10 टिप्पणियाँ

सामान है इस दरजा अंबार से सर फोड़ो- सौरभ शेखर

सामान है इस दरजा अंबार से सर फोड़ो
दीदार करो छत का, दीवार से सर फोड़ो

दरिया के मुसाफ़िर को साहिल की तमन्ना क्यूँ
गिर्दाब से तुम उलझो, मंझधार से सर फोड़ो

आग़ोश में टी.वी. की हर शाम करो काली
हर सुब्ह उसी बासी अख़बार से सर फोड़ो

दुनिया के तकब्बुर से तुम बाद में टकराना
फ़िलहाल मियां अपने पिन्दार से सर फोड़ो

मत देख के घबराओ, लोगों से पटी सड़कें
बेहतर है इसी रश के कुहसार से सर फोड़ो

कोमल हैं रगें इसकी नाज़ुक है बदन ‘सौरभ’
आराम से, धीरे से, अब प्यार से सर फोड़ो

सौरभ शेखर 09873866653

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10 comments on “सामान है इस दरजा अंबार से सर फोड़ो- सौरभ शेखर

  1. ये जो ” अख़बार से सर फोडो” वाला शेर है, ये बहुत खूबसूरत है। रोजमर्रा की बातें, इतने सुंदर और सरल रंग में कम ही देखने को मिलती हैं।
    और मक़्ता तो है ही सचमुच तारीफ़ के क़ाबिल।
    बड़ा नाज़ुक ख्याल है ।
    बधाई के हक़दार हैं, क़बूल करें।

  2. bilkul unique Radeef…Umdaa ghazal ..sare she’r bahut pasand aaye…wahhh…daad qubule’n bhaiya ..sadar
    -Kanha

  3. क्या कहने सौरभ भैया
    रदीफ़ का चयन और चुनाव का मौसम
    और पूरी की पूरी ग़ज़ल ही उम्दा
    दिली दाद कुबूल कीजिये
    With regards

  4. saurabh bhai ‘sar phodo’ padhkar sar dhun raha hoon kya hi achchhi ghazal hui hai in dino apka lahja aur bhi dilkash ho gaya hai..badhai qubool karen.

  5. saurabh bhai… kya radeef hai.. sabse pahle isi ke liye badhai qubul karen… radeef ke saath saath bahar ka chunaav is ghazal ka mizaaj bana deta hai.. sabhi she’r behad umdaa hue hain… kya kahne… maqte par to sau sau baar qurbaan…. waah

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