…………..तारीफ के लिये। अल्फाज नहीं हैं साहब।

    • धर्मेन्द्र सिंह साहब !! आपने जिस शेर को क्वोट किया है उससे मेरी आत्मिक ऊर्जा को जो बल मिला है उसे मैं बयान नहीं कर सकता !! अल्फाज़ में उतर कर शेर पढने वाले –किसी भी शाइर के लिये ईश्वरीय वरदान के समान होते हैं – बहुत बहुत आभार !! –मयंक

  17. मयंक भाई
    आपकी तरह तफ्सील से कॉमेंट कर पाने का हुनर मुझमे नहीं है मगर इस ग़ज़ल को पढ़ने के बाद यही कहूँगा कि “क्या उम्दा ग़ज़ल है….” गिरह तो बड़ी मजबूत है ही
    ख़ुलूस,ईमान,पुर्शिस, कहाँ, किस शहर मे हैं
    इन्हें देखे हुये तो ज़माना हो गया है
    इस शेर पर खासमखास दाद !!! दिली दाद क़ुबूल करें !!!

    • पवन साहब !! आपके बड़प्पन का काइल हूँ –वर्ना आपका नस्र और आपकी गज़ल दोनो के आगे अच्छे अदीब भी नतमस्तक है तो मेरी क्या बिसात !! आपका अपनी मस्रूफियत से गज़ल जैसी विधा के लिये समय निकालना भी मेरे जैसों के लिये बहुत प्रेरणाप्रद है और नई पीढी के लिये आप जो योगदान कर रहे हैं उसके लिये भी सम्पूर्ण अभिवादन !! –मयंक

  18. हर शे’र से कुछ ना कुछ सीखने को मिला। बड़ी उम्दा शायरी और बिल्कुल नए उपमान।हर लिहाज से क़ाबिल – ऐ – तारीफ़। दाद क़बूल फरमाएं।

    • गुरुवंत सिंह साहब !! बहुत बहुत आभार !! हमारे पोर्टल पर आप जैसे उत्साही और ऊर्जस्वी वय्क्ति के आने से रौनक बढी है !!! बहुत खुशी लगती है जब हमारे कबीले की हैसियत में इज़ाफा होता है – मयंक

  19. Mayank Bhai, is zameen maiN sher kehne maiN paseene chhoot rahe haiN.. aap ne behtareen ashaar nikale haiN.. ye sher khas taur se pasand aae..

    मेरा किरदार अब यूँ बरहना हो गया है
    मेरे शीशे के घर में उजाला हो गया है

    चिकोटी काट ली जब,,उसे सूरज ने आकर
    “अँधेरा तिलमिला कर सबेरा हो गया है”

    मेरे अहसास पर यूँ कोई आँसू गिरा है
    कि इस पत्थर के तन पर, फफोला हो गया है

    daad kubool kareiN.. maza aa gya!!

    • आसिफ अमान भाई !! तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ !!
      आप जैसे माहिर फनकार को इस ज़मीन पर कहने में कोई दिक्कत नहीं होगी –मैं जानता हूँ –लेकिन आप अपने मेयार के शेर कहने की कोशिश मे होंगे जो कि उचित भी है –इसलिये जो वक़्त लग रहा है लगने दीजिये और मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ कि आपसे एक बेहद उम्दा ग़ज़ल -इस ज़मीन पर इस पोर्टल को मिलेगी –मुंतज़िर हूँ –ग़ज़ल पसन्द करने के लिये एक बार फिर बहुत बहुत शुक्रिया –मयंक

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