21 टिप्पणियाँ

T-18/1 चुरायी सूलियों से मसीहा हो गया है-राजमोहन चौहान

चुरायी सूलियों से मसीहा हो गया है
कन्हैया मिल गया तो सुदामा हो गया है

नगर बाबागिरी का ठिकाना हो गया है
नदी के तीर मंदिर बिराना हो गया है

चुनावों का है मौसम अजूबा हो गया है
जिसे देखो धरम का खुदा का हो गया है

चुनावी नेत्रियों का जो आना हो गया है
मिरी झुग्गी का मंज़र सुहाना हो गया है

ख़याली चाँद भी तो नज़र में चाँद ही था
बिना उस चाँद के सब अँधेरा हो गया है

बड़ा सिंपल था बंदा कभी पगडंडियों सा
नगर आ कर बिज़ी-सा तिराहा हो गया है

अँधेरा था अकेला जो दिल्ली की गली में
अँधेरा तिलमिला कर सवेरा हो गया है

अगर छेड़ा भी होता तो कोई बात होती
यहाँ लव यू कहा तो बखेड़ा हो गया है

हवा भर भर के उस को फुलाया दोस्तों ने
सुना कुछ देर पहले धमाका हो गया है ​

राजमोहन चौहान                     08085809050

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21 comments on “T-18/1 चुरायी सूलियों से मसीहा हो गया है-राजमोहन चौहान

  1. Saral bhasha …umdaaa ash’aar…bahut bahut badhai is sundar ghazal ke liye…

    _ kanha

  2. राजमोहन चौहान साहब।
    इस तरही की शाख पर पहले फल के रूप में आपकी ग़ज़ल है। बहुत खूब। उम्‍दा कलाम के लिए हार्दिक बधाई स्‍वीकार करें।
    सादर
    नवनीत

  3. चुरायी सूलियों से मसीहा हो गया है
    कन्हैया मिल गया तो सुदामा हो गया है

    शायरी का एक अलंकार है. सनअते-तज़ाद यानी विरोधाभासी अलंकार. दो विपरीत को इकठ्ठा करके अभिप्राय स्पष्ट करना. ये मतला उसका बहुत सुन्दर उदाहरण है. राजमोहन साहब आपका काम बेहतर होता जा रहा है. मेरी बधाई स्वीकार कीजिये

    • आदरणीय तुफैल जी, बहुत बहुत धन्यवाद आप को। सीखने का आनंद आ रहा है। आप सब के बीच तो वो सब बातें मिल रही हैं जो कभी न मिली थीं सीखने को। आप को साधुवाद है lafz के लिए।

  4. Miri jhuggi ka manzar…kya kehne bahut umda…!!

    Jise dekho dharam ka khuda ka ho gaya hai…lajawab…yahi burayi aur haqiqat hai bharat k netao ki…loktantra k liye bura…

    Bahut khoob…waaaah!

  5. बड़ा सिंपल था बंदा कभी पगडंडियों सा
    नगर आ कर बिज़ी-सा तिराहा हो गया है
    आ.राजमोहन सा. ग़ज़ल की प्रचलित भाषा से अलग अच्छा प्रयोग है ,एक नये मिज़ाज की ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई |दिली दाद कबूल फरमाएं
    सादर

  6. अलग मिज़ाज़ और लहजे की ग़ज़ल है राजमोहन साहब। दाद कुबूल कीजिए।

  7. waah waah rajmohan sahab achchhi ghazal hui mubarakbaad.

  8. राजमोहन जी !! नये मूड और नये मिज़ाज की गज़ल –प्रचलित शब्दों का खूब प्रयोग किया है सफलतापूर्वक !!! इस अन्दाज़ को अब अभिरुचि से महफिलों में सुना भी जाता है और सराहा भी जाता है –ग़ज़ल दौरे हाज़िर की है और अपने वक़्त का मज़र बनाने मे कामयाब है बधाई –मयंक

  9. राज मोहन जी … अलग मिज़ाज़ और लहजे की आपकी ये ग़ज़ल बहुत पसंद आई…. दिली मुबारकबाद 🙂

  10. राजमोहन जी पूरी ग़ज़ल मज़ेदार है। एक दम आज के समय की ग़ज़ल है। humour भी नया है इसका। बिजी तिराहा और नगर बाबागिरी तो कमाल हैं।

  11. “बड़ा सिंपल था बंदा कभी पगडंडियों सा”
    बहुत खूब राजमोहन साहब !
    दिली दाद !!

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