11 टिप्पणियाँ

T-18/3 रगों में दौड़ता ख़ूँ जो शो’ला हो गया है-मुमताज़ नाज़ां

रगों में दौड़ता ख़ूँ जो शो’ला हो गया है
दिलों में नफ़रतों का अँधेरा हो गया है

ये बर्फ़ अहसास की अब पिघलती ही नहीं है
लबों को मुस्कराये ज़माना हो गया है

किरन उम्मीद की भी भटक जाती है अक्सर
जो दिल में ज़ुल्मतों का बसेरा हो गया है

ज़रा छेड़ा ख़िरद ने, जुनूँ को जोश आया
सराबों की तरफ़ वो रवाना हो गया है

धमाके ने बिखेरे जो टुकड़े ज़िंदगी के
ज़माने के लिए इक तमाशा हो गया है

किसी सूरत न डूबा जो उम्मीदों का सूरज
“अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है”

अज़ीयत है न अब वो कसक “मुमताज़” बाक़ी
ये दिल का ज़ख़्म अब तो पुराना हो गया है

मुमताज़ नाज़ां 09867641102/08756816181

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11 comments on “T-18/3 रगों में दौड़ता ख़ूँ जो शो’ला हो गया है-मुमताज़ नाज़ां

  1. ये बर्फ़ अहसास की अब पिघलती ही नहीं है
    लबों को मुस्कराये ज़माना हो गया है…lajawab…wahhh ..mumtaz ji bahut hi behatreen ghazal hui hai…maqta bhi khoob pasand aaya…daad
    – Kanha

  2. ये बर्फ़ अहसास की अब पिघलती ही नहीं है
    लबों को मुस्कराये ज़माना हो गया है

    आदरणीया।
    बहुत अच्‍छी ग़ज़ल।
    शुक्रिया
    नवनीत

  3. ये बर्फ़ अहसास की अब पिघलती ही नहीं है
    लबों को मुस्कराये ज़माना हो गया है

    waah kya sher hua hai. mumtaj ji man prasann ho gaya.

  4. UMDA GHAZAL HUI HAI MUMTAAZ SAHIBA, MUBARAK BAAD QABOOL KARE’N.

  5. अच्छी ग़ज़ल है मुमताज़ जी, दाद कुबूलें।

  6. ये बर्फ़ अहसास की अब पिघलती ही नहीं है
    लबों को मुस्कराये ज़माना हो गया है…kya kahne mumtaaz sahiba…waaah waah ..daad qubool karen.

  7. रगों में दौड़ता ख़ूँ जो शो’ला हो गया है
    दिलों में नफ़रतों का अँधेरा हो गया है
    मतला हमारे वक़्त की सचाई को बयाँ कर रहा है !!! सीने मे जलन आँखों में तूफान सा क्यूँ है ??!!
    ये बर्फ़ अहसास की अब पिघलती ही नहीं है
    लबों को मुस्कराये ज़माना हो गया है
    तस्लीम !!!
    दिलों मे बर्फ जमी है लबों पे सहरा है
    कहीं ख़ुलूस के झरने रवाँ नहीं होते
    धमाके ने बिखेरे जो टुकड़े ज़िंदगी के
    ज़माने के लिए इक तमाशा हो गया है
    एक तळ्ख़ सचाई जिसे हम दिनोदिन जीते जा रहे हैं !!!
    किसी सूरत न डूबा जो उम्मीदों का सूरज
    “अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है”
    गिरह बहुत सुन्दर लगाई गई है !! एक अलग ज़ाविये से – जिसमे हौसले और उमीद की जीत की बात कही गई है –बहुत खूब !!! दाद !!!
    मुमताज़ नाज़ां साहबा !! आपने हर तरही मे बहुत सुन्दर ग़ज़ले इस पोर्टल को प्रदान की हैं आभार !! सादर –मयंक

  8. अच्छी ग़ज़ल हुई है मुमताज़ नाज़ां साहिबा… ख़ास तौर पर ये शे’र
    ये बर्फ़ अहसास की अब पिघलती ही नहीं है
    लबों को मुस्कराये ज़माना हो गया है.. वाह

  9. ये बर्फ़ अहसास की अब पिघलती ही नहीं है
    लबों को मुस्कराये ज़माना हो गया है

    धमाके ने बिखेरे जो टुकड़े ज़िंदगी के
    ज़माने के लिए इक तमाशा हो गया है

    बहुत ख़ूब !

  10. अच्छी ग़ज़ल! मक्ता बहुत ख़ूब !

  11. मुमताज़ जी ग़ज़ल बहुत अच्छी है , मक़ता बहुत ही खूबसूरत है, और आपका ये शेर … जितनी तारीफ़ की जाए उतनी कम ….

    ये बर्फ़ अहसास की अब पिघलती ही नहीं है
    लबों को मुस्कराये ज़माना हो गया है

    बहुत मुबारकबाद 🙂

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