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इस नाज़ इस अँदाज़ से तुम हाए चलो हो- कलीम आजिज़

इस नाज़ इस अँदाज़ से तुम हाए चलो हो
रोज़ एक ग़ज़ल हम से कहलवाए चलो हो

रखना है कहीं पाँव तो रक्खो हो कहीं पाँव
चलना ज़रा आया है तो इतराए चलो हो

दीवाना-ए-गुल कैदी-ए-ज़ंजीर हैं और तुम
क्या ठाट से गुलशन की हवा खाए चलो हो

मय में कोई ख़ामी है न साग़र में कोई खोट
पीना नहीं आए है तो छलकाए चलो हो

हम कुछ नहीं कहते हैं कोई कुछ नहीं कहता
तुम क्या हो तुम्हीं सब से कहलवाए चलो हो

ज़ुल्फ़ों की तो फ़ितरत ही है लेकिन मेरे प्यारे
ज़ुल्फ़ों से ज़ियादा तुम्हीं बल खाए चलो हो

वो शोख़ सितम-गर तो सितम ढाए चले हैं
तुम हो के ‘कलीम’ अपनी ग़ज़ल गाए चलो हो

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2 comments on “इस नाज़ इस अँदाज़ से तुम हाए चलो हो- कलीम आजिज़

  1. Aisi batein ab kahan sunane me aati hain . ***** Five Star Rating, Sir…….

  2. रखना है कहीं पाँव तो रक्खो हो कहीं पाँव
    चलना ज़रा आया है तो इतराए चलो हो..kya badhiys she’r hai ..wahhh

    ज़ुल्फ़ों की तो फ़ितरत ही है लेकिन मेरे प्यारे
    ज़ुल्फ़ों से ज़ियादा तुम्हीं बल खाए चलो हो..lajawab

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