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वो तुम थे जिसको तुमने ठहरने नहीं दिया-नवनीत शर्मा

वो तुम थे जिसको तुमने ठहरने नहीं दिया
ये मैं हूं जिसने ख़ुद को मुकरने नहीं दिया

मौसम की मार सहते रहे जिल्‍द बनके हम
माज़ी का इक वरक़ भी बिखरने नहीं दिया

अलफ़ाज़ कह रहे थे उसे प्‍यार है बहुत
इसका मगर सुबूत ऩजर ने नहीं दिया

रस्‍ता तवील, आबले पैरों में थे मगर
खुद को ज़रा सी देर पसरने नहीं दिया

हम आबलों से सींच के आये थे रहगुज़र
ख़ुश हैं, तुम्‍हें ज़मीं पे उतरने नहीं दिया

मैंने भी जागते हुए रातें तमाम कीं
उसने भी कोई ख़ाब संवरने नहीं दिया

वो चांदनी जो फूट के रोयी थी रात भर
उसका पता ठिकाना सहर ने नहीं दिया

जो था नहीं हमारा उसी के हैं आज तक
बीते हुए को हमने गुज़रने नहीं दिया

जीने को कोसने में ख़राबी नहीं मगर
जीने के खा़ब ही ने तो मरने नहीं दिया

कल रात तेरी यादों के लश्‍कर चले रहे
ख़ाबों में शोरो-गुल ने उतरने नहीं दिया

आगे निकल के आ गये मंज़िल को छोड़ कर
हमको कोई पड़ाव सफ़र ने नहीं दिया

–नवनीत शर्मा 09418040160

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3 comments on “वो तुम थे जिसको तुमने ठहरने नहीं दिया-नवनीत शर्मा

  1. जो सरस्वती आप में स्थित हैं , उन्हें नमन। शब्दों की तो क्या कहूँ ,जो चित्र मन में उभरते हैं, वे पाठक को कहाँ से कहाँ पहुंचा देते हैं, अपनी ज़िन्दगी के बिखरे, भुलाये, छूटे पलों को फिर से जैसे 3D में छू आया हूँ एक बार!!! कुछ देर अनमना कर गयी है ये ग़ज़ल मुझे।
    “वो तुम थे …वो मैं…” पहले ही धक्के में कम से कम चार साढ़े चार दशक पीछे नवयुवा इलाके में ले जा कर बंधक बना रक्खा इस शेर ने !!!
    उस के बाद तो हर शेर धमाके पे धमाका करता गया. पूरे ज़ेहन में सजे हुए चित्र, आकार, लम्हे, चेहरे, अँधेरे, उजाले, zombies की तरह पुनर्जीवित हो ऐसे हिंसक हो गये कि बस खुदा बचाये।
    काश मेरे पास कोई कम्प्यूटर ऐसा होता जो मेरे मन में उठती हिलोरों को शब्दों में लिख देता !!!
    नवनीत शर्मा जी आप को सहस्र साधुवाद।

  2. kya behatreen matla hai bhaiya…pehle misre me’n kho gya bulkul..aur ye ash’aar

    वो चांदनी जो फूट के रोयी थी रात भर
    उसका पता ठिकाना सहर ने नहीं दिया

    जो था नहीं हमारा उसी के हैं आज तक
    बीते हुए को हमने गुज़रने नहीं दिया

    जीने को कोसने में ख़राबी नहीं मगर
    जीने के खा़ब ही ने तो मरने नहीं दिया

    कल रात तेरी यादों के लश्कर चले रहे
    ख़ाबों में शोरो-गुल ने उतरने नहीं दिया

    आगे निकल के आ गये मंज़िल को छोड़ कर
    हमको कोई पड़ाव सफ़र ने नहीं दिया….kya kehne..wahhh


    sadar
    -kanha

  3. behtareen …behtareen…behtareen kya achchhe ashaar nikale hain aapne bhai mubarakbaad qubool keejiye…

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