3 टिप्पणियाँ

मेरी सांसों की चाबियाँ रख दीं-इरशाद ख़ान सिकंदर

मेरी सांसों की चाबियाँ रख दीं
बैग में सब दवाइयाँ रख दीं

मुस्कुरा कर तुम्हारी यादों ने
मेरे हिस्से में सिसकियाँ रख दीं

ऐब सुनने को लोग आतुर थे
आपने मेरी ख़ूबियां रख दीं

हम भी निकले कमाल के क़ैदी
काट कर अपनी बेड़ियां रख दीं

एक ताज़ा हवा के झोंके ने
ग़म के माथे पे पट्टियां रख दीं

कोई शिकवा छलकने वाला था
दिल ने होठों पे उँगलियाँ रख दीं

दो क़दम पर तुम्हारी चौखट थी
सबने रस्ते में दूरियां रख दीं

बातें रखनी थीं सिर्फ अपने तक
तुमने लोगों के दरमियां रख दीं

तुम हो शाने पे फिर भी सीने में
किसकी यादों ने हिचकियाँ रख दीं

इरशाद ख़ान सिकंदर 09818354784

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3 comments on “मेरी सांसों की चाबियाँ रख दीं-इरशाद ख़ान सिकंदर

  1. koun sa she’r qoute krun..koun sa rehne du’n..ssre ash’sar kamal ke hain dada….

    मुस्कुरा कर तुम्हारी यादों ने
    मेरे हिस्से में सिसकियाँ रख दीं

    बातें रखनी थीं सिर्फ अपने तक
    तुमने लोगों के दरमियां रख दी
    ……lajawab..
    sadar
    -kanha

  2. क्या शाइस्तगी है! क्या शगुफ़्ता अंदाज़!

    ऐब सुनने को लोग आतुर थे
    आपने मेरी ख़ूबियां रख दीं….बहुत ख़ूब इरशाद भाई! पूरी ग़ज़ल लाजवाब!

  3. इरशाद अब आपके शेर की पहचान की जा सकती है. परंपरागत ढंग नये तौर-तरीक़े के साथ. आपका लहजा ख़ासी शक्ल ले चुका है. बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही. मुबारकबाद

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