7 टिप्पणियाँ

तय तो हुआ था साथ ही चलना, कहाँ चला-तुफ़ैल चतुर्वेदी

तय तो हुआ था साथ ही चलना, कहाँ चला
कुछ तो बताता जा ये अकेला कहाँ चला

तन्हाइयों के ख़ौफ़ से भागा ख़ला1 की सम्त
दिल ने कभी ठहर के न सोचा कहाँ चला

तीरानसीब2 मुझसे ज़ियादा यहाँ है कौन
मुझसे छुड़ा के हाथ उजाला कहाँ चला

शब भीगती हुई है बिछुड़ता हुआ है चाँद
ऐसे में साथ छोड़ के साया कहाँ चला

वो इक नजर में भाँप गया मेरे दिल का हाल
उसके हुज़ूर कोई बहाना कहाँ चला

मैं हूँ फ़क़ीर, काट ही लेता कहीं पे रात
क्यों रौशनी ने मुझको पुकारा कहाँ चला

बारिश की ख़ुश्क आँख टपकने लगी ’तुफ़ैल’
भीगे हुये परों से परिन्दा कहाँ चला

१- शून्य २- हतभागा

तुफ़ैल चतुर्वेदी                                                                  09810387857

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7 comments on “तय तो हुआ था साथ ही चलना, कहाँ चला-तुफ़ैल चतुर्वेदी

  1. वाह सर जी खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई

  2. तीरानसीब2 मुझसे ज़ियादा यहाँ है कौन
    मुझसे छुड़ा के हाथ उजाला कहाँ चला
    behad khoobsurat she’r! Sadhuvad!

  3. Dada sadar pranam….

    तन्हाइयों के ख़ौफ़ से भागा ख़ला की सम्त
    दिल ने कभी ठहर के न सोचा कहाँ चला

    kya behatreen she’r hai dada…

    शब भीगती हुई है बिछुड़ता हुआ है चाँद
    ऐसे में साथ छोड़ के साया कहाँ चला
    kya manzar hai…shab bheegati hui hai bichhudta hua hai chaand…wahh wahh

    बारिश की ख़ुश्क आँख टपकने लगी ’तुफ़ैल’
    भीगे हुये परों से परिन्दा कहाँ चला….

    lajawab….

    sadar
    -kanha

  4. शब भीगती हुई है बिछुड़ता हुआ है चाँद
    ऐसे में साथ छोड़ के साया कहाँ चला

    बारिश की ख़ुश्क आँख टपकने लगी ’तुफ़ैल’
    भीगे हुये परों से परिन्दा कहाँ चला

    Dada bahut bahut achhii gazal huii hai …bahut din se muntazir tha aapki gazal ka
    dili daad

    with regards

  5. आप को पढ़कर धन्य हो गया हूँ

  6. शानदार ग़ज़ल हुई है दादा। हर शे’र शानदार। दाद कुबूल करें।

  7. दादा आप बहुत दिनों बाद अपने कद्रदानों पर यूँ मेहरबान हुए हैं! एक साथ चार ग़ज़लें! और वो भी संभवतः ताज़ा! चारों आला! इस ग़ज़ल की ज़मीन भी करख्त है! मगर क्या शेर हुए हैं!

    तीरानसीब मुझसे ज़ियादा यहाँ है कौन
    मुझसे छुड़ा के हाथ उजाला कहाँ चला…..वाह!

    बारिश की ख़ुश्क आँख टपकने लगी ’तुफ़ैल’
    भीगे हुये परों से परिन्दा कहाँ चला……क्या दिल चीर देने वाला मंज़र है! आह!

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