8 टिप्पणियाँ

ग़ज़ल – चार –सू जो खामुशी का साज़ है –मयंक अवस्थी

चार –सू जो खामुशी का साज़ है
वो कयामत की कोई आवाज़ है

तोड़ दे शायद अनासिर का क़फस
रूह में अब कुव्वते –परवाज़ है

ये धुँधलका खुल के बतलाता नहीं
शाम है या सुबह का आग़ाज़ है

किसलिये दिल में शरर हैं बेशुमार
क्यों ज़मीं से आसमाँ नाराज़ है

इंतेहा- ए ज़ब्र करता है वो अब
देख कर करता नज़र अन्दाज़ है

मिल गया शायद मुझे कोई अज़ीज़
यूँ निगह मेरी निगाहे नाज़ है

मयंक अवस्थी ( 8765213905)

अनासिर –पंचतत्व – elements
इंतेहा- ए ज़ब्र- अत्याचार की सीमा
निगाहे नाज़ –अभिमान भरी दृष्टि

कुव्वते परवाज़ – उड़ने की शक्ति

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8 comments on “ग़ज़ल – चार –सू जो खामुशी का साज़ है –मयंक अवस्थी

  1. kya badhiya matla hai …puri ki puri ghazal behad khubsoorat hai Bhaiya…

    ये धुँधलका खुल के बतलाता नहीं
    शाम है या सुबह का आग़ाज़ है ….

    wahh..lajawab…dhero’n daad…sadar pranam
    -kanha

  2. bhaiya kya hi umda ghazal hai.. matla qayamat hai… uske baad pahle she’r me..anasir ka qafas behad umda prayog hai…

    ये धुँधलका खुल के बतलाता नहीं
    शाम है या सुबह का आग़ाज़ है
    ye she’r bhi kya hi accha hai…. dhundhle se manzar nen kitni shankaayen paida keen… shayari ke liye dhundhli mubham ambiguous cheezen kitne darwazen kholti hain…. use baa’d ke bhi teenon she’r behad acche hue hain bhaiya… daad qubulen

  3. आला ग़ज़ल! जी ख़ुश हो गया! दिली दाद भैया!

  4. बहुत बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है मयंक भैया,मतले की ख़ामोशी सीधे दिल तक पहुंची….आह
    किसलिए दिल में शरर है बेशुमार
    क्यों ज़मीं से आसमां नाराज़ है …..क्या कहने
    ये धुंधलका खुल के बतलाता नहीं
    शाम है या सुबह का आगाज़ है…
    वाह वाह
    तोड़ दे शायद अनासिर का कफ़स
    रूह में अब कुव्वाते-परवाज़ है…आह जानलेवा शेर
    एक और उम्दा ग़ज़ल के लिए लाखों दाद
    With regards

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