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हिर्सो-हवस के नाम ये दिन-रात की तलब-सौरभ शेखर

हिर्सो-हवस के नाम ये दिन-रात की तलब
इम्दाद की उमीद, मफ़ादात की तलब

वो सानिहे कि सोच बदलनी पड़ी मुझे
पैदाइशी नहीं थी ख़यालात की तलब

मैं भी किसी मसीहा के हूँ इंतज़ार में
तुमको भी ग़ालिबन है करामात की तलब

ख़बरों में एक लुत्फ़ का पहलू तो है मगर
अच्छी नहीं है इतनी भी हालात की तलब

कैसा अज़ीब रोग मिरे जी को लग गया
हर वक़्त है किसी से मुलाक़ात की तलब

जुरअत से अपनी ख़ुद भी मैं हैरान हूँ बहुत
बढती ही जा रही है सवालात की तलब

तू भी गुनाहगार यक़ीनन है ज़ात का
‘सौरभ’ तिरी सज़ा भी वही, ज़ात की तलब

सौरभ शेखर 09879866653

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16 comments on “हिर्सो-हवस के नाम ये दिन-रात की तलब-सौरभ शेखर

  1. मैं भी किसी मसीहा के हूँ इंतज़ार में
    तुमको भी ग़ालिबन है करामात की तलब

    ख़बरों में एक लुत्फ़ का पहलू तो है मगर
    अच्छी नहीं है इतनी भी हालात की तलब

    कैसा अज़ीब रोग मिरे जी को लग गया
    हर वक़्त है किसी से मुलाक़ात की तलब

    जुरअत से अपनी ख़ुद भी मैं हैरान हूँ बहुत
    बढती ही जा रही है सवालात की तलब

    सारे अश’आर ख़यालात की तह से आये हुए लगते हैं…

  2. वो सानिहे कि सोच बदलनी पड़ी मुझे
    पैदाइशी नहीं थी ख़यालात की तलब….क्या उम्दा शे’र है वाह वाह

    ख़बरों में एक लुत्फ़ का पहलू तो है मगर
    अच्छी नहीं है इतनी भी हालात की तलब

    कैसा अज़ीब रोग मिरे जी को लग गया
    हर वक़्त है किसी से मुलाक़ात की तलब…..

    बेहतरीन ग़ज़ल हुई है भैया…बधाई क़ुबूल करें
    सादर
    -कान्हा

  3. सौरभ आपकी इस ग़ज़ल ही नहीं आपकी शायरी को भी अगर दो मिसरों में समेटना चाहूं तो शायद इस तरह कहना मुनासिब होगा

    अनछूए मौज़ुआत..ख़यालात की तलब
    मुश्किल-तलब है आपकी दिन-रात की तलब

  4. सौरभ भैया बहुत बहुत बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है….मज़ा आ गया पढ़कर
    इस ज़बरदस्त ग़ज़ल के लिए दिली मुबारकबाद

    with regards

  5. सौरभ शेखर भाई गज़ल पढकर जलन हो रही है कि यह गज़ल मैंने क्यूँ नहीं कही.. अब और क्या कहूँ …

    • आसिफ भाई आप जैसे अच्छे शायर की दाद के लिए शुक्रिया अदना लफ्ज़ है! करम बनाये रखिये.

  6. सौरभ !!! ये इतनी अच्छी गज़ल है कि ज़ियादा क्या कहूँ –!! संश्लिष्ट भाषा – विचार की गहराई और अभिव्यक्ति की उज्ज्वलता ने इस गज़ल को पुर असर बना दिया है !! सानी मिसरों से आजमाइश कर इस ग़ज़ल का लुतफ ले रहा हूँ – कोई बयान या कोई ज़मीन इतने रास आते हैं कि तबीयत होती है कि इस रह्गुज़र से गुज़रा जाय !! आपके सानी मिसरे ले कर मैं आपकी इस गज़ल से गुज़र रहा हूँ – और आपको एक बार फिर लक्ष्मी के शुभागमन की बधाई !!!
    तारी है दिल के ज़ख़्म पे जज़बात की तलब
    इम्दाद की उमीद, मफ़ादात की तलब

    टकरा गया था इल्म हक़ीकत के संग से
    पैदाइशी नहीं थी ख़यालात की तलब

    तुम जो मरीज़े इश्क के तीमार दार हो
    तुमको भी ग़ालिबन है करामात की तलब

    पर्दा है दिल के दर पे तो तस्लीम कीजिये
    अच्छी नहीं है इतनी भी हालात की तलब

    बीमार हो गईं हैं ये तनहाइयाँ मिरी
    हर वक़्त है किसी से मुलाक़ात की तलब

    माथे पे बढ रही है हरिक रोज़ इक शिकन
    बढती ही जा रही है सवालात की तलब

    कतरा खड़ा हुआ है समन्दर की राह में
    ‘सौरभ’ तिरी सज़ा भी वही, ज़ात की तलब

    शुभकामनाओं सहित –मयंक

  7. saurabh bhai… bharpoor ghazal hui hai…kya manjhi hui zabaan hai…. lagbhag sabhi she;r pasand aaye…
    जुरअत से अपनी ख़ुद भी मैं हैरान हूँ बहुत
    बढती ही जा रही है सवालात की तलब
    is she’r par vishesh daad…. yahi ek baat hai jo batati hai ki ek badi si vyavstha me hamara alag astitva hai….

  8. कैसा अज़ीब रोग मिरे जी को लग गया
    हर वक़्त है किसी से मुलाक़ात की तलब

    तू भी गुनाहगार यक़ीनन है ज़ात का
    ‘सौरभ’ तिरी सज़ा भी वही, ज़ात की तलब

    वाह, वाह, वाह !!
    क्या खूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने | दिली मुबारकबात भाई सौरभ जी !!

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