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आस अस्ली ख़ुदा को तरसती रही-आलोक मिश्रा

आस अस्ली ख़ुदा को तरसती रही
आदतन ही मिरी बुतपरस्ती रही

ज़हनो-दिल के सभी पेंच ढीले पड़े
ज़िन्दगी मेरी गर्दन को कसती रही

फ़ासले दरमियाँ और बढ़ते रहे
ज़िन्दगी ज़िन्दगी को तरसती रही

चाँद क़िस्से तुम्हारे सुनाता रहा
जिनसे रौशन ख़यालों की बस्ती रही

बोझ कांधों पे दिन का उठाये फिरा
रात भर मेरी सांसों में पस्ती रही

ले गया वो लकीरें भी सब हाथ की
बाद उसके बहुत तंगदस्ती रही

दिल में शोले तिरे ग़म के जलते रहे
आँख मेरी मुसलसल बरसती रही

मिट गये चाँद झोंकों के छूने से ही
रेत सी क्यूँ इरादों की हस्ती रही

दिल का बाज़ार हमको तो महंगा पड़ा
नींद जैसी भी शय अब न सस्ती रही

आलोक मिश्रा

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4 comments on “आस अस्ली ख़ुदा को तरसती रही-आलोक मिश्रा

  1. चाँद के बजाय चंद या चन्द आना चाहिए शायद।
    ” मिट गए चन्द झौंकौं के छूने से ही”
    Misprints पर ध्यान दिया कीजिए। ये तो मतलब ही बदल दिया पूरी बात का !
    वैसे ग़ज़ल अच्छी है। बधाइयाँ

  2. ले गया वो लकीरें भी सब हाथ की
    बाद उसके बहुत तंगदस्ती रही..ahaa kya zabardast she’r hai bhai..wahhh

    दिल का बाज़ार हमको तो महंगा पड़ा
    नींद जैसी भी शय अब न सस्ती रह..ka to jawab nahin..daad aur badhai
    -kanha

  3. आलोक भाई क्या कहने! कुछ शेर इस ग़ज़ल के फोन पर सुने थे आपसे और आज पूरी ग़ज़ल पढ़ कर मज़ा दूना हो गया. भरपूर दाद!

  4. bahut acchi ghazal hui hai aalok…

    ले गया वो लकीरें भी सब हाथ की
    बाद उसके बहुत तंगदस्ती रही

    दिल में शोले तिरे ग़म के जलते रहे
    आँख मेरी मुसलसल बरसती रही

    दिल का बाज़ार हमको तो महंगा पड़ा
    नींद जैसी भी शय अब न सस्ती रही
    ye teen she’r to bahut umdaa hain waah waah…

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