16 टिप्पणियाँ

सवालों में ख़ुद भी है डूबी उदासी-आलोक मिश्रा

सवालों में ख़ुद भी है डूबी उदासी
कहीं ले न डूबे मुझे भी उदासी

शबो रोज़ चलती है पहलू से लगकर
गले पड़ गयी एक ज़िद्दी उदासी

फ़जाओं की रगंत निखरने लगी है
हुई शाम फिर दिल में लौटी उदासी

ज़रा चाँद क्या आया मेरी तरफ़ को
सितारों ने जल-भुन के ओढ़ी उदासी

शबिस्तां में ग़म की न शम्में जलाओ
कहीं जाग जाये न सोयी उदासी

ज़रा देर लोगों में खुल कर हँसी फिर
सरे-बज़्म आँखों से टपकी उदासी

उसे याद थी कल की तारीख़ शायद
सिसकती रही लेके हिचकी उदासी

तिरी डायरी शायरी दोनों पढ़कर
मिरे जिस्मो-जाँ से है लिपटी उदासी

जमी थी मिरे सर्द सीने में कबसे
तपिश पाके अश्कों की पिघली उदासी

कुतरती है दिल के शजर की ये ख़ुशियाँ
तिरी याद है या गिलहरी उदासी

कभी हम थे जिनकी दुआओं में शामिल
उन्हीं तक न पहुंची हमारी उदासी

तिरी याद के अब निशां तक नहीं हम
मगर दिल में रहती है अब भी उदासी

आलोक मिश्रा 09876789610-09711744221

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16 comments on “सवालों में ख़ुद भी है डूबी उदासी-आलोक मिश्रा

  1. आलोक भाई , आदरणीय नवनीत शर्मा भैया हमसे अक्सर कहते हैं की कान्हा आपको पढ़ना अच्छे अनुभव से गुज़रना है…मेरे हिसाब से ये उनका स्नेह बोलता है मेरे लिए लेकिन ये लाईन आप पर बिलकुल सादिक़ आती है…आपको पढ़ना सचमुच इक बेहतरीन अनुभव से गुज़रना ही है..

    सवालों में ख़ुद भी है डूबी उदासी
    कहीं ले न डूबे मुझे भी उदासी…
    उदासी का सवालों में डूबना बहुत सुन्दर प्रयोग है.. वाह….दूसरे मिसरे में जो इसकी वज़ह से चिंता झलक रही है उसने मतले को और ऊँचाई दी है….

    शबो रोज़ चलती है पहलू से लगकर
    गले पड़ गयी एक ज़िद्दी उदासी….
    उदासी की ये ही ज़िद जब शायर के कलम से शे’र बन के निकलती है तो सीधा दिल के पार हो जाती है…बहुत ही उम्दा शे’र है..

    फ़जाओं की रगंत निखरने लगी है
    हुई शाम फिर दिल में लौटी उदासी…
    इस बेहतरीन शे’र पे मेरा इक शे’र याद आया मुझे ..
    शाम हुई तो दिल में लौटा
    दर्द भी एक परिंदा निकला…

    ज़रा चाँद क्या आया मेरी तरफ़ को
    सितारों ने जल-भुन के ओढ़ी उदासी..
    क्या मासूम शे’र है भाई…जितनी तारीफ़ की जाये कम है इसकी..

    शबिस्तां में ग़म की न शम्में जलाओ
    कहीं जाग जाये न सोयी उदासी

    ज़रा देर लोगों में खुल कर हँसी फिर
    सरे-बज़्म आँखों से टपकी उदासी

    उसे याद थी कल की तारीख़ शायद
    सिसकती रही लेके हिचकी उदासी

    तिरी डायरी शायरी दोनों पढ़कर
    मिरे जिस्मो-जाँ से है लिपटी उदासी

    जमी थी मिरे सर्द सीने में कबसे
    तपिश पाके अश्कों की पिघली उदासी

    कुतरती है दिल के शजर की ये ख़ुशियाँ
    तिरी याद है या गिलहरी उदासी

    कभी हम थे जिनकी दुआओं में शामिल
    उन्हीं तक न पहुंची हमारी उदासी…….

    मुश्किल रदीफ़ में बहुत उम्दा शे’र हैं..हर इक शे’र अलग छाप छोड़ रहे हैं ..वाह वाह

    तिरी याद के अब निशां तक नहीं हम
    मगर दिल में रहती है अब भी उदासी

    ये शे’र तो कई दिन तक गुनगुनाऊंगा भाई..बहुत गहरा शे’र है
    ढेरों दाद
    -Kanha

  2. रदीफ़ इतनी नासपीटी है कि क्या कहूं… मगर प्यारे अच्छी ग़ज़ल निकली..वाह..वाह

  3. alok bahut achchi ghazal hui
    aap isi tarah achchha kahte rahen aage badhte rahen
    dheron aasheesh…

  4. bahut acchi ghazal hui hai aalok… aisi radeefen mujhe bahut pasand hain…aur udaasi lafz bhi mere pasandeedah lafzon me se ek hai…. poori ki poori ghazal behad pasand aayi.. dher saari daad…

  5. तिरी याद के अब निशां तक नहीं हम
    मगर दिल में रहती है अब भी उदासी

    वाह, बढ़िया ग़ज़ल कही है भाई आलोक जी |
    दाद क़ुबूल कीजिये !!

  6. वाह आलोक भाई बहुत ख़ूब! निहायत उम्दा ग़ज़ल हुई है! भरपूर दाद लीजिये.

  7. क्रिया रदीफ हो तो गज़ल आसान होती है –लेकिन संज्ञा , क्रियाविशेषण , या विशेषण की रदीफ बाँधना मुश्किल होता है – फिर भी इन पर कही गई सफल ग़ज़ल शब्द के विभव और शब्द की ब्रह्मसत्ता की स्थापना करती है—ग़ालिब ने तकिया रदीफ़ ले कर एक गज़ल कही है – आलोक भाई !! आपकी गज़ल ने उदासी शब्द के अनेक शेड्स सफलतापूर्वक खोल दिये-लगभग सभी सानी मिसरे मुकम्मल बयान हैं और उनपर खूबसूरत गिह भी लगी हैं –
    सवालों मे ख़ुद भी है डूबी उदासी
    कहीं ले न डूबे मुझे भी उदासी
    शबो रोज़ चलती है पहलू से लगकर
    गले पड़ गयी एक ज़िद्दी उदासी
    शबिस्तां में ग़म की न शम्में जलाओ
    कहीं जाग जाये न सोयी उदासी
    ज़रा देर लोगों में खुल कर हँसी फिर
    सरे-बज़्म आँखों से टपकी उदासी
    कभी हम थे जिनकी दुआओं में शामिल
    उन्हीं तक न पहुंची हमारी उदासी
    बहुत पसन्द आये ये अश आर और दीगर शेर भी बहुत उम्दा हैं – बधाई –मयंक

    • मयंक भैया प्रणाम
      जब भी कोई ग़ज़ल पोस्ट होती है तो मै सबसे पहले आपकी टिप्पड़ी ढूंढता हूँ और उसे बार बार पढता हूँ …बहुत से नये ख़याल और खूबसूरत अश-आर से परिचय करवाते हैं आप
      आपके इस हौसलाफजाई से दिल दूना हो जाता है
      इस मुहब्बत के लिए आपको तहे दिल से शुक्रिया

  8. जनाब आलोक साहब बेहेतरीन गज़ल हुई है, उदासी के काफी नए और अनोखे पहलू निकले हैं आपने|
    मुकम्मल ग़ज़ल ही कबीले दाद है.. बेहद मुबारकबाद
    # आसिफ

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